भारत एक है, संविधान एक है.लोकसभा एक है.सेना एक है.मुद्रा एक है.राष्ट्रीय ध्वज एक है.लेकिन इन सबके अतिरिक्त बहुत कुछ और है जो भी एक होना चाहिए.बात चाहे राष्ट्र भाषा हो या राष्ट्र गान या राष्ट्र गीत- इन सबको भी समूचे राष्ट्र में सम्मान एवं स्वीकार्यता मिलनी चाहिए.राष्ट्र भाषा हिन्दी को आजादी के 72वर्ष बीत जाने पर भी अपने ही देश में घोर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है, जो राष्ट्रीय शर्म का विषय है, जबकि विश्व में हिन्दी की ताकत बढ़ रही है, जिसका ताजा प्रमाण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) द्वारा हिन्दी में ट्वीटर सेवा शुरु करना.देश के सम्मान में उस समय और अधिक इजाफा हुआ जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने ट्विटर पर हिंदी में अपना अकाउंट बनाया और हिंदी भाषा में ही पहला ट्वीट किया.

पहले ट्वीट में लिखा संदेश पढ़कर हर भारतीय का सीना गर्व से चैड़ा हो गया है.इतना ही नहीं संयुक्त राष्ट्र संघ ने फेसबुक पर भी हिंदी पेज बनाया है.साथ ही साथ साप्ताहिक हिन्दी समाचार भी सुने जा सकेंगे.भारत सरकार के प्रयत्नों से हिन्दी को विश्वस्तर पर प्रतिष्ठापित किया जा रहा है, यह सराहनीय बात है.लेकिन भारत में उसकी उपेक्षा कब तक होती रहेगी? 
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार को चाहिए कि वह ऐसे आदेश जारी करे जिससे सरकार के सारे अंदरुनी काम-काज भी हिन्दी में होनेे लगे और अंग्रेजी से मुक्ति की दिशा सुनिश्चित हो जाये.अगर ऐसा होता है तो यह राष्ट्रीयता को सुदृढ़ करने की दिशा में एक अनुकरणीय एवं सराहनीय पहल होगी.ऐसा होने से महात्मा गांधी, गुरु गोलवलकर और डाॅ. राममनोहर लोहिया का सपना साकार हो सकेगा.देश की जनता भी हिन्दी को उचित सम्मान दें एवं उसे अपने जीवन में प्रतिष्ठापित करें.भारतीय जनता की दुर्बलता एवं सबसे बड़ी कमजोरी रही है कि हिन्दी को उसका उचित स्थान और सम्मान नहीं मिल पाया है.नेता हो या जनता- हिन्दी की यह दुर्दशा एवं उपेक्षा सोचनीय है.अत्यन्त सोचनीय है.खतरे की स्थिति तक सोचनीय है कि आज का तथाकथित नेतृत्व दोहरे चरित्र वाला, दोहरे मापदण्ड वाला बना हुआ है.उसने कई मुखौटे एकत्रित कर रखे हैं और अपनी सुविधा के मुताबिक बदल लेता है, यह भयानक स्थिति है.इसी कारण हिन्दी को आज भी दोयम दर्जा हासिल है.

मॉरिशस में होने वाले 11वें विश्व हिन्दी सम्मेलन में गोस्वामी तुलसीदास, महानकवि अभिमन्यु अनंत व गोपालदास के नाम पर सभागार बनाए गए हैं.विदेशमंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के इस कथन से एक नया विश्वास जगा है कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को मान्यता दिलाने के सरकार के प्रयास सफल होते दिखाई पड़ रहे हैं.आने वाले समय में विदेश मंत्रालय दुनिया भर में और खासकर गिरमिटिया देशों में हिंदी को बचाने के लिए और भी कदम उठाएगा.नागपुर में आयोजित पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन 1975 से लेकर भोपाल में आयोजित 2015 के सम्मेलन तक बार-बार यह प्रश्न खड़ा होता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी कब अधिकारिक भाषा बनेगी.इसके लिये सबसे बड़ी बाधा 193 देशों के दो तिहाई सदस्य देशों की सहमति-समर्थन नहीं है बल्कि इन सभी देशों को इस पर होने वाले खर्च की है.इसी बाधा की वजह से जर्मनी और जापान की भाषा भी वह स्थान हासिल नहीं कर पाई है.
हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी राष्ट्र एवं राज भाषा हिन्दी का सम्मान बढ़ाने एवं उसके अस्तित्व एवं अस्मिता को नयी ऊंचाई देने के लिये अनूठे उपक्रम किये हैं.हिन्दी को उसका गौरवपूर्ण स्थान दिलाने के लिये नरेन्द्र मोदी एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के प्रयत्नों को राष्ट्र सदा स्मरणीय रखेगा.क्योंकि मोदी ने सितंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में भाषण देकर न केवल हिन्दी को गौरवान्वित किया बल्कि देश के हर नागरिक का सीना चैड़ा किया.सबसे पहले 1977 में हिंदी में भाषण दिया था अटल बिहारी बाजपेयी ने.उस वक्त वे जनता पार्टी सरकार में विदेश मंत्री थे और यूएन में भारत की अगुवाई कर रहे थे.संयुक्त राष्ट्र में किसी भी भारतीय के पहले हिंदी भाषण का पूरे देश में जोरदार स्वागत हुआ था.उनके भाषण की जगह-जगह चर्चा होती थी.इसके बाद उन्होंने सन 2002 में भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दोबारा इस अंतरराष्ट्रीय मंच से हिंदी में अपनी बात रखी थी.लेकिन प्रश्न यह है कि दोनों ही सक्षम नेताओं ने हिन्दी को अपने ही देश में क्यों उपेक्षित रहने दिया.क्या कारण है कि आजादी के 70 साल बाद भी सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं, यह देश के लिये दुर्भाग्यपूर्ण एवं विडम्बनापूर्ण स्थिति है.
राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय प्रतीकों की उपेक्षा एक ऐसा प्रदूषण है, एक ऐसा अंधेरा है जिससे ठीक उसी प्रकार लड़ना होगा जैसे एक नन्हा-सा दीपक गहन अंधेरे से लड़ता है.छोटी औकात, पर अंधेरे को पास नहीं आने देता.राष्ट्र-भाषा को लेकर छाए धूंध को मिटाने के लिये कुछ ऐसे ही ठोस कदम उठाने ही होंगे.विकास की उपलब्धियों से हम ताकतवर बन सकते हैं, महान् नहीं.महान् उस दिन बनेंगे जिस दिन राष्ट्र भाषा, राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र-गान एवं राष्ट्र-गीत को उचित स्थान एवं सम्मान देंगे.
  कितने दुख की बात है कि आजादी के 70 साल बाद भी हमारे दूर-दराज के जिलों में राज्य सरकारें अपना काम-काज अंग्रेजी में करती हैं.हिन्दी विश्व की एक प्राचीन, समृद्ध तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राजभाषा भी है, यह हमारे अस्तित्व एवं अस्मिता की भी प्रतीक है, यह हमारी राष्ट्रीयता एवं संस्कृति की भी प्रतीक है.भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी.इस महत्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 1953 से सम्पूर्ण भारत में 14 सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है.राजभाषा बनने के बाद हिन्दी ने विभिन्न राज्यों के कामकाज में आपसी लोगों से सम्पर्क स्थापित करने का अभिनव कार्य किया है.लेकिन अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण आज भी हिन्दी भाषा को वह स्थान प्राप्त नहीं है, जो होना चाहिए.चीनी भाषा के बाद हिन्दी विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है.

भारत और अन्य देशों में 70 करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं.पाकिस्तान की तो अधिकांश आबादी हिंदी बोलती व समझती है.बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, तिब्बत, म्यांमार, अफगानिस्तान में भी लाखों लोग हिंदी बोलते और समझते हैं.फिजी, सुरिनाम, गुयाना, त्रिनिदाद जैसे देश तो हिंदी भाषियों द्वारा ही बसाए गये हैं.दुनिया में हिन्दी का वर्चस्व बढ़ रहा है, लेकिन हमारे देश में ऐसा नहीं होना, बड़े विरोधाभास को दर्शाता है।
किसी भी देश की भाषा और संस्कृति किसी भी देश में लोगों को लोगों से जोड़े रखने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है.भाषा राष्ट्र की एकता, अखण्डता तथा प्रगति के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है.कोई भी राष्ट्र बिना एक भाषा के सशक्त व समुन्नत नहीं हो सकता है अतः राष्ट्र भाषा उसे ही बनाया जाता हैं जो सम्पूर्ण राष्ट्र में व्यापक रूप से फैली हुई हो.जो समूचे राष्ट्र में सम्पर्क भाषा के रूप में कारगर सिद्ध हो सके.राष्ट्र भाषा सम्पूर्ण देश में सांस्कृतिक और भावात्मक एकता स्थापित करने का प्रमुख साधन है.महात्मा गांधी ने सही कहा था कि राष्ट्र भाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है.राष्ट्रीय व्यवहार में हिन्दी को काम में लाना देश की एकता और अखण्डता तथा उन्नति के लिए आवश्यक है। 
अंग्रेजी बोलने वाला ज्यादा ज्ञानी और बुद्धिजीवी होता है- यह धारणा हिन्दी भाषियों में हीन भावना ग्रसित करती है.हिन्दी भाषियों को इस हीन भावना से उबरना होगा.हिन्दी किसी भाषा से कमजोर नहीं है.हिन्दी को कमजोर हम ही बना रहे हैं, बल्कि हिन्दी की यह घोर अवमानना एवं अपमान है कि हमने हिन्दी को अंग्रेजी का मिश्रण बना दिया है.इस तरह की मिश्रित भाषा का प्रयोग इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं समाचार पत्रों में क्यों बढ़-चढ़कर हो रहा है, यह एक विचारणीय विषय है.यही वह बिन्दु है जिस पर हमें विचार करना है.इलेक्ट्राॅनिक एवं प्रिंट मीडिया का भाषा के प्रति वर्तमान रूख तो यही दर्शाता है कि राष्ट्रभाषा हिन्दी को प्रमुखता न देकर अंतर्राष्ट्रीय भाषा के नाम पर अंग्रेज भाषा के शब्दों को हिन्दी भाषा में मिला दो ताकि वह जन-जन की जुबान पर चढ़ जाए और मिश्रित भाषा को बढ़ावा दिया जाए.इस मिश्रित भाषा के बढ़ते प्रयोग का प्रभाव भी अब हमारे जीवन में दिखाई दे रहा है.शहरों से लेकर गांवों तक अब सर, मैडम, बाथरूम, लंच, डिनर इत्यादि शब्दांे से युक्त वाक्यों का प्रचलन बढ़ा है.श्रीमन्, महोदय, महोदया, स्नानघर, भोजन शब्द हमारे मुंह से निकल ही नहीं पा रहे हैं.सर, मेरी बात तो सुनिए, जैसे वाक्य आम होते जा रहे हैं.इस तरह आधुनिकता के नाम पर भाषा और संस्कृति के साथ समाचार जगत हमारी सभ्यता और परम्पराओं के ऊपर पश्चिमी सभ्यता को थोप रहा है.लगता है बाहर निकलने के सभी रास्ते बंद हैं.इन बंद रास्तों को खोलने के लिए आज जरूरत है

विचारों को अपनी भाषा में व्यक्त करने की.इतिहास साक्षी है कि विश्व की अनेक सभ्यताएं समाप्त हो गई परन्तु भारत अपनी सभ्यता और संस्कृति के बल पर आज भी अडिग है क्योंकि भारत ने सदैव साध्य के साथ साधन की पवित्रता पर बल दिया है.हमारी भाषा और हमारे साहित्य की व्यापकता ने ही हमारे समाज को तेजस्विता दी है और प्रकाशमान बनाए रखा है.भाषा के शब्दकोश को समृद्ध बनाने के लिए अन्य भाषाओं के शब्दों को लिया जा सकता है पर यह ध्यान रखना होगा कि उससे हमारी मौलिकता ही समाप्त नहीं हो जाए.वर्तमान में तो संचार माध्यम ऐसा ही कर रहे हैं.अतः हमारी राष्ट्रभाषा के साथ जो घिनौना खेल जाने-अनजाने खेला जा रहा है उसे तुरंत रोका जाना चाहिए।
हमें जरूरत है तो बस अपना आत्मविश्वास मजबूत करने की.यह कैसी विडम्बना है कि जिस भाषा को कश्मीर से कन्याकुमारी तक सारे भारत में समझा जाता हो, उस भाषा के प्रति घोर उपेक्षा व अवज्ञा के भाव, हमारे राष्ट्रीय हितों में किस प्रकार सहायक होंगे.हिन्दी का हर दृष्टि से इतना महत्व होते हुए भी प्रत्येक स्तर पर इसकी इतनी उपेक्षा क्यों? शेक्सपीयर ने कहा था-‘दुर्बलता! तेरा नाम स्त्री है। पर आज शेक्सपीयर होता तो आम भारतीय के द्वारा हो रही हिन्दी की उपेक्षा के परिप्रेक्ष्य में कहता-‘दुर्बलता! तेरा नाम भारतीय जनता है।
 


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