तो आखिर मुख्यमंत्री कमलनाथ को जिस बात का डर है, उसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुरूवार को लोकसभा में कर ही दिया. अब मध्यप्रदेश में कमलनाथ की सरकार भले ही सिख गुरू गोविंद सिंह का प्रकाश पर्व धूमधाम से मनाए या फिर गुरू नानक देव जी के नाम पर राज्य स्तरीय ओलम्पिक खेल का आयोजन करें. होने को वही हो सकता है जो नईदिल्ली में सिख नेता मनिन्दरजीत सिंह सिरसा ने कहा है. मोदी के लोकसभा में दिए भाषण के बाद सिरसा की प्रतिक्रिया थी कि कमलनाथ शायद देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हो सकते हैं जो मुख्यमंत्री की कुर्सी से सीधे जेल जाएं. जाहिर है कमलनाथ अब चाहे जितने सिख हितेषी होने की कोशिश कर लें, दिल्ली के सिखों के लिए उन्हें भूलना मुश्किल है. यह बात नरेन्द्र मोदी समझते हैं.

इसलिए दिल्ली विधानसभा चुनाव के एन पहले राष्ट्रपति के अभिभाषण पर संसद में जवाब देते हुए उन्होंने भले ही नाम नहीं लिया हो लेकिन कांग्रेस पर हमला करते हुए कहने से नहीं चूके कि उसने दिल्ली के सिख नरसंहार के आरोपी को मुख्यमंत्री बना रखा है. 1984 के सिख विरोधी दंगे कांग्रेस पर एक ऐसा दाग है जिससे उसका उबरना हमेशा मुश्किल होगा. इसके कारण हैं. जब यह दंगे फैले तब सेना की तैनाती में देर की गई. दिल्ली में तो पुलिस ने दखल देने से इंकार किया. संजय सूरी की किताब, 1984 दि एंटी-सिख वायलेंस एंड आफ्टर, में जिन कांग्रेस नेताओं पर आरोप लगाए गए हैं, उनमें कमलनाथ भी प्रमुख रूप से शामिल हैं. इस किताब में कमलनाथ की उन दिनों की संदिग्ध भूमिका पर विस्तार से बात की गई है. इस किताब में दावा किया गया है कि दंगाई साफ तौर पर किसी के इशारों पर काम कर रहे थे और संगठित थे.

जाहिर है, कमलनाथ भले ही संजय गांधी के खास दोस्त रहे हों और इंदिरा गांधी के तीसरे पुत्र भी कहलाते रहे हों लेकिन कांग्रेस में राकेट की तरह ऊपर उठे वे राजीव गांधी के शासनकाल में ही. कांग्रेस की सरकारों के दौरान जिस तरह जगदीश टायटलर, एचकेएल भगत, सज्जन कुमार को बचाने की कोशिश की गई, उसे पूरे देश ने ही देखा है. कांग्रेस इन नेताओं को चुनाव में उतारती रही और वे महत्वपूर्ण पदों पर भी काबिज रहे. यहां यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि जनवरी, 18 में सुप्रीम कोर्ट ने नए सिरे से एसआईटी गठित करने के निर्देश दिए थे. तीन सदस्यीय यह विशेष जांच दल सिख नरसंहार के 186 बंद किए गए मामलों में अपनी रिपोर्ट फिर से देगी. ये सारे केस फिर से खोले जा रहे हैं. कमलनाथ सिख विरोधी दंगों में अपनी किसी भी भूमिका से हमेशा इंकार करते रहे हैं.


लेकिन रकाबगंज गुरूद्वारे पर हिंसक भीड़ को उकसाते हुए देखने के दो गवाह सामने आने के बाद से ही मुख्यमंत्री कमलनाथ पर तलवार लटक रही है. प्रधानमंत्री ने संसद में इसका इशारा कर यह भी साफ कर दिया कि ये कहानी आगे जाएगी. कमलनाथ की मुसीबत यह हो सकती है कि अब केन्द्र में न तो कांगे्रस की सरकार है और न अगले चार साल ऐसा होने के आसार हैं. ऊपर से गेंद ऐसे दो लोगों के हाथों में हैं, जो चौबीस घंटे राजनीति को ओढ़ते और बिछाते हैं. अब इस मामले में जाहिर है जो करना है केन्द्र सरकार और दिल्ली पुलिस को ही करना है. लेकिन जैसे आज दिल्ली चुनाव के ठीक पहले मोदी ने इशारा किया है, जाहिर है ऐसे ही किसी दिन सोची समझी रणनीति के तहत उनका अगला कदम हो सकता है. यह मौका मध्यप्रदेश में तो अप्रैल में आ सकता है. अप्रैल में राज्यसभा की तीन सीटों के लिए चुनाव है.
आज जो गणित है, उसमें कांग्रेस के खाते में दो सीटें जाएंगी और एक भाजपा के खाते में. जितनी गंभीरता और शिद्दत से अमित शाह राज्यसभा में पार्टी की ताकत बढ़ाने के लिए लगे हैं, उसमें मध्यप्रदेश नजर अंदाज हो जाएगा, यह सोचना थोड़ा मुश्किल है. आखिर देश में मोदी सरकार के इस कार्यकाल के पहले मुझे तो याद नहीं है जब राज्यसभा सदस्यों को दलबदल करते देखा गया हो. लेकिन अगर ऐसा हुआ है तो कार्पोरेट का कोई ठेकेदार मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार को हथेली लगा पाएगा, या किसी तरह के व्यक्तिगत रिश्ते कहीं काम आ पाएंगे. यह सोचना कठिन है. हाल ही में एक फिल्मी सितारे के साथ मुख्यमंत्री का संवाद एक अखबार में पढ़ा था. उसमें नाथ ने कहा था कि राजनीति उनका पेशा नहीं है वे बाई डिफाल्ट राजनीति में है. कांग्रेस को प्रदेश में जिस तरह का बहुमत मिला है, उसमें क्या यह नहीं लगता कि वे मुख्यमंत्री भी बाई डिफाल्ट ही बने. और क्या पता लगता है प्रारब्ध में विदाई भी ऐसे ही बाई डिफाल्ट होनी हो. कांग्रेस में तो कई सारे ऐसे नेता है जो ऐसे ही किसी दिन का इंतजार कर रहे हैं. और भाजपा, वो अपनी दिक्कतों के साथ बाट इसी की जोह रही है.


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