दिल्ली म्युनिसपल कॉर्पोरेशन के चुनाव होने के पहले से लेकर परिणाम आने तक ऐसा हल्ला मचा रहा कि मानो कोई आम चुनाव होने जा रहा है. जैसे देश के हजारों नगर निगमों में चुनाव होते हैं, वैसा ही दिल्ली का चुनाव था लेकिन इसे राष्ट्रीय स्वरूप देकर अनचाहे में अरविंद केजरीवाल का कद और ऊंचा कर दिया गया. जैसा कि पहले से माना जा रहा था कि इस स्थानीय निकाय के चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन बेहतर होगा सो रहा. आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन संतोषजनक रहा क्योंकि उसके पास वहां खोने के लिए कुछ नहीं था और ऐसे में जो मिला, वह कम नहीं है. चिंतनीय स्थिति तो कांग्रेस की है जिसके बारे में चर्चा भी नहीं हो रही है. परिणाम के लिहाज से वह तीसरे स्थान पर रही लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि कांग्रेस प्रत्याशियों की रिकार्ड जमानत जब्त हुई. यह तो दिल्ली नगर निगम के चुनाव का मोटा मोटा हिसाब किताब है. बिन्दुवार जब इस विश£ेषण करते हैं तो पाते हैं कि चुनाव परिणाम में पीछे रहने वाली आम आदमी पार्टी का जलवा कायम है जबकि भाजपा के पास सिवाय मोदी मंत्र के कुछ और नहीं है. इस चुनाव में विजय हासिल करने में अमित शाह की रणनीति का वैसे जिक्र नहीं हो रहा है, जैसा कि उत्तरप्रदेश के चुनाव में हुआ था. कांग्रेस का सूपड़ा साफ है और अब विश£ेषण में भी उसकी गिनती उल्लेखनीय नहीं रह गयी है. भाजपा की चुनौती एक बड़ा कारण है जिसके चलते ‘आप’ का कद कम नहीं हो रहा है जबकि इतिहास गवाह है कि ऐसी क्षेत्रीय पार्टी थोड़े समय में नेपथ्य में चली जाती हैं फिर वह असम गण परिषद हो या लोकजनशक्ति पार्टी.

हैरानी तो इस बात की थी कि इस मामूली से चुनाव को लेकर नेशनल कहलाने वाले मीडिया ने इस पूरे चुनाव को इस तरह कव्हर किया मानो दिल्ली नगर निगम के चुनाव जीतने या हारने से दिल्ली की तख्त को खतरा हो जाएगा. ‘आप’ ने जीत दर्ज कर ली तो वह दिल्ली के तख्तोताज पर बैठ जाएगी और भाजपा हार गई तो मोदी जी को प्रधानमंत्री की कुर्सी छोडऩा पड़ेगी. यह भी शायद पहली बार हुआ कि इस मामूली से चुनाव को लेकर बकायदा एक्जिट पोल कराया गया. चुनाव परिणाम विश£ेषण के लिए उन विशेषज्ञों का पैनल बिठाया गया जो आम चुनाव और विधानसभा चुनाव में अपनी समझ रखते हैं. ये सारे मीडिया के महारथी दिल्ली नगर निगम चुनाव में विश£ेषण करते दिख रहे थे. दिल्ली नगर निगम का चुनाव और हम भोपाल, रायपुर, पटना और लखनऊ में बैठ कर परिणाम को इस तरह देख रहे थे और हमें दिखाया जा रहा था कि दिल्ली नगर निगम चुनाव के बाद पूरे देश का राजनीतिक परिदृश्य बदल जाएगा. चुनाव परिणाम आते ही मीडिया जिस तरह ‘आप’ पर टूट पड़ा, वह भी अविश्सनीय सा था. केजरीवाल से इस्तीफा मांगा गया तो ‘आप’ की तरफ से बचकाना बयान आया कि बिहार में भाजपा की पराजय के बाद मोदी ने इस्तीफा दे दिया था? सवाल यह है कि प्रधानमंत्री के इस पद की गरिमा का इस तरह हस क्यों किया जा रहा है? क्यों बात बात में एक नगर निगम के चुनाव में प्रधानमंत्री को क्लब किया जाता है? क्यों स्थानीय नेता का नाम नहीं लिया जाता? कांग्रेस के माकन ने इस हार को अपनी हार बताते हुए इस्तीफा दिया, उसकी चर्चा नहीं हो रही है. मीडिया इन बातों पर चर्चा नहीं करता है. मीडिया का यह महाकवरेज यदा-कदा प्रायोजित हो तो हैरान होने की जरूरत नहीं है. मिशन से प्रोफेशन तक का रास्ता यहीं से होकर जाता है. 

आम आदमी पार्टी को महत्वपूर्ण बनाने में भाजपा और मीडिया का अहम रोल रहा है. स्थानीय निकाय के चुनाव को विधानसभा और लोकसभा चुनाव से तुलना कर ‘आप’ को इतना महत्व दिया गया कि अनजाने में वह स्वयं में बड़ी पार्टी बन गयी. अरविंद केजरीवाल का डर भी साफ दिख रहा था. भाजपा ने दिल्ली नगर निगम के चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्र बना लिया था और वह किसी विधानसभा चुनाव के लिहाज से ही मैदान में थी. इस समय हम इस मामूली चुनाव में हुए खर्चे की बात नहीं करेंगे लेकिन जिस आक्रामक रूप से प्रचार किया गया, वह अनोखा था. अनोखा तो यह भी था कि एक  स्थानीय स्तर के चुनाव में मोदी ब्रांड का इस्तेमाल किया गया जबकि जिस मनोज तिवारी को दिल्ली की कमान सौंपी गयी थी, उन्हें ही किला फतह करना था. यह सब जानते हैं कि मोदी के नाम के बिना सफलता असंभव सा है, सो आम चुनाव से लेकर नगर निगम के चुनाव भी मोदी के नाम पर जीते गए. ऐसे में मनोज तिवारी ऐंठते दिखते हैं तो उन्हें समझ लेना चाहिए कि अभी उनका कद ऐसा नहीं हुआ है कि वे एक मामूली चुनाव भी स्वयं के दम पर लड़ सकें.

साल 2014 में केन्द्र में जब नरेन्द्र मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई तभी से वह हमेशा चुनाव के मोड में रही है. दिल्ली नगर निगम का चुनाव हो, विधानसभा, लोकसभा का चुनाव हो या उपचुनाव हो, हर चुनाव इस तरह लड़ा गया, मानो यह आखिरी चुनाव है. धन-बल के साथ पूरा फोकस नरेन्द्र मोदी के चेहरे को सामने रखकर किया गया. एक मायने में भाजपा नेपथ्य में है और मोदी परिदृश्य में. कहने को अमित शाह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की हैसियत रखते हैं लेकिन हर कैम्पन में मोदी-शाह की जोड़ी दिखती है. यही कारण है कि पहले महाराष्ट्र, फिर गुजरात, राजस्थान और अब दिल्ली नगर निगम के चुनाव को लेकर मोदी-शाह की पार्टी उत्साहित और उत्तेजित है. उनकी इस उत्तेजना को बढ़ाने में केजरीवाल की बड़ी भूमिका है. चार साल पहले एक जनांदोलन से जन्मी यह पार्टी राष्ट्रीय चुनौती का कारण बन चुकी है तो बार बार पराजय के बाद भी वह विजेता की भूमिका में है. भाजपा और कांग्रेस जैसे दिग्गज दलों के सामने बहुत मामूली सी पार्टी होने के बाद भी जिस तरह से तवज्जो दी जाती है, उससे केजरीवाल का कद और भी बढ़ जाता है. 

केजरीवाल की पृष्ठभूमि राजनीतिक नहीं रही है लेकिन उनकी नजर राजनीति की शीर्ष बिन्दु पर रही है. वे एक नौकरीपेशा व्यक्ति रहे हैं और इत्तेफाकन अन्ना हजारे के आंदोलन में उन्हें जगह मिल गई. जनलोकपाल को लेकर जो आंदोलन हुआ, उसने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा की तरफ ले गया, जैसा कि आपातकाल के बाद देश मेें राजनीति ने नई करवट ली थी. आपातकाल के बाद क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ लेकिन सबको धता बताते हुए इंदिरा गांधी फिर सत्ता के शिखर पर थीं. लेकिन अन्ना आंदोलन से राजनीति एक नई दिशा की तरफ गई और कांग्रेस को सत्ता से बाहर होना पड़ा. आपातकाल के समय की तरह क्षेत्रीय पार्टी का उदय हुआ लेकिन एकमात्र आम आदमी पार्टी की. अन्ना हजारे हाशिये में चले गए और केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी की उम्मीदों की पार्टी बन गई. पहली बार आम आदमी पार्टी ने 15 साल की कांग्रेस की दिल्ली सरकार को धूल चटाकर अपना वर्चस्व स्थापित किया लेकिन पूर्ण बहुमत से दूर रहने के कारण उन्होंने सरकार नहीं बनायी. इसी उहापोह के चलते एक वर्ष बाद फिर दिल्ली विधानसभा का चुनाव हुआ और अबकी बार, केजरीवाल की तर्ज पर कांग्रेस क्या, भाजपा भी साफ हो गई. इस जीत से केजरीवाल को हौसला तो मिला, राजनीति दलों में अपरोक्ष रूप से आप को लेकर कशमकश की स्थिति बनी रही. यह तब और हुआ जब 2014 के आम चुनाव में मोदी की आंधी में पूरा देश उनके साथ था, तभी आप ने पंजाब में लोकसभा की 4 सीटों पर जीत दर्जकर अपना वर्चस्व दिखा दिया. कांग्रेस के खिलाफ खड़े होने वाले अन्ना हजारे अपने गांव तक सिमट गए.

इस तरह की जीत से केजरीवाल का मनोबल बढ़ता गया जो आहिस्ता आहिस्ता अहम में बदलने लगा. योगेन्द्र यादव, किरण बेदी सरीखे नेताओं ने केजरीवाल से किनारा कर लिया. जिस भाजपा के खिलाफ किरण बेदी ने हुंकार भरा था, उसी भाजपा में उन्हें जगह मिली लेकिन योगेन्द्र यादव उम्मीदों के सहारे स्वराज इंडिया का बैनर लेकर एकला चलो की राह पर निकल पड़े. केजरीवाल से झटका खाए हजारे योगेन्द्र के साथ भी नहीं आए. यह एक ऐसा मौका था जब केजरीवाल को अनदेखा कर उन्हें तोड़ा जा सकता था लेकिन भाजपा ने उसे गंभीरता से लिया और केजरीवाल के पैर उखडऩे के बजाय और गहरे जमते चले गए. पंजाब, गोवा में करारी पराजय के बाद भी दिल्ली नगर निगम चुनाव में जिस तरह केजरीवाल को भाजपा ने चुनौती दी, उससे वे और मजबूत हो गए. अनचाहे में मीडिया ने भले ही भाजपा के पक्ष में काम किया हो लेकिन फायदा केजरीवाल को ही मिला. ऐसा नहीं है कि केजरीवाल एकमात्र नेता हैं जिनकी पार्टी पहली क्षेत्रीय पार्टी है. स्मरण रखना होगा कि छात्रनेता प्रफुल्ल महंतों की पार्टी असम गण परिषद भी इसी तरह उभरी थी लेकिन वह असामयिक हो गई. कांग्रेस के कई क्षत्रपों ने क्षेत्रीय दल बनाये और कांग्रेस में वापसी उनकी मजबूरी थी. स्वयं उमा भारती को अपनी लोकजनशक्ति पार्टी को भाजपा में तिरोहित करना पड़ा क्योंकि भाजपा के बिना उनका सरवाइव करना मुश्किल सा था. एक और ताजा उदाहरण केजरीवाल की तरह आईएएस की नौकरी छोडक़र राजनीति में आने वाले अजीतप्रमोद जोगी का है. बरसों तक कांग्रेस में सत्ता का सुख भोगने वाले जोगी इस समय स्वयं की पार्टी बनाकर कांग्रेस और भाजपा को चुनौती देने की बात कर रहे हैं जबकि हकीकत में अभी उन्हें उड़ान भरने में वक्त है. यही नहीं, उनके कांग्रेस वापसी या भाजपा में जाने की चर्चा भी चल पड़ी है. ऐसे में केजरीवाल को चुनौती मानकर उनका कद बढ़ाने की जगह पर उनकी अनदेखी से आप का कद घट सकता है.

इस नए दौर में एक और अलग किस्म का राजनीतिक अनुभव हो रहा है. लोकसभा से पंचायत चुनाव तक प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक जुट जा रहे हैं. मध्यप्रदेश में बीते सालों में ऐसा कोई चुनाव नहीं होगा जिसमें स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कमान न सम्हाली हो. इन चुनावों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम का सहारा ना लिया गया हो, ऐसा भी नहीं हुआ. जबकि अनुभव यही कहता है कि स्थानीय स्तर के चुनाव प्रत्याशी के व्यक्तित्व एवं कार्यों पर जीते या हारे जाते हैं. भाजपा का जीत एकमात्र लक्ष्य है. यह अनुचित भी नहीं लेकिन शून्य को शिखर बना देने की यह राजनीति केजरीवाल को एक बड़ा स्पेस देती है. और इस स्पेस को बढ़ाने में मीडिया के वे महारथी भी शामिल हैं जो अनचाहे में केजरीवाल का साथ दे रहे हैं. ईवीएम मशीन के बहाने जो दृश्य केजरीवाल ने पैदा किया, वह महज दिशाभ्रम था और इसमें ही सब लोग उलझ गए. हालांकि मध्यप्रदेश के अटेर विधानसभा उप-चुनाव में इसी ईवीएम मशीन को लेकर बवाल हुआ था और उसमें भी कांग्रेस की जीत ने सवालों को पुख्ता कर दिया था जिसका लाभ केजरीवाल को मिला. 


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