देश में एक बहुत ही खतरनाक षड्यंत्र चल रहा है. देश को पुनः 1947 के कगार पर ले जाकर विभाजित करने का षड्यंत्र. एक वर्ग है जो हिंदुस्तान में रहकर खाता हिंदुस्तान का है लेकिन गाता है दुश्मनों का, और ध्यान रहे, इस वर्ग में सभी धर्मों, जाति और संप्रदाय के लोग हैं, फटाक से किसी एक पर उंगली उठाने से बचियेगा. वह वर्ग लगातार अल्पसंख्यकों को भड़का रहा है, उनसे कह रहा है कि यह सरकार तुम्हारी दुश्मन है, हिंदू तुम्हारे दुश्मन हैं, बाकी सब धर्म वाले तुम्हारे दुश्मन हैं. तुम उनकी बात क्यों मानेगे? तुम इस सरकार के फैसले क्यों मानोगे? तुम इस देश की भलाई में सहयोग क्यों करोगे? तुम्हारे लिए पूरा अरब वर्ल्ड है, सारी दुनिया के मुसलमान तुम्हारे पीछे हैं, तुम्हारी सहायता के लिए तत्पर हैं. तुम जो मन में आए करो. इस सरकार के बनाए कानूनों को तोड़ो. इस सरकार और देश से जितना असहयोग कर सकते हो उतना करो. और पूरी नहीं तो कुछ आबादी  जरूर उनके भड़काने में आ रही है. जिस सीएए से उनका कोई लेना-देना नहीं उसके खिलाफ लोग सड़कों पर उतर रहे हैं. जो ट्रिपल तलाक अधिकांश मुस्लिम देशों में बैन है उसे हिंदुस्तान में बंद किए जाने पर विक्टिम कार्ड खेल रहे हैं. कुछ लोग ऐसे मुश्किल समय में भी लॉक डाउन का पालन सिर्फ इसलिए नहीं कर रहे हैं क्योंकि यह मोदी सरकार ने कहा है. लगातार  भड़काने वाले बयान आ रहे हैं, भड़काने वाली बातें कही और की जा रही हैं और यह सब जानबूझकर करवाया जा रहा है. अगर इनके खिलाफ कोई कार्यवाही की जाती है तो तुरंत ही विक्टिम कार्ड शुरू हो जाता है कि हिंदुस्तान में मुसलमानों के साथ बहुत जुल्म हो रहा है. और अगर नहीं की जाती है तो ने यह बताया जाता है कि देखो तुम कितने ताकतवर हो! तुम संख्या में भले कम हो लेकिन तुम इन सब को परास्त कर सकते हो. तुमने पहले भी राज किया है, तुम आज भी राज कर सकते हो. अर्थात भड़काने वाले दोहरा वार कर रहे हैं, पहले तो यह लोगों को कुछ गलत करने को मजबूर कर रहे हैं और अगर उसका रिएक्शन होता है उसका भी वह फायदा उठा रहे हैं, और अगर रिएक्शन नहीं होता है तो उसका भी वही फायदा उठा रहे हैं. अगर जल्द से जल्द कुछ ना किया गया तो इसका परिणाम बहुत ही भयानक होने वाला है.


दूसरी तरफ है बहुसंख्यक समुदाय. उन्हें यह बार-बार कहा जा रहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय कभी तुम्हारा अपना नहीं हो सकता, कभी भारत का नहीं हो सकता.  कभी गौ रक्षा के नाम पर हत्या को सही ठहराया जाता है तो कभी लिंचिंग करने वालों को. उनके मन में अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति जहर भरने के भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं और यहां भी बहुत सारे लोग इसकी चपेट में आ भी रहे हैं. लोगों में चीजों को तार्किक तौर पर परखने की क्षमता खत्म होती जा रही है, सच और गलत का भान मिटाया जा रहा है, एक दूसरे के प्रति शंका के बीज बोए जा रहे हैं. क्या कोई भी आदमी जो हिंदुस्तान की भलाई चाहता है, चाहे वह किसी भी धर्म का क्यों न हो, ऐसा काम कर सकता है? कभी नहीं. यह सिर्फ और सिर्फ देश के दुश्मनों का षड्यंत्र है.


 और इस षड्यंत्र के तहत ही इस समय देश में  एक वीडियो वार  छिड़ा हुआ है. हिंदुओं को मुस्लिमों के खिलाफ वीडियो भेजे जा रहे हैं और मुस्लिमों को हिंदुओं के खिलाफ. काट छांट कर अपने मतलब के लिए जोड़े गये झूठे और बिल्कुल एकतरफा वीडियोज जिनमें एक-दूसरे के खिलाफ सिर्फ और सिर्फ जहर भरा होता है. कभी किसी हिन्दू के अच्छे कामों का वीडियो मुसलमानों को या मुसलमानों के अच्छे कामों का वीडियो हिन्दूओं को नहीं भेजा जाता और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आधी से अधिक जनता जो कि निपट मूर्ख है इन वीडियोज को सही मानती है. यह जानने की कोशिश भी नहीं करती कि यह क्यों भेजे जा रहे हैं, इनका मकसद क्या है? यह सच्चे हैं भी या नहीं है? बस वह आंख मूंदकर अपने मन में एक दूसरे के प्रति घृणा पाले जा रही है जो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. और यही तो चाहते हैं ये लोग.


इस समय बहुत संभलकर कदम रखने की जरूरत है. इतना तो तय ही है कि देश का बुरा चाहने वालों की संख्या देश का भला चाहने वालों की तुलना में नगण्य है, लेकिन फर्क यह है कि बुरा चाहने वाले दिन-रात साम-दाम-दंड-भेद से से इस देश का विखंडन करने पर तुले हुए हैं जबकि भला चाहने वाले चुपचाप मौन खड़े तमाशा देख रहे हैं. इसका उपाय क्या है? सबसे पहला उपाय यह है कि बहुसंख्यक समुदाय प्रतिक्रिया देना बंद करे. यह घटनाएं करवाई ही इसलिए जाती हैं, यह बयान दिलवाया ही इसलिए जाते हैं कि अधिक से अधिक बहुसंख्यक वर्ग इस पर प्रतिक्रिया दे, इसका विरोध करे और वह पूरी दुनिया के सामने यह दिखा सकें कि देखो यह लोग किस तरह अल्पसंख्यक विरोधी हैं. उन्हें यह समझना होगा की यह प्रतिक्रिया देकर वह कोई अपने धर्म या संस्कृति की रक्षा नहीं कर रहे, अपने आप को महान या अधिक ताकतवर भी साबित नहीं कर रहे हैं, बल्कि दुश्मनों के हाथों में खेल रहे हैं. उनके हाथ का एक मोहरा मात्र बन रहे हैं और अंततः अपना और अपने देश का ही बुरा कर रहे हैं. मैं जानता हूं कि यह इतना आसान नहीं है. जब सामने से लगातार भड़काने वाले काम किए जा रहे हैं तो शांत रहना आसान नहीं है किंतु कठिन समय में कठिन कार्य करने वाला ही सफलता प्राप्त कर पाता है

यही हाल दूसरी तरफ़ भी है. अल्पसंख्यकों को यह बताया जाता है, यह लगता है कि बहुसंख्यक समाज उन्हें लगातार भड़का रहा है, उन्हें उत्तेजित करने वाले काम कर रहा है.  मैं अल्पसंख्यक समुदाय के भी प्रबुद्ध लोगों, गणमान्य लोगों और सामान्य लोगों से भी अपील करता हूं कि वह इस साजिश को समझें और हर बात को अनावश्यक तूल देने से बचें. अपने अंदर जो गलत लोग हैं उन्हें पहचानें और उनका स्वयं विरोध करें. ईमानदारी से, बिना किसी लाग लपेट के कहूँ तो मुस्लिम समाज की सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि वह अपने समाज के गलत लोगों का खुलकर विरोध नहीं कर पाते. शायद वह भी अपने अति वादियों से उतना ही डरते हैं जितना बाकी लोग. अगर शरीर में कोई घाव हो जाए तो यदि स्वयं उसे दबाकर उसका मवाद निकाला जाए तो दर्द कम होता है, यही काम कोई दूसरा करें तो दर्द भयंकर होता है. अपने समाज की बीमारियों को स्वयं सुधार लिया जाए उसी में भलाई है.

हरे भरे जंगल में आग लगाने की इच्छा रखने वालों को 25 जगह घूम घूम कर आग नहीं लगाना पड़ता. वह तो बस एक जगह एक छोटी सी चिंगारी फेंकता है और जंगल के अपने, उसके अपने हिस्से, सूखे घास और सूखी पत्तियां ही उस आग को पूरे जंगल में फैला देती हैं. देखते ही देखते हरा भरा जंगल तबाह हो जाता है. दुश्मनों ने वो चिंगारी फेंक दी है और हम लोग सूखे पत्तों और घास की तरह ही आग को पूरे देश में फैला रहे हैं; कुछ लोग जानबूझकर, कुछ अनजाने में. ऐसे समय में उन लोगों की बहुत जरूरत है जो इस आग पर पानी बनकर बरस जाएं. यकीन मानिए कि यदि आप भी आग को भड़का रहे हैं तो या तो आप दुश्मनों के हाथ में खेल रहे हैं, या स्वयं ही इस देश के दुश्मन हैं.


 इस षड्यंत्र के दो सबसे प्रमुख हथियार हैं, हिंदू और मुसलमान. दुश्मन इन दोनों का इस्तेमाल कर, इन्हें लड़वाकर  तमाशा देख रहा है और हम उसके हाथों का खिलौना बन लड़ने में व्यस्त हैं. हम उस दुश्मन से लड़ने की बजाय आपस में लड़ रहे हैं. इस खेल को समझना होगा, इस षड्यंत्र को समझना होगा और इसको अच्छी तरह से समझ जाना ही इस खेल का अंत कर सकता है, दूसरा कोई रास्ता नहीं है.  अगर कोई यह सोचता है की 100 करोड़ हिंदू मुसलमान बन जाएंगे, या कोई यह सोचता है कि 20 करोड़ मुसलमानों को निकाल बाहर किया जाएगा तो दोनों ही खतरनाक तरीके के मूर्ख हैं. और अगर कोई यह सोचता है कि 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा दें तो 100 करोड़ हिंदुओं का खात्मा कर देंगे या कोई यह सोचता है कि मुसलमान 20 करोड़ ही तो हैं, उन्हें मिटा देंगे, तो वह दरअसल किसी और को नहीं बल्कि खुद को मिटाने की तैयारी कर रहा है. इतिहास गवाह है कि बिना सोचे समझे  विरोध और संघर्ष का रास्ता आज तक किसी के लिए भी तबाही के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आया. आज जितना आवश्यक कोरोना के चेन को तोड़ना है उतना ही, या उससे भी कहीं अधिक आवश्यक इस नफरत की जंजीर को तोड़ना है.

तुम अपने अल्लाह की इबादत करो, उनसे मुहब्बत करो, मैं अपने भगवान की पूजा करूं, उनसे प्यार करूं, कहीं कोई समस्या नहीं है. समस्या तब खड़ी होती है जब मैं अल्लाह से नफरत करूं और तुम भगवान से. बिना यह जाने कि दरअसल दोनों में कोई भेद ही नहीं है; ठीक उसी तरह जैसे दो बच्चे एक ही पिता के लिए आपस में लड़ते रहते हैं कि ये मेरे पिता हैं, तो यह मेरे पिता हैं. यह इतना साधारण सा अनुभव है जिससे जीवन जीने वाला हर इंसान अवश्य गुजरा होगा.और फिर भी यदि आपकी समझ में कुछ नहीं आया तो केवल इस अंतिम पैराग्राफ को दोबारा पढ़िए, तिबारा पढिए, चौबारा पढ़िए और तब तक पढ़ते रहिए जब तक अल्लाह या ईश्वर, आप जो भी नाम ले लें, उसकी आप पर कृपा नहीं हो जाती.


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