अब इस बात में कोई शक नहीं रह जाना चाहिए किलगभग समूचे देश को कम से कम जून महीने की शुरूआत तक लॉक डाउन में रहना होगा. महज एक रविवार के कुछ घंटों के लिए लागू की गयी इस प्रक्रिया ने आज फिर जो विस्तार पाया, उसके और कोरोना के बेकाबू हो रहे देशव्यापी हालात को देखते हुए यह तय है किदो सप्ताह वाली अवधि किस्तों में की गयी वह व्यवस्था है, जो अब पूरे मुल्क की विवशता बन गयी है. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को सुना. कांग्रेस सांसद राहुल गांधी के साथ किये बुद्धि विलास में उन्होंने लॉक डाउन से आर्थिक गतिविधियों पर पड़रहे असर को लेकर चिंता जाहिर की

राजन की अंगड़ाइयां लेतीं राजनीतिक प्रतिबद्धताओं को पल भर के लिए बिसरा दें, तब भी अर्थ जगत को लेकर उनकी विद्वत्ता संदेह से बिलकुल परे है. किन्तु कोरोना का मामला केवल रुपये-पैसे से जुड़ा नहीं है. उसका इससे भी बहुत बड़ा सरोकार उस जन स्वास्थ्य के लिए है, जो इस महामारी से बुरी तरह प्रभावित हो रहा है. और कोई मौका होता तो निश्चित ही राजन की बातों का, बिना अर्थ, सब व्यर्थ कहकर समर्थन किया जा सकता था, मगर यहां मामला चूंकि, जान है तो जहान है वाला है, इसलिए राजन के सत्य वचन को सार्वभौमिक सत्य के तौर परस्वीकारा जाना ठीक नहीं होगा. एक पत्रकार मित्र से काफी साल पहले हुए टेलीफोनिक संवाद की याद आ गयी.


 

उस दिन किसी कारणवश वह बहुत लम्बे समय बाद रेल के सामान्य कोच में यात्रा कर रहा था. उस कोच में घुसे किन्नरों ने पैसे की वसूली को लेकर यात्रियों से जमकर बदतमीजी की. पहली मर्तबा ऐसे अनुभव से दो-चार हुए मित्र ने मुझसे कहा,  राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय अखबारों में प्लेन में की गयी बिजनेस क्लास की यात्रा का आधार पर देश के हालात के लिए लिखने वाले पत्रकार यदि एक बार मेरे जैसी यात्रा कर लें तो शायद उनका नजरिया और लिखने का अंदाज ही बदल जाएगा. मैं मानता हूँ कि विमान के बिजनेस क्लास और रेल के जनरल क्लास के बीच के तजुर्बे का भारी अंतर ही वह तथ्य है, जिसके चलते राजन कई सच न खुद देख सके और न ही बता सके.


कल केवल एक घंटे के लिए देश के किसी छोटे से छोटे शहर में लॉक डाउन हटा कर देख लीजिये. वहां भीड़ की अराजकता के वह हालात बनने में देर नहीं लगेगी, जो कोरोना वायरस के लिए जरूरी सोशल डिस्टेंसिंग के कांसेप्ट की धज्जियां उड़ा देंगे. जिस जगह ऐसा किया जाएगा, वहाँ की अर्थिस गतिविधियां गति पकड़ें या नहीं, किन्तु अनर्थकारीगतिविधियों का सैलाब वहाँ आ जाना तय है. संभ्रांत वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वाले राजन या राहुल, दोनों ही सतही हिन्दुस्तानी मिजाज से जुडी स्पष्ट आशंकाओं को नजरंदाज करते हुए लॉकडाउन को लेकर जो प्रचार करना चाह रहे थे, वह इस एकांगी दृष्टिकोण की वजह से ही गंभीरता से भटक गया है औरमामला खालिस राजनीतिक हो गया है.


निश्चित ही लगातार लॉक डाउन से आर्थिक गतिविधियों को काठ मार गया है. देश की बहुत बड़ी आबादी इसके चलते संत्रास भोग रही है. केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गरीबों की मदद के तमाम प्रयास किये जाने के बावजूद हालात सामान्य नहीं हो पा रहे हैं. लेकिन ऐसा उस समस्या के चलते हो रहा है, जिसका लॉक डाउन से बेहतर इलाज फिलहाल समूचे विश्व में किसी के भी पास नहीं है. इसलिए जो चल रहा है, उसे ही चराचर सत्य मानने के अलावा अभी तो और कोई विकल्प मौजूद नहीं है. जिस विपरीत परिस्थिति की दवा नहीं है, उसकी समाप्ति के लिए दुआएं कीजिये. ताकि अच्छे दिन आएं या न आएं, कम से कम पहले जैसे सामान्य दिन तो लौट ही आएं. आइये उन दिनों के लिए सच्चे अंत:करण से प्रार्थना करें. यह तथ्य/सत्य ध्यान में रखकर कि लॉक डाउन को ना-पसंद करने के बावजूद उसके साथ ही रहने के अलावा अभी और कोई रास्ता नहीं बचा है.


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