भीषण किस्म की सामूहिक मूर्खता कभी किसी एक के लिए सौभाग्य का कारण बन जाती है. यह माना जाता है कि बैलगाड़ी के आगे अकड़ कर चलता एक चौपाया इस भ्रम का शिकार रहता है कि वह भारी-भरकम गाड़ी दरअसल उसके कारण ही चल रही है, बैलों की ताकत का उसमें कोई योगदान नहीं है. अब यदि हम इसे वाकई उस आगे चल रहे जीव की ही शक्ति का कमाल मान लें तो यह हमारी बेवकूफी है और उसे जीव का सौभाग्य कि बैठे-ठाले उसे उस काम का श्रेय मिल गया, जो उसने किया ही नहीं है. इंसानों में भी ऐसे उदाहरण आम हैं. एक शीर्ष अखबार ने अपने शीर्ष पर पहुंच चुके आला अफसर को रिटायरमेंट दे दिया. जैसा कि कइयों को होता है, इन सज्जन को भी यह भ्रम था कि वह अखबार उनकी बदौलत ही नंबर वन बना है. उनके इस मुगालते को एक प्रतिद्वंदी अखबार के मालिकान ने सही मान लिया. इन सज्जन को अपने यहां भारी-भरकम पैकेज वाली नौकरी दे दी. यह प्रचारित किया कि अब हमारा समाचार इन की बदौलत सबसे आगे निकल जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. क्योंकि पहला अखबार अपने स्टाफ के सामूहिक प्रयास से अग्रणी बना था. ये सज्जन तो बस ऊंची पोस्ट पर बैठकर बैलगाड़ी के आगे पूरे दम्भ के साथ चल रहे थे.

वही पहले वाला अखबार आज भी नंबर वन है और जिस समाचार समूह ने इन सज्जन की सेवाएं लेने के प्रलयंकारी आर्थिक भूल की थी, उसने जितना जल्दी हुआ, उन्हें विधिवत नमस्ते कर लिया. यहां वह बच्चा भी याद आता है, जो किसी तेज रफ़्तार ट्रेन में बैठकर यह गुमान पालता है कि दरसल ट्रेन वह खुद ही चला रहा है. अब यदि आप-हम वाकई इस तेज रफ़्तार का श्रेय इस बच्चे को दे दें तो उसके और हमारे बचकाने होने के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा. तो इसी तरह यदि मान लिया जाए कि जनाब प्रशांत किशोर ही दरअसल केंद्र में मोदी सरकार, बिहार में नितीश कुमार और दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल की फिर हुकूमत कायम होने की सार्वभौमिक वजह हैं, तो फिर इस सोच पर तरस ही खाया जा सकता है. लेकिन कांग्रेस ऐसा ही मुगालता पाले हुए है. खबर है कि मध्यप्रदेश की चौबीस विधानसभा सीटों पर होने जा रहे उपचुनाव के लिए वहप्रशांत किशोर की सेवाएं लेने जा रही है. चुनाव रणनीतिकार के तौर पर बहु-प्रचारित इस चेहरे की दम पर पार्टी को उम्मीद है कि वह अपनी खोई हुई सत्ता फिर हासिल कर लेगी. कितना भ्रम है यह अपने आप में..

वर्ष 2014 में जिस आम चुनाव में मोदी ने प्रचंड विजय हासिल की, उसके पीछे खुद मोदी की छवि, आरएसएस की जमीनी कोशिश, भाजपा के मजबूत संगठन की कोशिशें और कार्यकर्ताओं की जूनूनी कोशिश इसकी मुख्य वजह बने. नितीश कुमार ने जब चुनाव जीता, तब उसकी बहुत बड़ी वजह उनके स्वच्छ छवि तथा लालू यादव का जबरदस्त जातिगत गणित था. कांग्रेस और एनसीपी यानि राष्ट्रवादी कांग्रेस भी इस महागठबंधन में शामिल थे. यह वह चुनाव था, जिसमें खुद मोदी जानते थे कि एनडीए की जीत मुश्किल है. इसीलिये उन्होंने खुद प्रचार की कमान संभाली थी. मोदी ने 'गुंडा राज' और 'डीएनए' जैसे जुमलों सहित बिहार के लिए मुंहमांगे पैकेज का भी सहारा लिया, लेकिन वे असफल रहे. दिल्ली के बीते विधानसभा चुनाव में भी केजरीवाल ने पूरी; तरह आसान जीत ही हासिल की थी. क्योंकि उन्होंने पांच साल के कार्यकाल में खुद को भाजपा का सशक्त विकल्प साबित कर दिया था. तो तीनो मामलों में प्रशांत किशोर ने केवल यह किया कि चलती ट्रेन में सवार हो गए और उसकी रफ़्तार का श्रेय खुद ही लूट लिया.
वह किस्मत के धनी रहे कि उन्हें मीडिया के एक प्रभावशाली तबके ने भी सफल चुनाव रणनीतिकार के रूप में प्रायोजित तरीके से स्थापित कर दिया. मामला ठीक वैसा है, जैसे किसी दौर में आयातित विचारधारा वालों ने सुभाष घई को राजकपूर के समकक्ष 'द ग्रेट शोमैन के तौर पर पुकारना शुरू कर दिया था. लेकिन हुआ क्या! राज कपूर की समृति से आज भी सिने-प्रेमियों के सिर श्रद्धा से झुक जाते हैं और सुभाष घई मायानगरी में कब व्यक्तित्व के तौर पर काल-कवलित हो गए, यह याद करने की किसी को फुरसत भी नहीं है. निश्चित ही यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है. किन्तु इस तथ्य की विचित्रता तो ध्यान खींचती ही है किदिग्गज से लेकर घाघ किस्म के नेताओं की प्रचुरता वाली कांग्रेस भी एक ब्रांड नाम के भरोसे ही दौड़ लगा रही है. प्रशांत किशोर रूपी टोटके के लिए कांग्रेस की मोहताजी यह बता रही है कि चुनावी रणनीति के लिहाज से इस दल में किस कदर दरिद्रता का अभिशाप घर कर चुका है. मध्यप्रदेश के उपचुनाव में कांग्रेस को 'अपने हुए पराये' वाले भीषण विश्वास के संकट से दो-चार होना है.


उसे मतदाता को यह समझाना है कि राज्य में पंद्रह महीने के 'राजनीतिक निठल्लेपन' की पुनरावृत्ति न होने की ग्यारंटी किस तरह दी जा सकती है. कांग्रेस को 'वक़्त है बदलाव का के नारे को 'वक़्त है बदले का' और 'वक़्त है तबादलों का' में परिवर्तित कर देने वाले छल का जवाब देना है. उसे यह सफाई देनी है कि क्यों कोरोना के प्रसार के शुरूआती दौर में तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ बीमारी से आंख मूंदकर वेंटीलेटर पर पहुँच चुकी अपनी सरकार को बचाने के प्रयासों में ही मसरूफ रहे. यह तत्कालीन सरकार की अकर्मण्यता ही थी कि आखिरकार कोरोना का विषाणु पूरे प्रदेश पर काबिज हो गया. प्रशांत किशोर के पास जादू की कोई छड़ी हो तो बात अलग है, बाकी तो जनता को डंडा हाथ में लेकर आक्रामक करने के लिए जिम्मेदार ऐसे हालातों को उनकी किसी रणनीति से तो शायद ही ठीक किया जा सकता है. एक बार फिर सियासी पाणिग्रहण के लिए उतावली कांग्रेस इस सजाई जा रही बारात में पीके को खवास की तरह का महत्व देने जा रही है, तो यह उसकी समझ का फेर ही है. वैसे, इस तरह के घटनाक्रम होते रहने चाहिएं. ताकि कम से कम 'विनाशकाले विपरीत बुद्धि' वाली सम-सामयिकता तो कायम रह जाए. कुमार को एक बार फिर बैलगाड़ी की आगे पूरी अकड़ से खड़ा करने की यह तैयारी कांग्रेस को मुबारक हो. भविष्य में शायद कोरोना के वायरस का कोई इलाज मिल जाए, लेकिन सोच पर छाये इस विषाणु का इलाज तो हकीम लुकमान भी नहीं तलाश सकते हैं.


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