देश को अब  देवेगौडा मॉडल नहीं मोदी माडल की जरुरत हैं.1996 में देवेगौडा मॉडल से देश का काफी नुकसान हुआ है.जिसकी कसक आज भी देश के कोने कोने में हैं. उसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेवार थी,शायद आगे भी कांग्रेस जिम्मेवार हो सकती है .ऐसी आशंका है.
इसी परिपेक्ष्य में कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री कुमारास्वामी की शपथ के बाद बंगलुरु में विपक्षी एकता का जो एक नया ड्रामा हुआ,उससे देश अचंभित है.मैं भी.आप भी .सभी होंगे.होना भी चाहिए .क्योकि ये विपक्षी एकता का एक नया और विशेष नाटक लगता है. जिस बारात में सभी दूल्हा है.कोई बाराती नहीं .दुल्हन एक ही है .जिसे हम सत्ता के नाम से जानते हैं.
देखना होगा इस सत्ता रूपी दुल्हन को पाने के लिए 2019 में कौन नया दूल्हा बनता है,क्योकि घोषित या अघोषित दूल्हा कांग्रेस अब बाराती में शामिल हो गया है ,अपनी दावेदारी को छोड़कर.क्या 2019 के लोक सभा चुनाव के बाद देश को एक बार फिर से नया प्रधानमंत्री के तौर पर एक नया देवेगौडा या गुजराल को झेलना पड़ेगा.मेरे को लगता  है.ऐसा बिलकुल नहीं होने जा रहा है.ऐसा लगता है देश की जनता ऐसा तो नहीं होने देगी.क्योकि देश की जनता को खिचड़ी खाना मंजूर पर खिचड़ी सरकार अब और मंजूर नहीं.इस हालत में भाजपा का भविष्य बेहतर दिख रहा है.
सबको पता है कि कर्नाटक का चुनाव परिणाम  न तो कांग्रेस के पक्ष में हैं और न ही जनता दल सेक्युलर के लिए.ये तो एक अवसरवादी,आम जनता की भावनाओ के खिलाफ सत्ता के लिए स्वार्थपरक गठबंधन है .जिसका कोई ठोस भविष्य नहीं दिखता.अभी तो एक अंगडाई  है.बाकी कई लडाई है.
देश का राजनीतिक इतिहास के साथ कई करवटें बदल रहा है .जिसके हम सब साक्षी है और रहेंगे.इस प्रकरण पर मेरे को 1993 का एक वाक्या याद आता है .उस वक़्त मध्य प्रदेश में विधान सभा चुनाव था.मै भाजपा के दिग्गज लाल कृष्ण आडवानी के साथ चुनाव यात्रा पर था.ग्राउंड जीरो से कई प्रकार के अनुभव हुए.एक साथ भाजपा और कांग्रेस की सभाओ से भी रूबरू हुआ था .उस वक़्त भाजपा के लिए कांग्रेस दुश्मन नंबर एक थी.आडवानी जी के भाषण में कांग्रेस ही फोकस हुआ करती थी.उस वक़्त कांग्रेस के लिए सौ जूते-सौ प्याज़ वाली कहानी काफी लोकप्रिय हुयी थी.आज कांग्रेस के स्थान पर भाजपा आ गयी है.श्री आडवानी जी का उस वक़्त कहना था कि आने वाले दिनों में कांग्रेस का देश से सफाया हो जायेगा.हालाँकि उनकी प्रयासों को उनके पट्ट शिष्य रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी सफल करने में जुटे हुए हैं.एक झांकी तो देश 2014 में देख ही चूका है.आगे 2019 की बारी है .हो सकता है वो 2019 का परिदृश्य 2018 के अंत में ही निपटा दिया जाये.
पते की बात ये है कि उस वक़्त भाजपा के साथ जो पार्टियाँ थी.उनमे से ज्यादातर आज साथ नहीं है.ऐसा लगता है कि देश में सिद्धांत की राजनीति समाप्त हो गयी है .सत्ता और अवसरवाद की राजनीति हावी होती जा रही है.रामविलास पासवान जैसे नेता ऐसी अवसरवादी राजनीति के बड़े नमूने कहे जा सकते है .उनके साथ टीडीपी के चन्द्रबाबु नायडू और टी आर एस के चंद्रशेखर राव भी है ,जो कल तक मोदी सरकार में भी मलाई खा रहे थे.अज कांग्रेस के साथ खड़े दिख रहे हैं .देश की अजीब विडंबना है कि सिर्फ सत्ता के लिए पुराने कट्टर दुश्मन दोस्त बन चुके है .कांग्रेस अपने सभी पुराने कट्टर दुश्मन  को दोस्त मान चुकी है .इसे क्या कहा जायेगा.आम जनता सब जानती है .
समाजवादी नेता लोक नायक जयप्रकाश नारायण को जेल की हवा खिलाने वाली,आपातकाल की जनक कांग्रेस से किसी भी समाजवादी दल को हाथ मिलाने से कोई गुरेज़ नहीं दिख रहा है .क्यों? ये एक बड़ा सवाल हैं देश की राजनीति के लिए.इसलिए कमोबेश यही लगता है कि भाजपा ही एक मात्र एक ऐसा दल है ,जहाँ आज भी कुछ सिद्धांत,नैतिकता बची हुयी है,अन्य सभी दलों की तुलना में .
कर्नाटक में सत्ता से पिछड़ने के बाद भाजपा में एक अजीब किस्म की बैचैनी देखी जा रही है.कारण स्पष्ट है-मनमाफिक सरकार का नहीं बन पाना.जिम्मेवार कौन? सब अपने.पराये तो वैसे ही खार खाए बैठे हैं.पर होना वही है.कोई कुछ भी कर ले,आना है दोबारा मोदी और उनकी भाजपा को ही वापस.इसलिए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का ताज़ा बयान सुस्त पार्टी में ताजगी का संकेत है.वैसे भी कर्नाटक में भाजपा नंबर एक पार्टी है.कुछ गलतियाँ हुयी है .जिसको लेकर चिंतन मनन का दौर जारी है.
2014 के बाद की भाजपा और आज की भाजपा में कई फर्क हैं .जमीन आसमान का अंतर है .पहले अटल-आडवानी की भाजपा थी ,पर आज मोदी और शाह की नयी भाजपा है.कल तक पिछली पंगत वाले अब आगे आ गए है.नया नेतृत्व है .नया उत्साह है .उस वक़्त कांग्रेस के अध्यक्ष से मिलना किसी के लिए बहुत बड़ी बात होती थी,आज भाजपा अध्यक्ष से मिलना बहुत बड़ी नहीं अति महत्वपूर्ण बात है.चाहे आप मीडिया से हो या आम जनता.तब बातें कम ,काम ज्यादा होते थे.आज बातें ज्यादा, काम बहुत कम हो रहे हैं .फिर भी पार्टी और सरकार बम बम है और कार्यकर्त्ता अचंभित .प्रधानमंत्री मोदी और अध्यक्ष अमित शाह के समक्ष पार्टी की ऐसी कई आंतरिक चुनौतियाँ से निपटना जरुरी होगा.बाहरी चुनौतियों को निबटने को लेकर तो  मोदी और शाह की जोड़ी एक्सपर्ट बताई जाती है.
आज की स्थितियां देखे तो 2014 के बाद कई नए समीकरण बने और बिगड़े है.सत्ता पर काबिज़ भाजपा विपक्ष के निशाने पर है.कल तक की लीडर कांग्रेस पार्टी क्षेत्रीय दलों की पिछलग्गू पार्टी बन चुकी है .78 सीट के वाबजूद 38 वाले को मुख्यमंत्री बना रही है .ऐसा क्यों ?ये कौन सी राजनीति है? ऐसा कई सवालो से  कांग्रेस भी अन्दर ही अंदर जूझ रही है.पर भाजपा के अंध विरोध के आगे सभी तर्क फेल हैं .शायद नए अध्यक्ष राहुल गाँधी का कोई नया चमत्कारिक फार्मूला बताया जा रहा है.
रही बात विपक्ष के बड़े बड़े नेताओ की साख और देश प्रेम की .तो चन्द्र बाबु नायडू ,चंद्रशेखर राव ,बहन मायावती,अखिलेश यादव ,तेजस्वी यादव,सीताराम येचुरी,शरद पवार,मुस्लिम लीग और तमाम छोटे बड़े दल क्या राष्ट्रीय दल भाजपा से किस प्रकार लोहा ले सकेंगे.ये एक बड़ा सवाल है? ज्यादातर राज्यों में कांग्रेस के पुराने  दुश्मन दल अगले लोक सभा चुनाव में सीटों का बंटवारा कैसे करेंगे? आम जनता को 1977,1996 के बाद के दुष्परिणामों से कैसे विश्वास जीत सकेंगे? देश का प्रधानमंत्री कौन होगा? उसकी राष्ट्रीय नीतियां क्या होगी? ये सब हालात तब ज्यादा मुश्किल पैदा करेंगे,जब कांग्रेस से कोई नेता नहीं बनेगा.जैसा कि ताज़ा घटनाओ के परिपेक्ष्य में कर्नाटक में हुआ है .
देश की आम जनता के साथ हम सब उस नए रोचक और अति रोमांचक राजनीतिक परिदृश्य का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे है,जिसकी सम्भावना कम दिख रही है .वैसे वैश्विक पटल पर देखा जाये तो देश को एक ऐसा स्थायी सरकार और मज़बूत नेता चाहिए.जो भाजपा ही दे सकती है ,जिसके नेता प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी है .देश को मज़बूत सरकार विपक्ष की ऐसी लुंज –पुंज व्यवस्था कतई नहीं दे सकती है,चाहे कोई कुछ भी बोले...
 


जानिए 2016 में कैसा रहेगा आपका भविष्य


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