रास्तों से यहां-वहां गुजरते हुए यह इस समय का आम दृश्य है. नवरात्रि के दौरान कई जगह लोगों को रावण के पुतले का निर्माण करते देखा. लेकिन इस आम नजारे ने भी कुछ खास किस्म के विचार मन के भीतर रोंपने का काम किया है. मां के नौ पवित्र दिनों में कई श्रद्धालु जिस तरह शरीर पर ज्वार उगाते हैं उसी तरह मेरे मन के भीतर विचार उगते रहे. आज वे बड़े हो गये महसूस होते हैं. किसी इंसान के शैशव से बाहर आने के पहले लक्षण के तौर पर यह देखा जाता है कि वह बोलने लगा है. नौ दिन की अवधि में मेरे दिमाग के विचार ने भी बोलने लायक अवस्था हासिल कर ली है. वह मुझसे सतत रूप से यही कह रहा है कि उस बांस लुगदी और कपड़े आदि का क्या कसूर है जो उन्हें खींच-तान और तरोड़-मोड़कर रावण की संज्ञा दे दी जाती है. एक निर्जीव को किसी पापी जिस्म की तरह मानकर अपमानित किया जाता है. उस पर लांछन लगाये जाते हैं. ऐसा करने वाले फिर किसी महान पराक्रमी एवं सदाचारी की तरह उस पुतले को आग लगाकर इसे पूरी शान से असत्य पर सत्य की जीत बताते हुए वहां से चल पड़ते हैं.
पता नहीं कौन से सत्य और असत्य की कल्पना हमारी चिरस्थायी स्मृति से मिट नहीं पा रही है. राम ने भी आखिर रावण को बस एक ही दिन तो मारा था. उसकी प्रवृतियां साल के बाकी 364 दिन राम की मर्यादा पर भारी है. मर्यादा को जीवन में उतारना कठिन है. प्रवृत्तियों से पीछा छुड़ाना उससे भी कहीं ज्यादा कठिन. प्रवृतियां यदि आसुरी हो तो कहना ही क्या? राम चरित मानस को लोग कंठस्थ कर सकते हैं और मन की आसुरी प्रवृत्तियां ही अगर उसे आवाज दे रही हों तो लगता है बेचारे तुलसीदास जी ने नाहक ही समय गंवाया. अब तो हम तरक्की करते हुए उस दौर में पहुच गए हैं जब राम के अस्तित्व पर ही कोर्ट में बहस चल रही है. और जिनसे ये समाज मार्यादा की स्थापना की उम्मीद करता है वो हनी में लार टपकाते हुए राजी खुशी टेप हो रहे हैं. लक्ष्मण जी ने तो शूर्पणखा ने अपनी लाज बचा ली थी लेकिन आधुनिक युग के लक्ष्मण खुद की लाज तो गंवा ही रहे हैं. ये शूर्पणखाओं से बचने का नहीं आगा पीछा सोचे बिना लट्टू होने का दौर है.
रावण तो फिर भी संस्कारी था सीता के सतीत्व से भय खाता था. अब तो सत और सतीत्व ही कालातीत है. -झूठ पर सच्चाई की जीत होने वाले कंसेप्ट से असहमत नहीं होना चाहिए किंतु ऐसा वास्तव में होने के प्रति आशंकित हुआ जा सकता है. यह परले दर्जे का झूठ है. खासकर तब जबकि सच और झूठ का तराजू उठाने वाले तमाम हाथ खुद ही हर तरह के गलत में लिप्त हैं. देश को विजयादशमी की शुभकामना देने वाली जुबानें खुद सतत रूप से झूठ बोल-बोलकर गैंडे की खाल जैसी मोटी हो चुकी है. प्रभु राम को आदर्श बनाने की बात कहने वाले स्वयं वह आचरण करते हैं कि रावण भी शरमा जाए. रावण का भारी-भरकम पुतला बनाने वाले धर्म के नाम पर चंदा वसूलने के लिए जो-जो अनाचार करते हैं वैसा तो त्रेतायुग के वह राक्षस ही करते थे जो ऋषि-मुनियों की धार्मिक प्रक्रियाओं के सख्त खिलाफ थे. -हजारों साल का अंतर मर्यादाओं की परिभाषा तो बदल ही देता होगा. नई मर्यादाओं का दौर है. मर्यादा पुरूषोत्तम की मर्यादाएं इसलिए ही तार-तार हुई पड़ी हैं. आचरण में राम नहीं अब इंद्र हावी है.


हर कदम पर अहिल्या को धोखा खाना है. अहिल्या के उद्धार से ज्यादा आज मेनकाओं के संसर्ग का भाव हावी है. वैभव विलासिता के स्वर्गलौकिक इस दौर में शबरी के बैर की कोई कद्र नहीं हो सकती. अब तो जंगल का ही सत्यानाश हुआ पड़ा है तो कौन से जंगल में कोई भिलनी राम को इंतजार करती मिलेगी. और राम भी समाज को कौन सी नई दिशा देने के लिए पदयात्रा करेंगे. पदयात्रा करने वाले इस दौर में राजनेता होते हैं. राम ने सत्ता को त्याग कर वनवास भोगा था. अब पदयात्राएं राजभवनों के लिए होती हैं. -दिमाग एक और बात चीत्कार के साथ उठा रहा है. वह आंकड़े नहीं पेश करता किंतु बात सटीक रखता है. उसका कहना है कि क्यों कर आज भी हम रावण का ही पुतला दहन करते चले आ रहे हैं? क्या ऐसा हुआ है कि त्रेतायुग के बाद से इस महान भूमि पर और कोई बुरा शख्स पैदा ही नहीं हुआ! दिमाग और मैं दोनों इस बात से सहमत हैं कि ऐसा कतई नहीं हुआ. रावण तो दस सिर वाला राक्षस थाअब तो हजारों सिर वाले दानवों का बोलबाला है.

मूल चेहरा केवल एक है जिसमें लालच झूठ वासना बेईमानी पाप व्यभिचार कुंठाएं दगाबाजी और निजी स्वार्थ जैसे असंख्य सिर विद्यमान हैं. तो फिर क्या वजह है कि बुराई के पुतले को केवल रावण कहा जाता है? क्यों ऐसा नहीं हो रहा कि रावण का नाम बदला जाए. हर साल तो छोड़िए यदि हर दिन नये नाम के साथ पुतला दहन करना पड़े तब भी आने वाले कई साल तक हम हर रोज विजयादशमी मना लेंगे. एक पत्थर उठाकर फेंकिए. जिस जगह गिरेगा वहीं आपको दशानन के भी बाप नजर आ जाएंगे. राम की तरह उनका संहार करने की हमारी कुव्वत तो है नहीं तो आम इंसान की तरह कम से कम उनके नाम का पुतला ही फूंक दीजिए. रावण ने जो किया उसकी सजा उसने भुगती. लेकिन आज के लंकाधीश हर तरह की सजा से बहुत दूर दिख रहे हैं. समूचा तंत्र उनके सामने नतमस्तक दिखता है. इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम के कंसेप्ट को आउट डेटेड मान लिया गया है. जब राम ही नहीं बचे तो रावणों के निषेध की गुंजाइश भी कहां रह जाती है. लेकिन रावण का पुतला जलाने वाले तो बचे हैं ना! तो ऐसे कागजी शेरों से कहना चाहिए कि ऐसे दशाननों का पुतला भी फूंक दें. कम से कम दशहरे के पर्व में कुछ नयापन तो आ ही जाएगा. इस दस सर के पुतले को जलाते हुए बोर हो गए हैं.


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