19 जून 2017 की बात है.देश की सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के नाम पर विधिवत मुहर लगा दी थी.विपक्ष हैरान था और सत्ता पक्ष अति खुश नज़र आ रहा था.देश के सबसे बड़े टीवी चैनल दूरदर्शन के डीडी न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार अशोक श्रीवास्तव का फोन आया.उन्होंने कहा , राकेश जी,आज अपने “दो टूक” कार्यक्रम में राष्ट्रपति पद को लेकर सर्वसम्मति मसले पर चर्चा करनी है.मै तैयार हो गया और उस रोचक बहस में भाग लिया.बहस काफी सूचनापरक और रोचक रही.
बहस में सर्वसम्मति की वकालत सबने की .परन्तु कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता बेचारे श्री मीम अफज़ल साहब की स्थिति देखने लायक थी .व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने श्री कोविंद जी की तारीफों के पुल बांधे. उन्हें एक उम्दा,सम्वेदनशील इंसान,जमीन से जुड़ा एक निर्विवाद राजनेता बताया परन्तु जब सर्वसम्मति और पार्टी लाइन की बात आई,तो वह चुप कर गए.हालांकि कांग्रेस तब तक आम सहमति की तरफ झुकती दिख रही थी.जैसा कि उस दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद का बयान भी था.लेकिन कांग्रेस के बाल-हठ की वजह से देश के सर्वोच्च पद के लिए आम सहमति की जमीन तैयार नहीं की जा सकी.जबकि कांग्रेस को तब भी पता था और आज भी पता है कि पार्टी की उम्मीदवार श्रीमती मीरा कुमार हार जाएगी.शायद कांग्रेस की यही फितरत बन गयी है.
अनौपचारिक तौर पर विपक्ष के ज्यादातर दलों के नेताओ का भी  मानना है कि कुछ भी हो राम नाथ कोविंद जी ही भारत के 14 वें राष्ट्रपति बनेगे.मैंने भी उस दिन डीडी न्यूज़ पर तमाम आंकड़ो और राजनीतिक विश्लेषणों के मद्देनजर बताया था –राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी ही होंगे,चाहे कांग्रेस या कोई भी दल कुछ भी सोच ले या कर ले.
मेरा मानना है कांग्रेस मोदी-राज आने के बाद पिछले 3 सालो से जितनी भी गलतियाँ  की है ,उसमे राष्ट्रपति चुनाव में आम सहमति का विरोध भी एक ऐतिहासिक भूल है. ये बात दीगर है कि कांग्रेस अपने आपने खुश हो रही है कि उसने भाजपा के उस दलित कार्ड का मुद्दे को झटक लिया.श्री कोविंद जी और श्रीमती कुमार दोनों ही दलित हैं.
 वैसे राष्ट्रपति चुनाव में दलित और सुलझे विचारों के धनी श्री रामनाथ कोविंद को ऐन वक़्त पर विपक्षी दल जनता दल-यूनाइटेड के नेता नीतीश कुमार का समर्थन भी ये दर्शाता है कि श्री कोविंद जी ने बिहार में राज्यपाल रहते हुए अपने कार्य को पूरी तन्मयता और निष्पक्ष भाव से निभाया.
राष्ट्रपति चुनाव के परिपेक्ष्य में भाजपा ने देश में दलित राजनीति में एक नया आयाम को परिभाषित करने की कोशिश की है,जिसके दूरगामी परिणाम पार्टी की हित में देखने को मिल सकते है. उत्तरप्रदेश में विधान सभा चुनाव के बाद भाजपा को उस दलित और पिछड़ों को जोड़ने के अभियान को श्री कोविंद जी की उम्मीदवारी से एक नई उर्जा मिलेगी.वही कांग्रेस अपने ही बुने जाल में फंसती नज़र आ रही है.
दलित मसले पर भाजपा और कांग्रेस उम्मीदवारों को तौला जाये तो भाजपा का उम्मीदवार कई मामलो में सर्वश्रेष्ठ दिखता है.
कांग्रेस प्राचीन काल की दरबारी परंपरा की पोषक रही है.इसलिए कई घोटाले की आरोपी पूर्व केंद्रीय मंत्री और पूर्व लोक सभा अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार को उम्मीदवार बनाया. श्रीमती कुमार दलित राजनीति के नाम पर देश को बरगलाने वाले पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम की पुत्री है.दलगत राजनीति के तहत उन्हें दल-बदल का भी खासा अनुभव है.जब वो भारतीय विदेश सेवा में थी,तब भी कई विवादों से घिरी रही.बाद में जुगाड़ प्रबंधन की कला में निपुणता की वजह से कांग्रेस में पुनर्वास मिला.फिर कई प्रकार की कहानियों की केंद्र बिंदु रही.
वही श्री रामनाथ कोविंद ने जमीनी स्तर पर पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के साथ अपनी राजनीतिक यात्रा की शुरुआत की.वकालत की.राज्य सभा के 12 वर्षों तक सदस्य रहे और भाजपा दलित मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे और एक देश,एक पार्टी की नीति और भावना को आगे बढ़ाते हुए अब वें देश के 14वें राष्ट्रपति होंगे.श्री कोविंद उत्तरप्रदेश के कानपुर से हैं,जबकि श्रीमती कुमार बिहार के सासाराम से.
भाजपा के श्री राम नाथ कोविंद की कांग्रेस की मीरा कुमार से किसी भी प्रकार से तुलना नहीं हो सकती..श्री कोविंद ने निष्काम सेवा भाव से कई स्वयंसेवी संस्थाओ से जुड़कर का देश सेवा कर रहे है ,जबकि श्रीमती कुमार स्वयंसेवी संगठनो की मदद से स्वयं की सेवा ज्यादा और समाज की कम कर रही है.जो कि एक राष्ट्र चिन्तन का मुद्दा भी है.शायद इसलिए नरेन्द्र मोदी की सरकार ने शुरुआती दौर में गैर सरकारी संस्थानों की गतिविधियों को एक विशाल जांच के दायरे में लाया था,जिसके कई हैरतअंगेज परिणाम सामने आ रहे हैं.
राष्ट्रपति चुनाव में पूर्व उपराष्ट्रपति भैरों सिंह शेखावत की  चुनाव शैली के तहत भाजपा में “मोदी आतंक  इफ़ेक्ट” की वजह से भितरघात की आशंका बताई जा रही थी.इसकी खास वजह इस चुनाव में व्हिप का नहीं होना है.लेकिन वो कुछ हो भी जाता. भाजपा के कुछ त्रस्त नेताओ की अंतरात्मा जग भी सकती थी.यदि विपक्ष में श्रीमती मीरा कुमार की जगह पर कोई और दूसरा नेता होता.
 यदि हम राष्ट्रपति चुनाव की आंकड़ों पर नज़र डाले तो भाजपा के पास कुल 40 प्रतिशत वोट है ,जबकि कांग्रेस के पास 15 प्रतिशत.सत्ता पक्ष राजग के पास 67 प्रतिशत से ज्यादा वोट है.जबकि विपक्ष के पास शेष वोट में भी  कई किन्तु-परन्तु है.सीधी तौर पर देखा जाये तो राष्ट्रपति पद के लिए कुल वोट्स की संख्या 10 लाख 98 हज़ार 903 हैं.जीत के लिए 5 लाख 49 हज़ार 452 की जरुरत है.
राजग के पास 5 लाख 37 हज़ार 614 हैं.उन्हें जीत के लिए मात्र करीब 13 हज़ार से भी कम वोट्स की जरुरत है,जो कि उससे ज्यादा उनके पास है,जिनमे टी आर एस,जदयू,अन्नाद्रमुक और छोटे दलों ने श्री रामनाथ कोविंद को समर्थन की घोषणा कर दी है.विपक्ष के पास मात्र 4 लाख 2 हज़ार 230 वोट्स है.इसका मतलब कांग्रेस की चौतरफा हार निश्चित है.
लगता है कांग्रेस ने वो मुहावरा नहीं पढ़ा था –घर में नहीं दाने,अम्मा चली भुनाने.पर दिल बहलाने के लिए ग़ालिब ये भी ख्याल अच्छा है –शायद कांग्रेस को ग़ालिब की ये मशहूर पंक्तिया ज्यादा याद रही ,ऐसा प्रतीत होता है.
इसलिए हमारा मानना है भारत के 68 वें गणतंत्र के उपलक्ष्य में श्री रामनाथ कोविंद 17 जुलाई को 14 वें राष्ट्रपति के तौर पर निर्वाचित हो जायेंगे और वह अपने अपार अनुभवों से देश के लिए नए कीर्तिमान और प्रतिमान स्थापित कर विश्व भर ने भारत के झंडे को गौरवान्वित करेंगे.

 


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