दीपावली जैसे त्योहार के मौके पर खुशियों का इजहार करने के लिए बेहतर खानपान और रोशनी की सजावट से पैदा जगमग के अलावा कानफोडू पटाखों का सहारा लोगों को कुछ देर की खुशी तो दे सकता है, लेकिन उसका असर व्यापक होता है. पटाखों की आवाज और धुएं के पर्यावरण सहित लोगों की सेहत पर पड़ने वाले घातक असर के मद्देनजर इनसे बचने की सलाह लंबे समय से दी जाती रही है. ज्यादातर लोग इनसे होने वाले नुकसानों को समझते भी हैं, मगर इनसे दूर रहने की कोशिश नहीं करते. हालांकि पर्यावरणविदों से लेकर कई जागरूक नागरिकों ने इस मसले पर लोगों को समझाने से लेकर पटाखों पर रोक लगाने के लिए अदालतों तक का सहारा लिया है, लेकिन इन पर पूरी तरह रोक लगाने में कामयाबी नहीं मिल सकी. पिछले साल शीर्ष अदालत ने दीपावली से पहले पटाखों की बिक्री पर अस्थायी प्रतिबंध लगाया था, लेकिन व्यवहार में उसका कोई खास फर्क नहीं नजर आया. अब इस साल सर्वोच्च न्यायालय ने दीपावली और दूसरे त्योहारों के अवसर पर कुछ शर्तों के साथ पटाखे फोड़ने की इजाजत दे दी है. दशहरे पर अमृतसर में हुआ हादसा हो या पटाखों का बढ़ता प्रचलन- हमें आत्मचिन्तन को प्रेरित कर रहे हैं. हमारी संस्कृति में उत्सव और आनंद का महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन क्या पटाखों के धुएं एवं प्रदूषण में ही यह आनन्द मिलता है? क्या इस तरह हम अपने त्यौहारों की संस्कृति को नहीं धुंधला रहे हैं?  

जिन्दगी जब सारी रचनात्मकता एवं सृजनात्मकता स्वयं में समेटकर प्रस्तुति का बहाना मांगती है तब दीपावली जैसा त्यौहार प्रस्तुत होता है. यह पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की आपूर्ति करता है. शुष्क जीवन-व्यवहार के बोझ के नीचे दबा हुआ इंसान इस दिन थोड़ी-सी मुक्त सांस लेकर आराम महसूस करता है. जीवन की जड़ता उत्साह में बदल जाती है. हमारा देश ऐसे ही उत्सवों एवं त्यौहारों की वैभवता से सम्पन्न है, फिर भी यह सब हमारे सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में अभिव्यक्त क्यों नहीं हो पाता? यह जीवन इतना बंधा-बंधा सा क्यों है? ये कैसी दीवारें हैं? इतनी गुलामी, इतने दुख कहां से इस देश के हिस्से में आ गए? क्यों हम इन त्यौहारों की समृद्ध संस्कृति को भुलाकर कोरा भौतिकता का भौंड़ा प्रदर्शन करने पर तुले हैं? बात केवल दीपावली की ही नहीं है, बल्कि भारत के त्यौहारों की संस्कृति की है. त्यौहारों की संस्कृति न केवल मनुष्य की आत्मा की वाहक है बल्कि एक राष्ट्र का मूल भी है. विभिन्न देशों में अलग-अलग संस्कृतियां हैं चूंकि त्यौहार किसी देश की सबसे अच्छी सांस्कृतिक उपलब्धियों और सबसे महत्वपूर्ण रिवाजों का प्रतिनिधित्व करता है. त्योहार एक सांस्कृतिक घटना है और संस्कृतियों के अध्ययन के लिए एक शक्तिशाली उपकरण भी है. त्योहार को ‘संस्कृति का वाहक’ माना जाता है. त्योहार किसी देश, समाज और संस्कृतियों के व्यवहार और विचारों का प्रतिबिम्बन माना जाता है.

पर्व, व्रत, त्योहार एवं उत्सव सामाजिक सरोकार के अद्भुत संगम एवं समन्वय के मूर्त रूप हैं. यदि हम असामाजिक एवं संवेदनशून्य बनने की दिशा में अग्रसर रहेंगे तो हमारी यह मूल्यवान् संस्कृति जड़ बनकर पतनोन्मुख हो सकती है. हजारों-हजारों साल से जिस प्रकृति ने भारतीय मन को आकार दिया था, उसे रचा था, भारतीयता की एक अलग छवि का निर्माण हुआ, यहां के इंसानों की इंसानियत ने दुनिया को आकर्षित किया, संस्कृति एवं संस्कारों, जीवन-मूल्यों की एक नई पहचान बनी.  ऐसा क्या हुआ कि पिछली कुछ सदियों में उसके साथ कुछ गलत हुआ है, और वह गलत दिनोदिन गहराता गया है जिससे सारा माहौल ही प्रदूषित हो गया है, जीवन के सारे रंग ही फिके पड़ गये हैं, हम अपने ही भीतर की हरियाली से वंचित हो गए लोग हैं. न कहीं आपसी विश्वास रहा, न किसी का परस्पर प्यार. न सहयोग की उदात्त भावना रही, न संघर्ष में सामूहिकता का स्वर, बिखराव की भीड़ में न किसी ने हाथ थामा, न किसी ने आग्रह की पकड़ छोड़ी. यूं लगता है सब कुछ खोकर विभक्त मन अकेला खड़ा है फिर से सब कुछ पाने की आशा में. क्या यह प्रतीक्षा झूठी है? क्या यह अगवानी अर्थशून्य है?  
मनुष्य जीवन बड़ी मुश्किल से मिलता है. इसलिये कल पर कुछ मत छोड़िए. कल जो बीत गया और कल जो आने वाला है- दोनों ही हमारी पीठ के समान हैं, जिसे हम देख नहीं सकते. आज हमारी हथेली है, जिसकी रेखाओं को हम देख सकते हैं. हम आज एक नए जीवन के द्वार पर खड़े हैं. अतीत के सारे इतिहास को एक नया रूप दे देने वाले संसाधनों के साथ. इन संसाधनों में सबसे प्रमुख साधन विचार हैµऐसा विचार जो विश्लेषणों और कारणों तक पहुंचता है. बीते जमाने में महावीर इसी विचार के पथ पर चल दुख के कारणांे तक पहुंचे थे, पर इसके पहले उन्होंने राजगृह से निकल, जाने कितने वनों और बस्तियों की यात्राएं कीं. यह ज्ञान की, संवेदना की, बोध की यात्रा थी. 
देश को अपनी खोयी प्रतिष्ठा पानी है, उन्नत चरित्र बनाना है तथा स्वस्थ समाज की रचना करनी है तो हमें एक ऐसी जीवनशैली को स्वीकार करना होगा जो जीवन में पवित्रता दे. राष्ट्रीय प्रेम व स्वस्थ समाज की रचना की दृष्टि दे. कदाचार के इस अंधेरे कुएँ से निकले. बिना इसके देश का विकास और भौतिक उपलब्धियां बेमानी हैं. व्यक्ति, परिवार और राष्ट्रीय स्तर पर हमारे इरादों की शुद्धता महत्व रखती है, हमें खोज सुख की नहीं सत्व की करनी है क्योंकि सुख ने सुविधा दी और सुविधा से शोषण जनमा जबकि सत्व में शांति के लिये संघर्ष है और संघर्ष सचाई तक पहुंचने की तैयारी. हमें स्वयं की पहचान चाहिए और सारे विशेषणों से हटकर इंसान बने रहने का हक चाहिए. इस खोए अर्थ की तलाश करनी ही होगी. उपभोक्ता बनकर नहीं मनुष्य बनकर जीना नए सिरे से सीखना ही होगा. संस्कृति और मूल्यों के नष्ट अध्यायों को न सिर्फ पढ़ना होगा, बल्कि उन्हें नया रूप और नया अर्थ भी देना होगा. एक नई यात्रा शुरू करनी होगी. इसके लिये हमारे पर्वों एवं त्यौहारों की विशेष सार्थकता है. श्रीकृष्ण ने कहा है- जीवन एक उत्सव है. उनके इस कथन पर भारतीयों का पूर्ण विश्वास है. हम जीवन के हर दिन को उत्सव की तरह जीते हैं, ढेरों विसंगतियों और विदू्रपताओं से जूझते हुए. संकट में होशमंद रहने और हर मुसीबत के बाद उठ खड़े होने का जज्बा विशुद्ध भारतीय है और ऋतु-राग गुनगुनाते हुए अलग-अलग मौसम में उत्सव मनाने का भी. यही वजह है कि हम गर्व से कहते हैं- फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी... पर इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि बदलती दुनिया के असर से उत्सवधर्मिता का जज्बा काफी प्रभावित हो रहा है. सबसे ज्यादा हमारे पर्व और त्यौहार की संस्कृति ही धुंधली हुई है. खेद की बात है कि हमने पश्चिम की श्रेष्ठ परम्पराओं को आत्मसात नहीं किया, बल्कि उसके साम्राज्यवाद के शिकार बने. 
हमें भारतीय पर्व और त्यौहार की संस्कृति को समृृद्ध बनाना होगा. हर पर्व एक तलाश होती हैµअपनी और उस अछोर जीवन की, उस विराट प्रकृति की, हमारा अस्तित्व जिसकी एक कड़ी है. इसीलिए हर पर्व से कुछ न कुछ मिलता जरूर है. पर्व हमें भीतर से समृद्ध करते हैं. हमारे जीवन को एक गहराई देते हैं. हमें देना सिखाते हैं. किसी भोर का उगता सूरज, कोई बल खाती नदी, दूर तक फैला कोई मैदान, कोई चरागाह, कोई सिंदूरी शाम, दूर गांव से आती कोई ढोलक की थाप, पीछे छूटती दृश्यावलियंा... हमारे भीतर रच-बस जाती हैं. यही सब जीवन की संपदाएं हैं, हमारे अंतर में जगमगाती-कौंधती रोशनियां हैं, जिनकी आभा में हम उस सब को पहचान पाते हैं जो जीवन है, जो हमारी पहचान के मानक हैं. हम भारत के लोग इसलिए विशिष्ट नहीं हैं कि हम ‘जगतगुरु’ रहे हैं, या हम महान आध्यात्मिक अतीत रखते हैं. हम विशिष्ट इसलिए हैं कि हमारे पास मानवता के सबसे प्राचीन और गहरे अनुभव हैं. ये अनुभव सिर्फ इतिहास और संस्कृति के अनुभव नहीं हैं, इसमें नदियों का प्रवाह, बदलते मौसमों की खुशबू, विविध त्यौहारों की सांस्कृतिक आभा और प्रकृति का विराट लीला-संसार समाया हुआ है. हमारे पर्व और त्यौहार की संस्कृति दिशासूचक बने. गिरजे पर लगा दिशा-सूचक नहीं, वह तो जिधर की हवा होती है उधर ही घूम जाता है. कुतुबनुमा बने, जो हर स्थिति मे ंसही दिशा बताता है.
 भारत त्यौहार और मेलों का देश है. वस्तुतः वर्ष के प्रत्येक दिन उत्सव मनाया जाता है. पूरे विश्व की तुलना में भारत में अधिक त्यौहार मनाए जाते हैं. प्रत्येक त्यौहार अलग अवसर से संबंधित है, कुछ वर्ष की ऋतुओं का, फसल कटाई का, वर्षा ऋतु का अथवा पूर्णिमा का स्वागत करते हैं. दूसरों में धार्मिक अवसर, ईश्वरीय सत्ता-परमात्मा व संतों के जन्म दिन अथवा नए वर्ष की शरूआत के अवसर पर मनाए जाते हैं. ये पर्व-उत्सव उपयोगी संदेश देते है. सम्यक दिशा दिखाने वाले को मार्गदर्शक कहा जाता है, इस तरह उत्सव एक उत्कृष्ट के रूप में हमारे सामने उपस्थित होते हैं. जीवन को कहंा बांधना चाहिए, कौन-सी दिशा में मानव की गति होनी चाहिए वगैरह बातों का सुंदर सूचन इन उत्सवों में छिपा होता है. भारत का समूचा सांस्कृतिक इतिहास किताबों के पन्नों में नहीं परन्तु उसके जीवंत उत्सवों में लिखा हुआ है. इन उत्सवों के अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधलाने से बचाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए.
 


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