अमेरिका के वर्जीनिया में भारतीय प्रवासियों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को अमेरिका बनाकर दिखाने का संकल्प व्यक्त किया है. 66 साल के मोदी ने अपनी इसी जिन्दगी में ऐसा करने का विश्वास व्यक्त करना कहीं अतिश्योक्ति तो नहीं है? लेकिन बड़े सपने हमें वहां तक नहीं तो उसके आसपास तो पहुंचा ही देते हैं, इसलिये मोदी के इस संकल्प को सकारात्मक नजरिये से ही देखा जाना देश के हित में है. उन्होंने उत्तर प्रदेश के चुनाव में जीत के बाद भाजपा मुख्यालय, दिल्ली में नये भारत को निर्मित करने का संकल्प लिया था. इन सुनहरे सपनों के बीच का यथार्थ बड़ा डरावना एवं बेचैनियों भरा है. देश की युवापीढ़ी बेचैन है, परेशान है, आकांक्षी है और उसके सपने लगातार टूट रहे हैं. देश का व्यापार धराशायी है, आमजनता अब शंका करने लगी है. इन हालातों में नया भारत बनाना या उसे अमेरिका बनाकर दिखाना एक बड़ी चुनौती है. 
भारत नया बनने के लिए, स्वर्णिम बनने के लिए, अनूठा बनने के लिए और उसे अमेरिका बनाकर दिखाने के लिये अतीत का बहुत बड़ा बोझा हम पर है. बेशक हम नये शहर बनाने, नई सड़कें बनाने, नये कल-कारखानें खोलने, नई तकनीक लाने, नई शासन-व्यवस्था बनाने के लिए तत्पर हैं लेकिन मूल प्रश्न है आम आदमी की अपेक्षाओं पर हम कैसे खरे उतरेंगे?
यह निश्चित है कि मोदी के नेतृत्व में एक नई सभ्यता और एक नई संस्कृति गढ़ी जा रही है. नये विचारों, नये इंसानी रिश्तों, नये सामाजिक संगठनों, नये रीति-रिवाजों और नयी जिंदगी की हवायें लिए हुए आजाद मुल्क की गाथा सुनाता भारत एक बड़ा सवाल लेकर भी खड़ा है कि हम अपनी बुनियादी जरूरतों एवं परेशानियों से कब मुक्त होंगे? हममें इंसानियत कितनी आई है? यह एक बड़ा सवाल है. हमारी राजनीति के एजेंडे पर यह सवाल कहीं नहीं है. हमारा धर्म भी इस सवाल से मुंह चुराने लगा है. लेकिन यह सवाल तब जरूर उठेगा जब आने वाले बीस-तीस सालों में हम आधुनिक भारत खड़ा कर चुके होंगे. यह सवाल जिंदगी की सारी दिशाओं से उठेगा और यह पूछेगा, इन सुविधाओं के बीच में हम जो इंसान है उनके जीवन मूल्य कहां है? एक स्वर्णिम भारत के लिए नैतिक मूल्य बुनियादी आवश्यकता है.
एक नया भारत बन रहा है. हालांकि इस भारत के बनने में बहुत कुछ टूट गया है, बहुत कुछ पीछे छूट गया है. पर यहां से लौटा नहीं जा सकता. आज बदलाव के एक नये मोड़ पर देश खड़ा है. जहां बहुत पीछे छूट गये समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व के सपने हैं. उपभोग में केन्द्रित होता समूचा मानवीय जीवन है. भारत जिन राहों को छोड़कर आगे बढ़ रहा है, उन राहों पर उसका कुछ कीमती साजों-सामान छूटता जा रहा है. विकास के बड़े और लुभावनें सपनों के साथ-साथ हम विवेक को कायम रखें, नैतिक मूल्यों को जीवन का आधार बनाएं. जिस प्रकार गांधीजी ने ‘मेरे सपनों का भारत’ का पुस्तक लिखी, उन्होंने अपने सपनों में हिन्दुस्तान का एक प्रारूप प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने गरीबी, धार्मिक संघर्ष, अस्पृश्यता, नशे की प्रवृत्ति, मिलावट, रिश्वतखोरी, शोषण, दहेज और वोटों की खरीद-फरोख्त को विकास के नाम विध्वंस का कारण माना. उन्होंने स्टैंडर्ड आॅफ लाइफ के नाम पर भौतिकवाद, सुविधावाद और अपसंस्कारों का जो समावेश हिन्दुस्तानी जीवनशैली में हुआ है उसे उन्होंने हिमालयी भूल के रूप में व्यक्त किया है. 
मोदीजी का जादू अब तक सिर चढ़कर बोल रहा था, लेकिन वर्जीनिया में भी उसका असर उतरा हुआ दिखाई दिया. वहां 600 से ज्यादा प्रवासी भारतीय शामिल हुए, लेकिन यह संख्या 2014 में मैडिसन स्क्वेयर में जुटे लोगों की तुलना में बहुत कम थे. ठीक इसी तरह उनका सर्वाधिक जादू युवाओं पर था. उत्तर प्रदेश के चुनाव तक मोदीजी की जनसभाओं में आती युवा भीड़ से जब वे मुखातिब होते युवाओं के मुंह से ‘मोदी मोदी’ निकलता था. लेकिन इन्हीं आकांक्षी युवाओं के सपने बिखर रहे हैं, वे बेरोजगार हो रहे हैं, उनका भविष्य धुंधला रहा है. इन पैंतीस बरस से कम उम्र के पैंसठ फीसद आकांक्षी युवाओं नाराज होना, बेचैन होना नया भारत की सबसे बड़ी बाधा साबित हो सकता है.
अमेरिका के कारोबारी दिग्गजों को संबोधित करते हुए मोदी ने भरोसा दिलाना चाहा कि भारत आर्थिक सुधारों की राह पर चल रहा है और भारत में निवेश करना तथा व्यापार करना पहले से कहीं आसान हो गया है, इसलिए भारत में पूंजी लगाने में वे तनिक न हिचकें. आर्थिक सुधारों की दिशा में अपनी सरकार के नए व बड़े कदम के रूप में उन्होंने वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की चर्चा की. इसी के साथ उन्होंने भारत-अमेरिका का व्यापार कुछ ही बरसों में कई गुना बढ़ जाने की उम्मीद जताई. लेकिन हकीकत के धरातल पर देखें तो कहां खड़े हैं! देश का युवा विदेश में ही नहीं देश में भी बेरोजगार हो रहा है. नोटबंदी के बाद आर्थिक वृद्धि दर में आई कमी से दुनिया वाकिफ है. विडंबना यह है कि अमेरिका कहीं ज्यादा सुरक्षित होकर चल रहा है. इसके चलते भारत का आइटी उद्योग बुरी तरह प्रभावित हो रहा है, जिसकी कमाई का साठ फीसद अमेरिकी स्रोत से आता है. मोदी की इस अमेरिका यात्रा की अहमियत जाहिर है और इसे संभावनाभरा भी माना जा रहा है. डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यह अमेरिका का उनका पहला सफर है. ट्रंप के साथ वाइट हाउस में मोदी की होने वाली मुलाकात से पहले दो-तीन घटनाओं ने यही जताया कि संबंधों को और प्रगाढ़ करने की ललक दोनों तरफ है. मोदी की इस यात्रा के पीछे इरादा केवल भावनात्मक रिश्तों की बुनियाद को मजबूत करना नहीं है, बल्कि भारत के हक में अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करने के लिए उनका सहयोग पाने की मंशा भी है. संभव है इससे भारत और अमेरिका दोनों ही देशों में विकास के नये रास्तें खुलेंगे.  
विदेशों में भारत की स्थिति को मजबूत बनाना अच्छी बात है, लेकिन देश में बदलते हालातों पर निगाह एवं नियंत्रित भी जरूरी है. ऐसा नहीं होने का ही परिणाम है कि तीन साल से लगातार युवा पीढ़ी निराशाओं से घिरती जा रही है. उनको नजरअंदाज करने की ही निष्पत्तियां कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सिर उठा रही हैं. जो युवा मोदीजी को वोट देता गया जिताता गया. अब वही कभी गुजरात में कभी महाराष्ट्र में कभी तमिलनाडु में कभी मध्यप्रदेश में कभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कभी हरियाणा में और अब दार्जीलिंग में पूछने लगा है कि क्या हुआ हमारे सपनों का? नया भारत हमारी बेचैनियों पर कैसे खड़ा करोंगे? भारत को अमेरिका बनाने का सपना प्रतीक्षारत आकांक्षाओं की निष्फलताओं से उपजी नाराजियां के रहते हुए कैसे संभव होगा? इस सबके होते हुए भी सड़कों, खेतों व कारखानों में काम करने वाला यही कहता है ”कोऊ नृप हो हमें का हानि“ पर काॅफी हाउस में बैठे प्रबुद्ध चिन्तक, देश को सभी दृष्टियों से आगे देखने वाले सार्वजनिक कार्यकत्र्ता, पसीने में डूबी कलम से राष्ट्रीय चरित्र व राष्ट्रीय एकता पर गीत रचने वाले तथा चारों तरफ खुशहाली की कल्पना संजोए शांतिप्रिय नागरिक ऐसी स्थिति में यही कहते हैं कि.... कोऊ नृप हो हमें  ही हानि.
भारत में आबादी का छठा हिस्सा बेरोजगार है और हम वैश्वीकरण की ओर जा रहे हैं, अमेरिका बनने की सोच रहे है, नया भारत बना रहे हैं. यह खोखलापन है. बहुत आवश्यक है संतुलित विकास की अवधारणा बने. केवल एक ही हाथ की मुट्ठी भरी हुई नहीं हो. दोनों मुट्ठियां भरी हों. वरना न हम नया भारत बना पायेंगे और न हम अमेरिका जैसा बन पायेंगे. 


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