प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सुशासन की नई परिभाषा की खोज में हैं.आम जनता के लिए एक सरकार का एक नया विकसित और आधुनिक मॉडल देने की कोशिश जारी है.कई प्रयोग कर चुके और आगे भी करने की तैयारी में हैं. इसलिए जब हरदीप सिंह पुरी,सत्यपाल सिंह,अलफोंस के. जैसे नौकरशाह रहे, नए किस्म के नेताओं को केंद्र सरकार में शामिल करने की खबर आई,तो एक नई ख़ुशी का एहसास हुआ. पर जब उनके विभागों की जानकारी मिली,बड़ी निराशा हुयी.पर मोदी की राष्ट्रीय भावनाओं और कर्तव्यों के मद्देनजर ऐसा लगता है ,शायद  कुछ जनपयोगी अच्छे परिणाम देखने को मिलेंगे.ऐसा अमेरिका और कनाडा के भी कई स्थानीय जन नेताओं और भारत के शुभ चिंतकों की सोच है.
वैसे ऐसे प्रयोगों की शुरुआत देश में  पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के कार्यकाल में हुयी थी,पर उस वक़्त भी वो उस हद तक सफल नहीं हो सके,जितनी अपेक्षा उन सब से की गयी थी.बाद के समय-समय पर सभी प्रधानमंत्रियों ने भी कई स्तर पर ऐसे प्रयोग किये थे.लेकिन वे वैसे अफसर उन पीएम की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरे नहीं उतर सके थे. 
1986  से बिहार से दिल्ली की यात्रा में राजनीति,सरकार और शासन के विभिन्न पहलुओं को काफी नजदीक से देखने का मौका मिला है.रिपोर्ट भी किया.समय-समय पर विश्लेषण भी .मैंने जिला.राज्य,केंद्र और कई देशो की राजनीति व शासन की कई कहानियों को काफी नजदीक से देखा,जाना और लिखा भी.
1989 से अब तक दिल्ली में विश्वनाथ प्रताप सिंह से डॉ मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल को भी काफी संज़ीन्दगी के साथ कवर किया .रिपोर्ट भी किया .कई प्रकार के मिश्रित अनुभव हैं .उन अनुभवों के आधार पर ऐसा लगता है कि कुछ को छोड़कर  बहुत कम संख्या में नौकरशाह एक अच्छे जननेता बन सके हैं .पिछले कई सालों में नौकरशाहों को राज्यपाल बनाये जाने पर कई मंचो से विरोध जताया गया.पहले मुहिम रुकी,फिर एक अल्प विराम के बाद चल पड़ी.
2014 से अब ये  मोदी काल है.देश के सभी प्रधानमंत्रियों से बिलकुल अलग काल.विशेष काल.नया काल.कई प्रकल्पो से युक्त एक विशेष काल ,जो कि देश में एक नया इतिहास रचने की तैयारी में है.हम सब देख रहे है ,आशा-विश्वास  भरी निगाहों से.शायद मोदी का ये राजकीय काल देश की समग्र प्रगति के  लिए “स्वर्णिम काल” साबित हो.
इस मोदी काल के अब नए नौ मंत्रियों में से चार विशेष मंत्रियों की चर्चा करते हैं .जो हम सबको एक नया नजरिया दे सकता है.श्री हरदीप सिंह पुरी को मै 1998 से लगातार देखा हूँ.वह उस वक़्त विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव थे.श्री के रघुनाथ विदेश सचिव थे.राष्ट्रपति डॉ नारायणन के साथ चार देशों की यात्रा में वह साथ थे.तब से लगातार सम्पर्क में रहे.2005 में स्विट्ज़रलैंड में थे .फिर न्यूयॉर्क के संयुक राष्ट्र के लिए भारत के स्थायी प्रतिनिधि.भाजपा के वरिष्ठ नेता राजनाथ सिंह के जरिये भाजपा में प्रवेश. जब उनके बारे में खबर मिली की श्री पुरी साहेब मंत्री बनने वाले हैं तो मेरे को लगा की श्री पुरी साहेब की वर्षो की तपस्या काम आएगी और भारत संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य बन जायेगा,जिससे भारत 1950 के दशक में पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की ऐतिहासिक गलती से मरहूम रह गया था.लेकिन जब श्री पुरी को देश के आवासीय मामलो का काम मिला तो मै भ्रमित हो गया.
वैसे ही मुबई के लोकप्रिय और ईमानदार पुलिस आयुक्त रहे डॉ सत्यपाल सिंह को लेकर हुआ.ये बात अलग है उनको मंत्री बनाये जाने से उत्तर प्रदेश में कई प्रकार की राजनीति शुरू हो गयी है.जाट जाति के श्री सिंह के लिए ये चुनौती भरा कार्य होगा.सत्यपाल जी से भी पिछले कई सालो से मुलाकात है.कई बार रूबरू का मौका मिला .विचारो के धनी डॉ सिंह  अपने पुलिस वाले अनुभव को अब शिक्षा विकास के साथ साथ गंगा की सफाई कैसे कर सकेंगे.ये देखना होगा.
श्री अलफोंस कन्नाथनम भी एक प्रखर नौकरशाह रहे हैं.1999-2004 के अटल सरकार में केंद्रीय मंत्री राम जेठमलानी के साथ निजी सचिव रहे.वो भी धाकड़ किस्म के .जो करना बिंदास करना.बिना किसी की परवाह किये बिना.आलोचना की चिंता रत्ती भर नहीं.केरल निवासी होने की वजह से अपनी बिरादरी का लाभ भी मिला.श्री अलफोंस उस वक़्त भी एक राजनेता की तरह व्यवहार करते थे.श्री जेठमलानी जी कहते थे.मै शो-पीस हूँ ,असली शहरी विकास मंत्री तो ये अपना मिस्टर अलफोंस है.हालांकि कालान्तर में श्री अलफोंस केरल से निर्दलीय विधायक भी रहे ,शायद वह मोदी के सुशासन विज़न को एक नयी उडान दे सके.
लेकिन देश के केन्द्रीय गृह सचिव रह चुके राजकुमार सिंह को लेकर पार्टी के अन्दर और बाहर काफी विरोध बताया जा रहा है.श्री सिंह पर प्रधानमंत्री श्री मोदी के गुरु और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को जेल भेजे जाने का भी आरोप है .श्री सिंह पर कर्नल पुरोहित हो या साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को जेल भेजकर अमानवीय तरीके से प्रताड़ित करवाए जाने का भी आरोप है.आखिर ये कैसे जादूगर है जो कांग्रेस राज में भी अध्यक्ष से लेकर प्रधान मंत्री के चहेते रहे और आज फिर से मलाई पा गए.केंद्र में गृह सचिव रहते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े कई अफसरों को भी श्री सिंह ने कई प्रकार से अंदरूनी प्रशासनिक यातनाएं दी.पर आज वह न जाने क्यों और कैसे .मोदी सरकार में मंत्री बन गए.संघ और भाजपा में कई वरिष्ठ नेता इस बात से चिंतित है और हतप्रभ भी.ये मोदी सुशासन को किसी प्रकार से मज़बूत कर सकेंगे.ये तो समय बताएगा.
डॉ सत्यपाल सिंह के अलावा सभी तीनो को प्रधानमंत्री ने  स्वतंत्र प्रभार वाला मंत्री बनाया है.वैसे इन चारो में दो श्री पुरी और श्री अलफोंस किसी सदन के सदस्य नहीं है.मतलब ये है कि इन दोनों की वजह से पार्टी को दो राज्य सभा सीट का भी त्याग करना पड़ेगा.जबकि ये भी तथ्य है कि पार्टी में इन चारो से ज्यादा कई काबिल नेता और सांसद आज भी पार्टी में मौजूद  हैं. 
कहते है कि यह भारतीय राजनीति का मोदी काल है.मोदी काल का मतलब आम जनता का काल .पर हो रहा कुछ उल्टा है.इसके साथ कई  कारणों से आम जनता और पार्टी कैडर दोनों के बीच निराशा भाव दिखने लगे है.  पिछले 3 सितम्बर को नौ नए मंत्री बनाये गए,कई  निकाले गए.कई खुद निकले.कईयों की प्रोन्नति हुई.जिनकी प्रोन्नति हुई.वे हतप्रभ है.जिनको निकाला गया वो परेशान.सब मौन है,चुप से है.प्रधानमंत्री के आगे सब नतमस्तक है.मकसद सत्ता का स्वाद है .क्योकि एक बात की गारंटी है .मोदी जी है तो क्या गम हैं.देश का काम हो या न हो .मोदी सब ठीक कर देंगे.बताया जाता है प्रधानमंत्री मोदी  इस समर्पण भाव की खबर से भी बहुत परेशान हैं.क्योकि कई मंत्रालयों में मंत्री और सचिवों के बीच तालमेल नहीं है ,तो कई मंत्रालयों में मंत्री बेचारे है .सचिव सबसे ताक़तवर. भारत जैसे लोकतंत्र के लिए ये स्थिति आम जन के लिए अनुकूल नहीं बताई जाती,इतिहास गवाह है.
2014 में सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी ने एक नारा दिया था -न्यूनतम सरकार और अधिकतम सुशासन का,पर आज जो हो रहा है.वह नयी सुशासन शैली के लिए आत्म परीक्षण की घडी है.हालाँकि  प्रधान मंत्री के  इस जन प्रिय फार्मूले को उनके सिपहसालारों और नौकरशाहों द्वारा अपने अपने सुविधा जनक तरीकों से परिभाषित किया जा रहा है.
 


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