गांधी-नेहरू की अवधारणा से भरे पूरे किसी खांटी कांग्रेसी के नजरिए से यह चिढ़ या नाराजगी से भर देने वाला मामला है. इस दल के किसी सच्चे शुभचिंतक के दृष्टिकोण से यह पार्टी फोरम पर आत्ममंथन की तत्काल जरूरत वाला समय है. मेरे जैसे पत्रकार के लिहाज से यह विश्लेषण वाले आलेख का तगड़ा विषय है. यदि देश की सबसे बुजुर्ग इस राजनीतिक पार्टी पर कोई शोध कर रहा हो तो उसके लिए तो यह महाग्रंथ तैयार करने लायक मसाला है. बात एक सर्वेक्षण की है. इसमें सामने आया कि राहुल गांधी देश के कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों के मुकाबले आम जनता के बीच बहुत कम लोकप्रिय हैं. जनता ने इस दल की सरकार वाले जिस सीएम को सबसे कम पसंद किया, उन कप्तान अमरिंदर सिंह (पंजाब) की तुलना में भी राहुल कम लोकप्रिय पाए गए हैं

यहां तक कि वह उद्धव ठाकरे तक गांधी से बेहतर कहे गए, जिनकी महाराष्ट्र में सरकार कांग्रेस की मेहरबानी से चल रही है. यह बात आंख खोलने वाली होनी चाहिए, खासकर कांग्रेस के लिए. यह बात उन कांग्रेसियों के दिमाग का मकड़जाल साफ करने वाली है, जो यह मानकर चलते आ रहे हैं कि कांग्रेस को केवल गांधी-नेहरू परिवार ही जिलाए तथा जिताए रख सकते हैं. लेकिन क्या कांग्रेसी इससे भी कोई सबक लेंगे? राहुल को इस सर्वेक्षण से पहले भी आम जनता कई-कई मर्तबा एक्सपोज कर चुकी है. गए दो लोकसभा चुनावों में मतदाता ने जता दिया कि राहुल के नेतृत्व में उसकी कतई& रूचि नहीं है. यही वजह रही कि नोटबंदी के तमाम विरोध तथा जेएनयू की टुकड़े-टुकड़े गैंग के खुले समर्थन जैसे टोटकों के बावजूद वोटर ने कांग्रेस को सिरे से खारिज कर दिया. इस सर्वेक्षण ने एक और भ्रम को मिटा दिया है.

वह यह कि मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के बीते विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के पीछे राहुल फैक्टर का कोई असर नहीं था. ये चुनाव पार्टी के राज्य स्तरीय नेताओं के चलते जीते गए. काफी हद तक इस जीत में भी भाजपा शासन के लिए एंटी-इंकम्बैंसी के जज्बे ने असर दिखाया. इसे विषय से भटकना न समझें, लेकिन यह एक और तथ्य को दोहराने का भी मुफीद समय है. वह यह की जादू तो सोनिया गांधी और प्रियंका वाड्रा का भी ढल चुका है. सोनिया यूं भी स्वास्थ्य के चलते कमजोर है और प्रियंका को बीतेलोकसभा चुनाव में उत्तरप्रदेश की जनता ने ही उनके कम होते कद का अहसास करवा दिया. कांग्रेस को सोचना होगा कि अब वह क्या करेगी.


क्या वह अब भी गांधी-नेहरू का रट्टा लगाकर ही अपनी फिर से वापसी के दिवास्वप्न देखती रहेगी या फिर यह समझेगी कि आखिरकार जिस अवाम के पास सत्ता की कुंजी है, उसने अपने दिल के दरवाजे पर राहुल के लिए ताले जड़ रखे हैं. पार्टी के पास अब भी चार साल का समय है. यदि 2024 में संभावित लोकसभा चुनाव के पहले वह आंख पर बंधी यह धृतराष्ट्रमयी पट्टी उतार फेंकती है तो ही पार्टी के लिए संभावनाओं के नए चक्षु पटल खुल पाएंगे. जाहिर है कि इस सर्वेक्षण को भी 'प्रायोजित' या 'फर्जी' बताकर ही इस सच से भी आंख मोड़ने के पूरे प्रयास किये जाएंगे. यह शुतुर्मुर्गीय कृत्य अंतत: इस दल के लिए ही और घातक साबित होगा, यह तय है. क्योंकि इस सर्वेक्षण में जनता ने अपने श्रीमुख से वही कहा है, जो वह बीते लम्बे समय से अपनी उस अंगुली के जरिये जताती आ रही है, जिस अंगुली से ईवीएम का बटन दबाया जाता है.


यदि आप सफलताओं को तारीफ के अतिरेक से नवाजेंगे तो यह बुरे परिणाम वाला ही होगा. कई दलों से मिलकर लगातार दो बार बनायी गयी यूपीए सरकार वाकई बड़ी उपलब्धि थी. किन्तु कांग्रेस इससे आत्ममुग्ध हो गयी. उसने इस सफलता का सारा श्रेय सोनिया के नेतृत्व को दे डाला. बगैर यह जाने कि वह कांग्रेस नहीं, अपितु कई दलों की मिली-जुली जीत थी. जबकि एनडीए के बैनर तले लगातार दो चुनाव जीतने के बावजूद भाजपा ने दोनों ही दफा इतनी सीट हासिल की हैं कि वह अकेले खुद के दम पर भी केंद्र में आसानी से सरकार बना सकती थी. वर्ष 2014 के आमचुनाव में जीत के बाद भी भाजपा ने कांग्रेस जैसा मुगालता नहीं पाला. वह लगातार मेहनत करती रही और यही कारण रहा कि पार्टी को 2019 में भी फिर धमाकेदार सफलता मिली. संकट यह है कि गांधी-नेहरू परिवार भी अपने लिए चाटुकारों द्वारा सुनायी गयी राग जय-जयवंती की असलियत को समझना नहीं चाहता. यानी मामला पूरे कुंए में भांग घुली होने वाला है. भांग का नशा लम्बे समय तक असर करता है. कहते हैं कि उससे बचने के लिए खटाई का सेवन करना चाहिए. इस सर्वेक्षण में कांग्रेस के हिस्से जनता की राय के नाम पर खटास ही आयी है. वह चाहे तो इस खटाई का प्रयोग भांग का नशा उतारने के लिए कर सकती है. लेकिन बात तो यही है कि वह ऐसा करना चाहे, तब ना.


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