तो अब, बारी प्रधानमंत्री के घोर विरोधी पी चिदंबरम की है. पी चिदंबरम भी नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में सामने आ गये हैं. कश्मीर न सही, जनसंख्या नियंत्रण पर ही सही. स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण की तीन बातों, छोटा परिवार, वेल्थ क्रिएटर्स का सम्मान तथा प्लास्टिक पर रोक, की उन्होंने खुलकर तारीफ की है. कई बार सोचता हूं कि इस कॉलम में फिल्मों का जिक्र शायद ठीक नहीं लगता होगा, लेकिन अक्सर होता यह भी है कि इसके माध्यम से उदाहरण पेश करने में सरलता हो जाती है. उस फिल्म का नाम था, एक रुका हुआ फैसला. ज्यूरी के सदस्य एक हत्या के मामले में निर्णय के लिए बैठते हैं. आरोपी को आरम्भ में केवल एक किरदार निर्दोष मानता है
बाकी सारे सदस्य इसके खिलाफ हैं. लेकिन इकलौता एक-एक कर दमदार एवं तथ्यपूर्ण बातों के जरिये अंतत: सभी सदस्यों को इस बात के लिए राजी कर लेता है कि आरोपी निर्दोष है. इस फिल्म में सबसे जटिल चरित्र पंकज कपूर ने निभाया था. वह अंत तक आरोपी को फांसी दिलाने पर तुले रहते हैं. अब आज यदि इस फिल्म को देखें तो कपूर के चेहरे से नजर हटा लें. हो सकता है कि एकबारगी लगे कि आप राहुल गांधी को देख रहे हैं. वे मोदी को हर सिरे से गलत बताने पर आमादा हैं. जबकि हो यह रहा है कि उनकी ही पार्टी में शीर्ष स्तर पर एक-एक कर मोदी को सराहने वालों की संख्या बढ़ती ही जा रही है.
अनुच्छेद 370 संबंधी फैसले के बाद कांग्रेस में ज्योतिरादित्य सिंधिया सहित डॉ. कर्ण सिंह और अनेक दिग्गज नेताओं ने मोदी के निर्णय का समर्थन कर दिया है. अब, 370 से इतर ही सही, लेकिन चिदंबरम ने भी मोदी की प्रशंसा करके गांधी के समीप तेजी से पसरते अकेलेपन को और विस्तार दे दिया है. समस्या यह है कि आप जब अपनी राय को अंतिम मान लें तो फिर स्वच्छ सोच की हवा वाली खिड़कियां बंद हो जाती हैं. फिर राहुल गांधी ने तो इस तथ्य तक को बिसराकर रखा है कि देश की जनता ने एक बार फिर पूरे बहुमत के साथ मोदी पर भरोसा जताया है.


यह सही है कि भाजपा के हाथों लगातार शर्मनाक हार के सिलसिले के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष का गुस्सा बढ़ गया होगा, किंतु यह भी तो सही ही है कि मोदी कीजिम्मेदारी/उत्तरदायित्व जिस आवाम के प्रति थे, उसी आवाम ने उन्हें फिर से अपना नेतृत्व करने का जनादेश दिया है. गांधी को यह समझना होगा कि मोदी देश के प्रति जवाबदेह हैं, कांग्रेस के प्रति नहीं और कम से कम गांधी की सोच के लिए तो उनकी रत्ती भर भी जिम्मेदारी नहीं बनती है. लोकतंत्र का यह शुभ संकेत होता है कि सत्ता पक्ष के अच्छे काम की विपक्ष भी प्रशंसा करे. अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वर्गीय इंदिरा गांधी द्वारा पाकिस्तान के दो टुकड़े करने वाले कदम का खुलकर समर्थन किया था.


यदि राहुल अपने परनाना के प्रति मोदी के लांछनों से आहत हैं तो उन्हें वाजपेयी एवं श्रीमती गांधी वाले पक्ष को भी ध्यान में रखकर अपनी सोच कायम कर उसका इजहार करना चाहिए. जिस मसले पर कमोबेश पूरा देश सरकार के साथ है. आपकी ही पार्टी के कई जिम्मेदार नेता उस पर सत्ता का समर्थन कर रहे हैं तो कहीं न कहीं यह चिंतन का विषय हो जाता है कि इसका कारण क्या है और क्या कारण है कि हम अंधे विरोध में इधर से उधर लड़खड़ाते हुए ऐसी बातें करते रहें, जिनका न सिर है और न ही पैर. चिदंबरम वाला घटनाक्रम गांधी के लिए किसी सबक के तौर पर होना चाहिए. उन्हें यह समझना होगा कि वह तेजी से अकेले होते जा रहे हैं. अकेले आदमी के लिए एकला चलो हौंसले का प्रतीक होता है. लेकिन किसी समय भीड़ का नेतृत्व करते हुए नितांत तन्हा हो जाने के बाद एकला चलो मंत्र नहीं, बल्कि मजबूरी बन जाता है. गांधी अतीत की एक मजबूत पार्टी के मुख्य नेताओं में से हैं. उन्हें अपनी मजबूरी को पार्टी के और क्षरण का कारण बनने से रोकना होगा.


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