भारत का महाराष्ट्र.देश की आर्थिक राजधानी.पैसा जिसके पास,पॉवर उसके पास.पवार जिसके साथ सत्ता की कुर्सी उनके साथ.जी हाँ,मराठा क्षत्रप शरद पवार ने ये साबित कर दिया है कि उनके जैसा कोई नहीं.उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ताले को अपनी चाबी से खोल दी. ऐसा लगता है कि मोदी पवार के चक्रव्यूह में  फंस गए थे. वैसे भी देश की मौजूदा राजनीति मोदी के चक्र और पवार के व्यूह में उलझ गयी लगती है.लगता है ये खेल लम्बा चलेगा. लेकिन मोदी भी किसी से कम नहीं.क्योकि प्रधानमंत्री मोदी ने अभी तक देश के सामने यही साबित किया है –मोदी है तो मुमकिन है.
 कारवां निकल गया.दिल्ली वाले देखते रह गए.दिल्ली में बैठे सत्तासीन लोग सिर्फ गुबार देखते रहे..रथ भी पवार का और सारथि भी पवार का.अब भाजपा के लिए ये आत्म विश्लेषण की घड़ी है कि चूक कहाँ पर हुई,कैसे हुई,क्यों हुई और कहाँ पर हुई? शायद उनको जवाब मिल भी गया हो गया होगा.न मिले तो जोर का झटका तो मिल गया.बड़े ही शालीन अंदाज़ में. महाराष्ट्र की राजनीति में चित्त भी पवार का.पट भी पवार का. जो नहीं होना था.वो हो गया.जो होना था.वो नहीं हुआ.अब शिवसेना से उद्धव बालासाहेब ठाकरे महाराष्ट्र के नए मुख्यमंत्री होंगे,जबकि भाजपा के देवेन्द्र फदंविस को मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा.
पिछले चार दिनों में ( 24-27 नवम्बर 2019)  महाराष्ट्र की राजनीति ने पूरे देश को हिला कर रख दिया था.7 बार विधायक व 7 बार सांसद रहे पूर्व केन्द्रीय मंत्री शरद पवार इस खेल के असली हीरो हैं.चाणक्य भी.नीत्शे भी हैं,मैकियावली भी,सुकरात भी.आप जैसे समझना चाहे,सोचना चाहे,आप स्वंतंत्र हैं.क्योकि उनका नाम शरद राव पवार है.जिन्होंने इंदिरा गाँधी का काल भी देखा और अपना कार्यकाल भी.प्रधानमंत्री मोदी ने तो उन्हें पद्म बिभूषण से नवाजा.उन्होंने सोनिया गाँधी को कई बार दर्द दिया तो समय समय पर दवा भी.अवसरवाद,स्वार्थवाद.भाई-भतीजेवाद,राजनीति-अपराध गठजोड़ को लेकर शरद पवार की कई अनौपचारिक व औपचारिक किस्से व कहानियां हैं.किसी प्रकार का विरोध उन्हें कतई पसंद नहीं हैं तो अवसर के हिसाब से चुप्पी व शांति के भी वह बेजोड़ खिलाडी हैं.दोस्तों के दोस्त तो नहीं कहे जा सकते पर दुश्मनों को ठिकाने लगाने में नहीं चुकते.
एक कहावत है शरद पवार के बारे में –यदि आप शरद पवार को दिल्ली एअरपोर्ट पर देखते हैं.वह मुंबई के लिए टिकट लेते हैं.बाद में उनके पास कोलकाता का बोर्डिंग पास होता है,जबकि वह चेन्नई लैंड करते हैं.
महाराष्ट्र मसले में शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार का मिला जुला खेल लगता है.ऐसा कहा जा रहा है कि शरद पवार व प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की मुलाकात,फिर अजीत पवार का राष्ट्रवादी कांग्रेस के सभी विधायको का भाजपा सरकार को समर्थन पत्र,चार दिनों में अजीत पवार के खिलाफ केंद्र के 9 मुकदमो में राहत की ख़बरें.चाचा शरद और भतीजे अजीत के के दुसरे के प्रति सद्भाव वाला अंदाज़ और फिर दोनों बिछड़ों का मिलन.इस दाँव में शरद पास और भाजपा फेल हो गयी लगती है.6 महीने यानी 180 दिनों का राष्ट्रपति शासन 18 दिनों तक भी नहीं चल पाया.शरद के शतरंज का घोडा और राजा अजीत पवार थे.भाजपा को तो कुछ नहीं मिला.क्योकि उन्होंने ऐसे राजा और घोड़े पर विश्वास के लिया जो उचित पात्र था ही नहीं.ये पूरा प्रकरण भारतीय राजनीति के लिए एक प्रयोग के तौर पर जाना जायेगा.उच्चतम न्यायालय का इस बाबत फैसला भी अनुकरणीय है,जिसमे न्यायालय का कहना है कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए उनके अधिकार असीमित है.
ऐसा क्यों किया भाजपा और मोदी सरकार ने.अति आत्म विश्वास का परिचय क्यों दिया .रातोरात.तूफानी राजकाज का परिचय.एक झटके में राष्ट्रपति शासन समाप्त.सरकार बनने का रास्ता साफ़.पर क्या हुआ.जिसने पटकथा लिखी.अब फिल्म भी वही बना रहे.ऐसा नहीं है कि तथाकथित सत्ता के लिए राष्ट्रपति भवन रातोरात सक्रिय हुआ.पहले भी राष्ट्रपति महोदय ने कांग्रेस नेता शीला दीक्षित को भ्रष्टाचार के मामलो से बचाने के लिए रातोरात केरल का राज्यपाल बनवा दिया था.करीब 3 बजे सुबह राष्ट्रपति ने उनकी नियुक्ति पत्र जारी किया था.जिससे श्रीमती दीक्षित जेल जाने से बच गयी थी.वो अभूतपूर्व था.ऐतिहासिक.अकल्पनीय.इसलिए आज की घटना उस परिपेक्ष्य में नया नहीं है.ऐसा पहले भी हुआ है.आज हुआ और आगे भी होगा.जब जब नीति,नैतिकता,कानून,सम्विधान को इस तरह उपयोग किया जायेगा.सवाल उठेंगे.उठाये जाएंगे.व्यवहार सही या सिधांत.ये भी विचारणीय बिंदु हैं- आज के अपने जीवंत कहे जाने लोकतंत्र के लिए.क्या भारतीय प्रजातंत्र का चेहरा,चरित्र और चाल बदल गया है या बदल रहा है. 
महाराष्ट्र प्रकरण में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस,शिव सेना के साथ  भाजपा के खिलाफ आ गए हैं.इस प्रकरण में विचार शून्य हो गया.स्वार्थ सर्वोपरि हो गया.लेकिन ये कब तक.लगता है  ये युद्ध और शांति का फार्मूला शरद पवार की दूरगामी राजनीति का एक पड़ाव है.पवार को जीते जी प्रधानमंत्री बनने की चाहत है.शायद ये सब नाटक व उपक्रम उस सपने को पूरा करने में सहायक साबित हो.ऐसा ही ड्रामा 2019 लोक सभा चुनाव के पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्वयं को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने के लिए कोलकाता में किया था.गौरतलब है, उस महागठबंधन को शरद पवार का दिली समर्थन नहीं था.आंतरिक तौर पर वे खुश नहीं थे.इसलिए अपनी सुनियोजित रणनीति के तहत 2019 का महाराष्ट्र विधान सभा का चुनाव का परिणाम पहले से बेहतर रहा.इसलिए उनका आत्मविश्वास पहले से बढ़ा हुआ प्रतीत हो रहा है.
महाराष्ट्र मसले में भाजपा भी किसी से कम नहीं रही.पर ऐसे अवसर पर भाजपा नेता प्रमोद महाजन और  अरुण जेटली की याद आती है.जो आज की तारीख में पार्टी के पास नहीं है.कुछ नए नवेले नेता उनके पद चिन्हों पर चलने की कोशिश करते दिख रहे हैं,पर उनका अहंकार.गरूर उनके और पार्टी के लिए बहुत बड़ा अवरोध है.शायद समय रहते वे समझ जाये तो भाजपा को भविष्य में ऐसा कोई और नुक्सान नहीं उठाना पड़ेगा.
इस पूरे प्रकरण में ये साबित हो गया है कि देश में विचारधारा की राजनीति सत्ता व स्वार्थपरक के सामने गौण होती दिख रही हैं.जो कि एक जीवंत लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है.राजनेताओ के निजी स्वार्थों की वजह से आम जन की भावनाओ और विचार को रौंदा जा रहा है.जैसा कि महाराष्ट्र में अनहोनी कहानी एक होनी बन गयी है.देश में एक दुसरे के घोर विरोधी शिव सेना और कांग्रेस का साथ होना,किसके लिए बेहतर होगा - आम जन के लिए या निहित स्वार्थों के लिए .सिर्फ सत्ता के लिये अब आम जन की भावनाओ व विचारों पर कुठाराघात घोर चिंता और चिन्तन का कारण है.इस पूरे प्रकरण पर कई हज़ार साल पहले महाकवि तुलसीदास याद आते हैं .उनकी रचित  रामायण की वो पंक्तियाँ सच हो रही है –समरथ को नहीं दोष गुसाई..भय भी होई न प्रीत..


 


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