पिछले लम्बे दौर से हमारे नेता देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दर्शन, उनके व्यक्तित्व, उनकी बढ़ती ख्याति व उनकी कार्य-पद्धतियों  पर कीचड़ उछाल रहे हैं अमर्यादित भाषा का उपयोग कर रहे हैं और उन्हें गालियां देकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं. इस तरह कांग्रेस नेताओं द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए अमर्यादित भाषा का प्रयोग करना कोई नई बात नहीं है. आए दिन कोई-न-कोई कांग्रेस नेता प्रधानमंत्री मोदी के लिए अपशब्द कहता ही रहता है. ताजा मामला कांग्रेस के पूर्व केबिनेट मंत्री मणिशंकर अय्यर से जुड़ा है जिन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को ‘नीच’ तक कह डाला है. इस बयान के बाद कांग्रेस पार्टी की न केवल फजीहत हो रही है, बल्कि उसकी बौखलाहट को दर्शा रही है. 

ये वे ही मणिशंकर अय्यर जो अपने बड़बोलेपन, अशिष्ट एवं अशालीन भाषा के लिये चर्चित है. इस तरह के लोग राजनीति में जगह बनाने के लिये ऐसी अनुशासनहीनता एवं अशिष्टता करते हैं. यह पहला अवसर नहीं है जब अय्यर इस तरह के ओछे, स्तरहीन एवं अशालीन शब्दों का प्रयोग किया है. इससे पहले उन्होंने 3 मार्च, 2013 को  नरेंद्र मोदी को सांप, बिच्छू और गंदा आदमी कहा था. उन्होंने नवंबर, 2012 की एक चुनावी रैली में नरेंद्र मोदी को लहू पुरुष, पानी पुरुष और असत्य का सौदागर भी बताया. सत्ता के शीर्ष पर बैठकर यदि इस तरह जनतंत्र के आदर्शों को भुला दिया जाता है तो वहां लोकतंत्र के आदर्शों की रक्षा नहीं हो सकती. राजनैतिक लोगों से महात्मा बनने की आशा नहीं की जा सकती, पर वे अशालीनता एवं अमर्यादा पर उतर आये, यह ठीक नहीं है. महात्मा गांधी ने कहा था कि मेरा ईश्वर दरिद्र-नारायणों में रहता है.’ आज यदि उनके भक्तों- कांग्रेसजनों से यही प्रश्न पूछा जाये तो संभवतः यही उत्तर मिलेगा कि हमारा ईश्वर कुर्सी में रहता है, सत्ता में रहता है. तभी उनमें अच्छाई-बुराई न दिखाई देकर केवल सत्तालोलुपता दिखती है.  

बात केवल अय्यर ही नहीं है, कौन भूल सकता है सोनिया गांधी का वह बयान, जिसने वास्तव में गुजरात की जनता को झकझोर कर रख दिया था. तब सोनिया ने गुजरात के तत्कालीन और बेहद लोकप्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ बताया था. सोनिया ने कहा था, “मेरा पूरा भरोसा है कि आप ऐसे लोगों को मंजूर नहीं करेंगे जो जहर का बीज बोते हैं.“ ‘मौत का सौदागर’ के बाद ‘जहर की खेती’ के इस बयान ने गुजरात ही नहीं, देश की जनता की भावना को जगा दिया. नतीजा लोकसभा चुनाव के परिणाम के रूप में सामने आया, जिसमें बीजेपी को 278 और कांग्रेस को 45 सीटें मिली. जनता को बेवकूफ एवं नासमझ समझने की भूल कांग्रेस बार-बार करती रही है और बार-बार मात खाती रही है. 

गुजरात चुनाव के ठीक पहले अय्यर का बयान क्या रंग लायेगा, यह भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन स्वस्थ एवं आदर्श लोकतंत्र के लिये देश के प्रधानमंत्री के लिये इस तरह के निम्न, स्तरहीन एवं अमर्यादित शब्दों का प्रयोग होना, एक विडम्बना है, एक त्रासदी है, एक शर्मनाक स्थिति है. केवल कांग्रेस ही नहीं, अन्य राजनीतिक दल के नेता भी ऐसी अपरिपक्वता एवं अशालीनता का परिचय देते रहे हैं. बात 6 अक्टूबर, 2016 की है जब देश सर्जिकल स्ट्राइक पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की जय-जयकार कर रहा था. विरोधी भी चुप रहने को मजबूर थे. हां, केजरीवाल जरूर सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांग रहे थे. तभी यूपी चुनाव की तैयारी कर रहे राहुल गांधी किसान यात्रा से लौटने के बाद आत्मघाती हमला कर बैठे उस सर्जिकल स्ट्राइक पर, जिसमें पहली बार पाकिस्तान में घुसकर हिन्दुस्तान ने आतंकी ठिकानों को नष्ट किया था, जिसकी दुनिया में सबने सराहना की, पाकिस्तान उफ तक नहीं कर पाया. राहुल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर ‘खून की दलाली’ करने का आरोप लगा डाला. असमय दिये गये इस तरह के बयानों के कारण ही लोगों ने राहुल को पप्पू कहना शुरु कर दिया. 

ये तथाकथित लेता गाली ही नहीं देते रहे, बल्कि गोली तक की भाषा का इस्तेमाल करते रहे हैं. लेकिन कोई गाली या गोली मोदी का बाल भी बांका नहीं कर सकेंगी क्योंकि वे जनसमर्थन इन ऊंचाइयों को पाया है. बात तब की है जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार थे, उस समय उन्हें बोटी-बोटी काट देने की धमकी खुलेआम दी गयी. लोकसभा चुनाव के दौरान सहारनपुर में कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद ने 28 मार्च, 2014 को यह बयान देकर यूपी ही नहीं पूरे देश में नफरत की सियासत को हवा देने की कोशिश की. प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने तो इस बयान का कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन जनता ने इसका जवाब दिया. नरेन्द्र मोदी को न सिर्फ भारी बहुमत से देश का प्रधानमंत्री बनाया, बल्कि इमरान मसूद की रखवाली कर रही कांग्रेस को धूल चटा दी. खुद इमरान की हार तो जिक्र करने वाली बात भी नहीं. कांग्रेस फिर भी जनता के फैसले से सबक लेने को तैयार नहीं दिखती. बिहार कांग्रेस के नेता जलील मस्तान ने अभद्रता की सारी हदें ही पार कर दी. उन्होंने एक कार्यक्रम के दौरान अपनी पार्टी के कार्यकर्ता से नरेंद्र मोदी की तस्वीर पर जूते मरवाए और जब इस कांग्रेसी मंत्री का मन नहीं भरा तो उन्होंने प्रधानमंत्री को नक्सली, उग्रवादी और डकैत तक कह डाला. आखिर जलील की जुबां पर ताला लगता भी कैसे जब खुद पार्टी की मुखिया सोनिया गांधी प्रधानमंत्री को मौत का सौदागर कह चुकी थी.

नोटबंदी को लेकर जहां पूरा देश नरेन्द्र मोदी के साथ खड़ा, विपक्ष को काले कारोबारियों के साथ खड़ा होने में जरा भी शर्म नहीं आई. विपक्ष ने दुनिया के कुख्यात रहे तानाशाह हिटलर, मुसोलिनी, कर्नल गद्दाफी से प्रधानमंत्री की तुलना कर डाली. राज्यसभा में प्रमोद तिवारी ने ये शर्मनाक बयान दिया जिस पर खूब हंगामा मचा. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देश की जनता की फिक्र थी, चंद विरोधियों की नहीं. हर सर्वे में लोगों ने पीएम के एक्शन को सही ठहराया और ‘थोड़ी परेशानी बड़ा मकसद’ से जुड़े रहे. कांग्रेस नेता राशिद अल्वी ने एक निजी समाचार चैनल इंडिया टीवी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर अपमानजनक बात कह दी. 16 मई, 2016 को टीवी कार्यक्रम में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मोस्ट स्टूपिड प्राइम मिनिस्टर बता दिया. अल्वी के इस विवादित कमेंट के बाद वहां मौजूद लोग बुरी तरह भड़क गए. कांग्रेस नेता के खिलाफ लोगों ने ‘शर्म करो’, ‘शर्म करो’ के नारे लगाए. किसी ने मोदी को रैबिज से पीड़ित बताया तो किसी ने उन्हें केवल चूहे मात्र माना. चायवाले से तो वे चर्चित हैं. लेकिन मोदी के व्यक्तित्व की ऊंचाई एवं गहराई है कि उन्होंने अपने विरोध को सदैव विनोद माना.

ये मणिशंकर, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, अरविन्द केजरीवाल, राशिद अल्वी, दिग्विजय सिंह, इमरान मसूद, प्रमोद तिवारी सभी राजनीति कर सकते हैं और उसके लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते हैं. उनका लक्ष्य ”वोट“ है. सस्ती लोकप्रियता है. मोदी किसी मणिशंकर, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, अरविन्द केजरीवाल के प्रमाणपत्र के मोहताज नहीं है. उनको कितने बार कटघरे में खड़ा किया जाता रहा है. चुनाव का समय हो या सामान्य कार्य के दिवस मोदी ने कम गालियां नहीं खाईं. उनके विचारों को, कार्यक्रमों को, देश के लिये कुछ नया करने के संकल्प को बार-बार मारा जा रहा है. 

मोदी को गाली देने की जो परिपार्टी बड़े नेताओं ने शुरू की है, उसका असर यह है कि छोटे स्तर पर भी मर्यादा टूट रही है. अय्यर अंतिम नहीं है. यह चलता रहेगा. चलना चाहिए भी. कभी-कभी प्रशंसा नहीं गालियां मोदी को ज्यादा प्रतिष्ठा देती हैं, ज्यादा जनप्रिय बनाती है, जनता का समर्थन देती है. पर अय्यर भी जाने कि बिना श्रद्धा, प्रेम, सत्य, त्याग, राष्ट्रीयता के कोई विचार, आन्दोलन या पार्टी नहीं चल सकती.

जो मानसिकता बोटी-बोटी कर सकती है, वह गाली दे तो क्या आश्चर्य? पर नरेन्द्र मोदी भारत की आजादी के बाद बनी सरकारों के अकेले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हंे कोई गोली या गाली नहीं मार सकती. क्योंकि मोदी की राजनीति व धर्म का आधार सत्ता नहीं, सेवा है. जनता को भयमुक्त व वास्तविक आजादी दिलाना उनका लक्ष्य है. वे सम्पूर्ण भारतीयता की अमर धरोहर हैं. भ्रष्टाचार उन्मूलन, कालेधन पर शिकंजा कसने, वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने, नया भारत निर्मित करने, स्वच्छता अभियान, दलितों के उद्धार और उनकी प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन समर्पित कर रखा है. उनके जीवन की विशेषता कथनी और करनी में अंतर नहीं होना है. ये आज के तथाकथित ”नव मनु“ बड़ी लकीर नहीं खींच सकते. वे दूसरी को काटकर झूठी हुंकार भरते हैं. आज जैसे बुद्धिमानी एक ”वैल्यू“ है, वैसे बेवकूफी भी एक ”वैल्यू“ है और मूल्यहीनता के दौर में यह मूल्य काफी प्रचलित है. आज के माहौल में इस ”वैल्यू“ को फायदेमंद मानना राजनीति की एक अपरिपक्वता एवं नासमझी ही कही जायेगी. ऐसा अय्यर के साथ जो हुआ, उसे देखते हुए कहा जा सकता है. अय्यर की फिसली जुबान ने बीजेपी को संजीवनी ही दी है और गुजरात में कांग्रेस के जीत का जायका बिगड़ता हुआ नजर आ रहा है.


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