जहां 2017 के पूर्वार्द्ध में जब यूपी में विधानसभा चुनाव हुए तब भाजपा का विजय रथ सभी राजनीतिक दलों से बहुत आगे था... उस वक्त जीतना तो दूर, यह कल्पना भी नहीं की जा सकती थी कि- अब भाजपा से मुकाबला भी किया जा सकता है? लेकिन... वर्ष 2017 के उत्तरार्ध में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक तस्वीर एकदम बदली और गैरभाजपाइयों ने जीत भले ही हांसिल नहीं की हो किन्तु यह भरोसा जीत लिया कि- भाजपा से मुकाबला किया जा सकता है.
बावजूद इसके... अभी भी गैरभाजपाइयों की राह आसान नहीं हुई है, क्योंकि... भाजपा के पास अभी भी बाजी पलटने का समय बचा है. अब यह भाजपा नेतृत्व पर निर्भर है कि वह नए राजनीतिक हालातों में जनमत को अपनी ओर कैसे फिर से आकर्षित करता है?
गुजरात चुनाव के नतीजों ने यह साफ कर दिया है कि अब...
1. कालाधन नियंत्रण, आतंकवाद का खात्मा, तुष्टीकरण की समाप्ति, चीन-पाकिस्तान को करारा जवाब, विश्व में भारत की प्रतिष्ठा आदि देशहित के मुद्दों में आमजन केन्द्र सरकार के साथ है, परन्तु जनहित के मुद्दों- महंगाई, बेरोजगारी, स्थानीय समस्याओं आदि पर ध्यान नहीं दिया तो भाजपा के लिए 2014 दोहराना संभव नहीं होगा.
2. भाजपा की केन्द्र सरकार, खासकर पीएम नरेन्द्रभाई मोदी में तो जनता का विश्वास अब भी कायम है लेकिन भाजपा की प्रादेशिक सरकारें जनता को कुछ खास प्रभावित नहीं कर पाई  हैं लिहाजा... पीएम नरेन्द्र मोदी तो आज भी अव्वल हैं किन्तु भाजपा शेष राजनीतिक दलों की बराबरी पर आ गई है. जाहिर है... 2014 जैसी एकल बहुमतवाली कामयाबी भाजपा के लिए आसान नहीं है.
3. वर्ष 2014 के बाद भाजपा में एकतरफा अनुशासन कायम हो गया था, लेकिन... अब खामोशी टूट रही है... बागी स्वर मुखर हो रहे हैं? अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि गुजरात, जहां कभी केन्द्रीय नेतृत्व की मर्जी के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता था मंत्री पद और मंत्रालय को लेकर विधायक अपनी बात सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं.
4. केन्द्र में भाजपा के एकल बहुमत के कारण कई दल भाजपा के एकतरफा अनुशासन को भले ही स्वीकार करके चल रहे हों, लेकिन समय आने पर इनके भी स्वर मुखर होंगे, हालांकि शिवसेना जैसे सहयोगी दल तो काफी समय से भाजपा पर राजनीतिक तीरंदाजी करने से नहीं चूक रहे हैं.
5. भाजपा की प्रमुख विरोधी पार्टी कांग्रेस अब 2014 जैसी कमजोर हालत में नहीं है और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की इमेज भी अब वैसी नहीं रही है, इसलिए... अब राहुल गांधी और कांग्रेस को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा.
6. उत्तर भारत में भाजपा मजबूत है किन्तु दक्षिण भारत में नहीं, जाहिर है... दक्षिण भारत में प्रभावी सहयोगी संगठनों का साथ नहीं मिला तो केन्द्र में भाजपा की सरकार बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा.
7. कई राज्यों- राजस्थान, गुजरात आदि में भाजपा अधिकतम सीमा पर है, मतलब... कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है और भाजपा को 2014 में अपनी जीती हुई लोकसभा सीटें बचा कर रखनी  हैं? कोई चमत्कार ही 2014 की सारी जीती हुई सीटें भाजपा को फिर से दिला सकता है.
8. भाजपा की ओवर ब्रांडिग नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है क्योंकि जनता जो महसूस करती है उसे प्रचार मात्र से धोया नहीं जा सकता है.
9. स्वच्छता जैसे अच्छे लेकिन अप्रत्यक्ष जनहित के मुद्दे भाजपा को कोई खास फायदा नहीं देनेवाले हैं... जनता को, रसोई गैसे, दाल-रोटी, घर-परिवार, व्यवसाय-रोजगार जैसे प्रत्यक्ष मुद्दों में लाभ नजर आना चाहिए.
10. तीन तलाक, आर्थिक आधार पर आरक्षण, तुष्टीकरण जैसे मुद्दों पर भाजपा की नीति-नजरिया पर निर्भर है 2019 का चुनाव. 
राजनीतिक सारांश... 2014 के मुकाबले इस वक्त भाजपा कमजोर स्थिति में है, लेकिन अभी बेहतर स्थिति में आने के लिए भाजपा के पास सत्ता-समय है, सवाल यह है कि- भाजपा इस समय का कितना उपयोग कर पाती है?


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