लोस चुनाव की घोषणा के साथ ही चुनावी चर्चाएं गर्मा गई हैं कि इस बार केन्द्र में किसकी सरकार बनेगी? सबकी नजरें यूपी पर हैं, क्योंकि जो यूपी जीतेगा, वहीं केन्द्र का सियासी सिकंदर होगा!
यूपी का सियासी समीकरण बेहद उलझा हुआ है, लिहाजा न तो बीजेपी 2014 दोहराने की स्थिति में है और न ही सपा-बसपा गठबंधन उपचुनाव जैसा चमत्कार दिखाने की हालत में है? 
कर्नाटक विधानसभा चुनाव तक कांग्रेस-बसपा के सियासी संबंध अच्छे थे, लेकिन एमपी, राजस्थान सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दौरान, सियासी ताकत से ज्यादा बसपा द्वारा सीटें मांगने के कारण, कांग्रेस ने एकला चालो का रूख अपना लिया. इसके बाद बीएसपी प्रमुख मायावती की नाराजगी कांग्रेस के प्रति बढ़ती गई. हालांकि, उस चुनाव में बीएसपी को तगड़ा झटका लगा और उसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिली, परन्तु आगे लोस चुनाव में बीजेपी के विरोध के लिए संयुक्त विपक्षी एकता के मद्देनजर मायावती ने एमपी में सरकार बनाने में कांग्रेस का साथ दिया.
मायावती ने विस चुनाव में बसपा को महत्व नहीं देने का जवाब यूपी में एकतरफा सपा-बसपा गठबंधन करके दिया, जिसमें कांग्रेस के लिए केवल दो सीटें- अमेठी और रायबरेली, छोड़ी गई. मायावती ने तब तक भी कांग्रेस के प्रति खुलकर नाराजगी जाहिर नहीं की थी. अलबत्ता, कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन के सबंधों से जुड़े सियासी सवालों का जवाब सपा प्रमुख अखिलेश यादव देते रहे और कांग्रेस-बसपा में सियासी संतुलन भी कायम करते रहे, लेकिन अब, कांग्रेस-बीएसपी में सियासी संतुलन कायम करना अखिलेश यादव के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है.
दरअसल, कांग्रेस में प्रियंका गांधी की सक्रिय एंट्री के बाद से ही सपा-बसपा के वोट बैंक पर सवालिया निशान लगने शुरू हो गए थे. कुछ दिन पहले मायावती ने यह कह कर कि- बसपा किसी भी जगह कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेगी, कांग्रेस-बसपा के बदलते राजनीतिक संबंधों की ओर तो इशारा कर ही दिया था, अपनी अप्रत्यक्ष नाराजगी भी जता दी थी.
कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और अस्पताल में भर्ती भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद की मुलाकात के बाद यूपी की राजनीति गर्मा गई है. इसके बाद सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने बसपा की प्रमुख मायावती से लखनऊ स्थित उनके आवास पर मुलाकात की है. ऐसा माना जा रहा है कि अब एक बार फिर यूपी के सियासी समीकरण बदल सकते हैं.
यूपी में कांग्रेस की बढ़ती ताकत का नुकसान बसपा को सबसे ज्यादा होता नजर आ रहा है. बसपा के लिए अपना वोट बैंक बचाने की चुनौती बढ़ती जा रही है. यही नहीं, बहुजन समाज में नया नेतृत्व उभरना भी बसपा प्रमुख मायावती के लिए परेशानी का सबब है.
मायावती के साथ बैठक के बाद अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा कि- आज एक मुलाकात महापरिवर्तन के लिए! इसके कोई सियासी मायने हैं या यह केवल चुनावी ट्वीट है, यह तो आने वाले समय में ही साफ होगा, किन्तु राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस और सपा-बसपा गठबंधन में सियासी दरार बढ़ी, तो अमेठी और रायबरेली में बसपा उम्मीदवार चुनावी मैदान में नजर आ सकते हैं. 
सियासी संकेत यही हैं कि चुनाव के बाद केन्द्र में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और बसपा, दोनों को एक-दूजे की जरूरत पड़ सकती है, इसीलिए शायद खुलकर एक-दूसरे का विरोध नहीं करें, लेकिन दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरियां बढ़ती जा रही हैं. यूपी के नए राजनीतिक समीकरण के मद्देनजर ही कहा जा रहा है कि- कांग्रेस और बीएसपी के बीच सियासी संतुलन कायम करना अखिलेश यादव के लिए बड़ी चुनौती है.


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