मानव जीवन की सबसे बड़ी पूँजी मानी जाती है-आचार,व्यवहार और संस्कार के साथ इनमे उचित समन्वय व संयोजन .इतिहास देखे तो लगता है कि भारत और विश्व की जितनी लड़ाईयां लड़ी गयी,सभी के मूलाधार में आचारो व व्यवहारों में  अजीब किस्म का असंतुलन रहा है.भारत में नव धनाढ्यों में भी नैतिक तौर पर व्यवहार व संस्कारों में काफी असंतुलन देखा जा रहा है.कईयों को अचानक तोहफे में मिली सफलता पचती नहीं है.पर उनके  उस मानसिक रोग का खामियाजा पूरे समाज को उठाना पड़ता है.

भारत के अति प्राचीन इतिहास में महाभारत प्रकरण  भी एक ऐसा उदाहरण है जिसमे यह युद्ध सिर्फ आचार-व्यवहार में  घोर असंतुलन  की वजह से लड़ा गया.जिसमे हजारो निर्दोषों की जाने गयी.पर हुआ वही,जो होना था.राजनीति और महाभारत का एक अलग किस्म का रिश्ता रहा है.भारत की राजनीति हर पल महाभारत की विभिन्न कथा व कथानको रूबरू करवाती रहती हैं.आज की तारीख में केंद्र और विभिन्न राज्यों की राजनीति की स्थिति भी महाभारत जैसी ही है.कभी ठंडा तो कभी गरम.कभी रुखा तो कभी नरम.कभी गीता तो कभी कुरान.कभी नया नियम तो कभी पुराण.कभी नीयत ठीक नहीं तो कभी नीति.

उस कथा के क्रम में हम आज़ मध्यप्रदेश के महाभारत की चर्चा करेंगे.महाभारत में भी युद्ध के जड में आत्मसम्मान का मसला था.मध्यप्रदेश में भी आज वही मसला है.कांग्रेस के दिग्गज रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 10 मार्च 2020 को कांग्रेस छोड़ दी.ये दिन होली का था.उसी दिन पिताश्री श्रीमंत माधवरावजी सिंधिया की 75 वीं जयंती भी थी.श्री सिंधिया ने इस होली के रंग बिरंगे दिवस में कांग्रेस की होली कर दी.कांग्रेस छोड़ दी.उन्होंने जो किया,अच्छा किया.ये तो उन्हें एक साल पहले कर देना था.क्यों न करते.कब तक सहते.क्यों सहते.किसलिए सहते-उन दो झूठे नेताओं दिग्विजय सिंह व कमलनाथ जैसो के लिए या आजकल मौनी बाबा की तरह काम करने वाली कांग्रेस की मजबूर अध्यक्ष सोनिया गाँधी के कारण.या फिर पार्टी के अलावा अन्य सभी कामो में व्यस्त रहने वाले घुमंतू पूर्व अध्यक्ष राहुल बाबा गाँधी के लिए.जो 10 मार्च के दिन भर राजनीतिक उठापटक के बावजूद देर रात तक शांत बैठे रहे.आखिर क्यों?

श्री सिंधिया के साथ पिछले 18 महीनो में बहुत कुछ हुआ.ऐसा आज तक किसी भी दल मन किसी नेता के साथ नहीं हुआ.उनसे पहले वादा किया गया की मध्यप्रदेश में कांग्रेस के जीतने पर वही मुख्यमंत्री होंगे.पर उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया गया .जो अनुचित है .बाद में चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया.फिर सरकार बन गयी.प्रदेश के इतिहास में पहली बार हुआ कि धन बल और जुगाड़ की मदद से एक बाहरी व्यापारी-नेता कमल नाथ को मुख्यमंत्री बना दिया गया.कमलनाथ के बारे में कहा जाता है कि वह व्यापारी पहले हैं राजनेता बाद में.कमलनाथ देश के सबसे धनी राजनेता बताये जाते हैं.यदि केंद्र सरकार और प्रधान मंत्री कार्यालय राष्ट्र हित में कमलनाथ और उनके रिश्तेदारों की परिसंपत्तियों की सही तरीके से जांच करे तो तो वह देश ही नहीं बल्कि विश्व का एक बड़ा स्कैंडल उजागर हो सकता है.एक-दो मामलो की तो जांच भी जारी हैं.कमलनाथ 1980 से राजनीति में हैं.कांग्रेस के संजय ब्रिगेड के सबसे तेज सदस्य थे.लोगो से ज्यादा उनको लक्ष्मी जी की माया पर भरोसा है.इसलिए प्रदेश में उनके  कर्मचारियों द्वारा पार्टी के निर्वाचित विधायको से बुरा सलूक करना उनकी फितरतों में है.साथ में सफल कूटनीतिज्ञ दिग्विजय सिंह जैसा मिल जाये तो ऐसे दोस्ती को ही सोने पर सुहागा कहा जाता है.

मध्यप्रदेश में पिछले 15 महीनो की कमलनाथ सरकार पर कई बार कई झटके लगे.कमलनाथ व दिग्गी की जोड़ी ने आलाकमान को साध कर श्री सिंधिया के साथ लुका छिपी का खेल खेलते रहे.लेकिन परिणाम कुछ नहीं निकला.वैसे दिसम्बर 2018 के प्रदेश चुनाव का उचित विश्लेषण किया जाये तो यदि श्री सिंधिया उस चुनाव में अपनी पूरी ताक़त नहीं झोकते तो कांग्रेस की सरकार कतई नहीं बनती.उस चुनाव प्रचार में सबसे ज्यादा 110 सभाओ को सिर्फ श्री सिंधिया ने सम्बोधित किया था.

उनकी तुलना में कमलनाथ व दिग्गी राजा ने वैसा कुछ नहीं किया था.पर बाद में दोनों ने अपने अपने तिकड़मो से श्री सिंधिया को मुख्यमंत्री पद से दूर कर दिया.फिर प्रदेश अध्यक्ष की बात आई.वहां पर भी वही खेल.दोनों की तुलना में सबसे कम सिंधिया समर्थको को प्रदेश सरकार में जगह दी गयी.सूत्रों की माने तो लोक सभा चुनाव में भी उन दोनों तिकड़मी नेताओ ने श्री सिंधिया को हरवाने में अहम् भूमिका अदा की.राज्य सभा में एक सीट की बात आई तो फिर वही तिकड़म व ओछी हरकतें उन दोनों व्यापारी-नेताओ द्वारा.

यदि पूरी स्थितियों का विश्लेषण किया जाये तो कोई भी व्यक्ति कब तक ऐसे अपमान बार बार झेलता रहेगा और क्यों? ये एक अहम् सवाल है.शायद इसीलिए भाजपा के वरिष्ठ नेता व प्रधान मंत्री नरेन्द्र भाई मोदी बार बार दावा करते नहीं थकते-भारत जल्द ही कांग्रेस मुक्त होकर रहेगा.वैसे आजकल की तमाम परिस्थितियों के मद्देनजर ऐसा ही प्रतीत हो रहा है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी की भविष्यवाणी जल्द ही सच साबित हो जाये.

संभवतः कांग्रेस के उस खेल से उबकर श्री सिंधिया ने भाजपा से सम्पर्क सांधा.10 मार्च को श्री सिंधिया की प्रधानमंत्री श्री मोदी ,केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह,भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा से बातचीत व मुलाकातें हुई.शाम तक भाजपा में शामिल होने की बात थी.श्री सिंधिया की बुआ व प्रदेश की विधायक श्रीमती यशोधरा राजे ने श्री ज्योतिरादित्य क इस साहसिक कदम का स्वागत किया.भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज़ हुसैन ने भी श्री सिंधिया के इस मुहिम का सम्मान किया. श्री सिंधिया के साथ 19 विधायको ने भी अपना अपना इस्तीफा मध्य प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष को भेज दिया.इससे कमलनाथ खेमे में हडकंप मच गया.पहली बार उन्हें श्री सिंधिया की तरफ से उनके स्टाइल में जोड़ का झटका दिया गया.क्योकि 19 के साथ 3 और विधायको के पार्टी छोड़ने से कमलनाथ सरकार का जाना तय हो गया लगता है.वैसे आने वाले दिनों में कई प्रकार की घटना क्रम कई नए इतिहास को जन्म देंगे.

श्री सिंधिया अब अपनी दादी राजमाता श्रीमती विजयराजे और बुआ द्वय वसुंधरा राजे व यशोधरा राजे की राह का अनुसरण करते हुए 11 मार्च  को भाजपा में  शामिल हो गए.शामिल होने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री श्री मोदी ,गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा का आभार व्यक्त किया.श्री सिंधिया अपने पिता जी माधवराव जी को स्मरण करते हुए 30 सितम्बर 2001 और 10 मार्च 2020 का जिक्र किया. गौरतलब है 30 सितम्बर को माधवराव जी का महानिर्वाण हुआ था,जबकि 10 मार्च उनका जन्म दिवस है.श्री सिंधिया ने कहा कांग्रेस अब वो पुरानी कांग्रेस नहीं रही.उस पार्टी में अब जन सेवा का कोई मायने नहीं है.श्री सिंधिया ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री मोदी के हाथ में भारत का भविष्य सुरक्षित है.उन्होंने भाजपा का धन्यवाद् दिया कि उन्हें जन सेवा का एक विशाल मंच प्रदान किया गया.ये भी एक तथ्य है कि एक समय में उनके पिताश्री माधवराव सिंधिया भी जनसंघ में  थे.वैसे तो आज के कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह भी जनसंघ के सदस्य रह चुके हैं.कहते हैं समय से बड़ा कोई नहीं.समय ने इस समाज में कई बड़े-छोटे को उनकी असलियत व औकात का एहसास करवाया है.

इतिहास अपने चक्र को स्वयं घुमाता है क्योकि उसका गुरु व गौरव समय चक्र है.1967 में कांग्रेस द्वारा अपमानित किये जाने से  राजमाता विजया राजे कांग्रेस छोड़कर जनसंघ के साथ चली गयी थी.उसके बाद प्रदेश में कांग्रेस का पतन शुरू हो गया था.आज 2020 में भी कमोबेश वही स्थिति है.आज श्री ज्योतिरादित्य ने अपनी दादी और बुआ की पार्टी को अपनाया.साथ ही जन सेवा को आम जन जन तक बेहतर तरीके से पहुचाने की प्रतिज्ञा ली.

रंगों के महापर्व होली के अवसर पर मध्यप्रदेश की राजनीति कई प्रकार के रंग-बिरंगे अनुभवों से गुजर रही है.इसके मुख्य किरदार प्रदेश के ‘बाहरी’ मुख्यमंत्री कमल नाथ और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने प्रदेश को एक तरह से हाइजैक कर लिया है.इसमें सबसे बड़ा नुकसान पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थको का हुआ है.श्री सिंधिया के एस ऐतिहासिक कदम के बाद भी कमलनाथ की अकड अभी कम नहीं हुयी है.वैसे मध्य प्रदेश क जानकारों का कहना है कि इन सब खेलो के महारथी दिग्विजय सिंह हैं.ऐसा लग रहा है कि श्री सिंह ने एक तीर में दो शिकार करते हुए अपने रास्ते से कमलनाथ व सिंधिया दोनों को निपटा दिया है.अभी देखना है आगे आगे क्या होता है?

मध्यप्रदेश भारत का दिल व दिली प्रदेश है.इसकी धड़कन से केंद्र की राजनीति भी जुडी हुई है.आने वाले दिनों में मध्यप्रदेश के बाद इसी तरह का खेल एक बार फिर से महाराष्ट्र और राजस्थान में दोहराए जाने की सम्भावना है.पिछले दिनों दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के  बीच लम्बी गुफ्तगू हुयी है.बस उचित समय व मुहूर्त का इंतज़ार है.राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट में जमकर ठनी हुयी है.जिससे सरकार व संगठन दोनों प्रभावित हो रहे हैं.ऐसा प्रदेश के कई नेताओ का मानना है.

यदि भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व सांसद जी वी एल नरसिंहराव की बात को माने तो मध्यप्रदेश की राजनीतिक स्थिति तो एक महज़ ट्रेलर है ,पूरी पिक्चर अभी बाकी है


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