एक हैं हमारे पप्पू जी. इनके पिताजी, दादी, दादी के पिताजी सब ने शासन किया था लेकिन यह बिचारे दुनिया के तमाम सहारे होने के बावजूद कुछ ना कर पाए. अंग्रेजी बूस्ट से लेकर देसी च्यवनप्राश तक सब का सेवन किया. कुछ फायदा नहीं हुआ तो दोनों मिलाकर भी सेवन कर लिया फिर भी कुछ ना हो पाया. कभी टोपी लगाकर मस्जिद गए तो कभी कोट पर ही जनेऊ धारण कर लिया. चुनाव आते ही महान शिवभक्त घोषित किए गए पर चुनाव खत्म होते ही उन्हें ऐसे भूल गए जैसे पहले आतंकवादी भारत में बम ब्लास्ट करके भूल जाया करते थे.  हालांकि शिवजी सबसे आसानी से प्रसन्न हो जाने वाले भगवान माने जाते हैं लेकिन जो उन्हें भी प्रसन्न ना कर पाया वह भारत की दुर्दांत जनता को क्या प्रसन्न कर पाएगा. मुझे लगता है इनकी भक्ति का विष पीने के बाद शिव जी को अमृत मंथन से निकला विष भी अमृत ही लगने लगा होगा. बिचारे दूध, मलाई, पनीर, विटामिन,प्रोटीन, खनिज लवण तथा और भी पता नहीं क्या क्या, सब का सेवन करके थक गए लेकिन शरीर के उपरी हिस्से का विकास न हो पाया. जहां भी जाते हैं बंटाधार शब्द इनका पीछा नहीं छोड़ता.एक समय तो ऐसी हालत हो गई थी कि लोग इन को देखते ही दूर से ही ऐसे प्रणाम करने लगे जैसे काली बिल्ली के रास्ता काटने पर करते हैं. 

इतना सब कुछ करने के बाद भी जब बीज से अंकुर ना फूटा तो मां ने प्रयास और तेज कर दिये. कभी दंगे का पानी डाला तो कभी  विभाजन की रासायनिक खाद. बार बार आजमाया हुआ भ्रष्टाचार के आरोप का कंपोस्ट भी डाला; फिर भी बीज अंकुरित ना हो पाया. जिस तरह मध्ययुगीन भारत में उस जमाने के राजा अपने लोगों को हराने के लिए विदेशियों से दोस्ती कर लिया करते थे उस तरह का नुस्खा भी आजमाया गया. विदेशी एजेंसियों को प्रचार की जिम्मेदारी सौंपी गई, सारे दुश्मन देशों को निमंत्रण पत्र भेजे गए, मदद की घनघोर गुहार लगाई गई फिर भी कुछ ना हो पाया. जब और कोई उपाय काम ना आया तो एक नयी तरकीब सोची गई. पूरे देश में उनकी पार्टी का एक छोटा सा कार्यकर्ता भी अगर कुछ अच्छा काम करे तो उसका सारा श्रेय पप्पू जी को दे दिया जाता था. अगर किसी ने अच्छी सी बांसुरी भी बजा दी तो श्रेय पप्पू जी को दिया जाता था कि  एक दिन इस बांसुरी को उनहोंने अपने कर कमलों से छू भर दिया था इसीलिए इतनी मधुर ध्वनि निकल रही है. कहीं भैंस ने अच्छी गोबर दे दी तो भी यह प्रचारित किया जाने लगा कि यह भैंस पप्पू जी से मिली थी इसलिए इसका गोबर इतना अच्छा है. कहीं किसी जगह पर फसल अच्छी हो गई तो यह कहा जाने लगा कि दो साल पहले पप्पू जी ने हेलीकॉप्टर से सर्वे करते समय इस जगह को बडे़ प्यार से देख लिया था.

 देश में बीमारी फैली, पूरे देश को लॉकडाउन करना पड़ा, तुरंत ही चमचों ने गाना शुरू कर दिया यह आईडिया तो पप्पू जी ने कब का दिया था यह भी इंप्लीमेंट करने में लेट कर दिया इन्होंने? और थोड़े ही दिनों बाद जब लॉकडाउन का कुछ खास फायदा होता दिखा नहीं तो कहने लगे कि यह तो अपनी मनमानी करते हैं, यह लॉकडाउन इतनी जल्दी क्यों कर दिया? अब क्या करें, सीधे-साधे आदमी की याददाश्त तो थोड़ी कमजोर ही होती है. उसके मन में छल कपट जो नहीं होता. तभी तो इनकी दादी ने जो 1975 में गरीबी हटाओ का नारा दिया था उसको पूरा करने के लिए यह यह अब 45 सालों के बाद जाकर न्याय स्कीम लाने की सोचने लगे. हालाँकि मुझे लगता है कि इनकी दादी ने नेताओं की गरीबी हटाने का नारा दिया था जिसे गलती से लोगों ने जनता की गरीबी हटाने का नारा समझ लिया. वैसे ही शायद पप्पू जी ने भी अपनी डूबती हुई पार्टी के लोगों को न्याय दिलाने का नारा दिया जिसे कुछ मासूम लोगों ने जनता को न्याय दिलाने का वादा समझ लिया लेकिन इस बार देश की जनता इनकी दादी से सबक सीख चुकी थी. इसलिए इस न्याय के झांसे में ना आए. उन्हें पता था कि यह न्याय इनकी पार्टी के नेताओं को मिलेगा, बडे़ बडे़ कॉन्ट्रैक्ट और मोटी मोटी कमाई के रूप में. 

 बीच में जब कुछ काम ना था तो लोगों का इंटरव्यू लेकर चर्चा में रहने की कोशिश करने लगे. जो पत्रकार दिन रात इनकी जी हुजूरी में लगे रहते थे पहले तो उन्हें खतरा महसूस हुआ कि अब तो हमारी नौकरी गई,यह पप्पू जी जिस तरह चुनावों में विजय खा जाते हैं उसी तरह हमारी नौकरी भी खा लेंगे; लेकिन फिर उन्हें उनके पुराने महान रिकॉर्ड का ध्यान हो आया और निश्चिंत हो गए कि इस बीज से तो कोई अंकुर ना फूटने वाला. 

आजकल इनका एंटीना बहुत चर्चा में है. सर्जिकल स्ट्राइक या देश का की भलाई करने वाला कोई भी काम सबूत देने पर भी इनका एंटीना पकड़ नहीं पाता लेकिन चीन और पाकिस्तान की घटनाएं उनका एंटीना तुरंत ही पकड़ लेता है. उनका एंटीना कभी यह बताता है कि फलाना चोर है तो कभी इनका एंटीना यह बताता है कि भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया गया है. भ्रष्टाचार और देश को बदनाम करने वाले ऐसे किस्से पकड़ने में तो इनके एंटीना को महारत हासिल है जो कभी हुए ही नहीं, लेकिन चुॅकि ये मूलतः संत स्वभाव के मानव हैं इसीलिए जितना समय आरोप लगाने में बिताते हैं उतना ही समय विभिन्न अदालतों में घूमकर माफी मांगने में भी बिताते हैं. आज के जमाने में तो एक से एक अत्याधुनिक राडारों का आविष्कार हो चुका है फिर भी पता नहीं कैसे इनके सर पर आज भी दूरदर्शन के शुरूआती जमाने का एंटीना ही लगा है. इसका एक कारण यह हो सकता है कि इनकी मां का वास्तविक नाम भी कुछ-कुछ एंटीना से ही मिलता जुलता है. 

इनके कुछ सच्चे हितैषीयों का तो यह मानना है यह इतने बड़े शिव भक्त हैं कि इनकी वास्तविक रूचि वैराग्य में है. राजनीति में तो इन्हें जबरदस्ती धकेल दिया गया है. शायद यह बार-बार चीनी प्रतिनिधियों से भी इसीलिए मिलने जाते हैं कि इन्हें कैलाश पर्वत पर आने जाने का मौका निर्बाध मिलता रहे. हम तो भारत के सीधे -साधे, छोटे-मोटे नागरिक हैं, हमें इतने महान लोगों की वास्तविकता का क्या पता? लेकिन भारत की जनता के बारे में हम अवश्य जानते हैं कि अगर पप्पू जी ने वैराग्य धारण कर लिया तो इस घनघोर पापी दुनिया में कष्टों से जूझ रहे भारत वासियों का मनोरंजन कौन करेगा? उनके दुख को अपने हास्य विनोद से मिट्टी में मिला देने की कला पप्पू जी से बेहतर कोई नहीं जानता. हम तो यही चाहते हैं कि पप्पू जी भी आबाद रहें और उनका एंटीना भी, ताकि हमें दूरदर्शन के कार्यक्रमों की तरह बिना पैसा बहाए मुफ्त में मनोरंजन मिलता रहे!

उद्घोषणा- इस लेख का किसी भी जीवित या मृत राजनीतिक व्यक्ति या परिवार से कोई संबंध नहीं है. किसी तरह की कोई भी समानता एक संयोग मात्र है. इस लेख के लिए लेखक उतना ही उत्तरदाई है जितना नेता अपने वादों के लिए होते हैं.


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