जो बात अभिषेक मनु संघवी को समझ में आ गई, पता नहीं वहीं बात वे अपनी पार्टी और उसके दूसरे बड़े नेताओं को क्यों नहीं समझा पा रहे हैं. संघवी ने जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों के लगाए नारों को राष्ट्रविरोधी बताते हुए ट्विट किया है, भारत माता से आजादी और कश्‍मीर से आजादी अलगाववादी नारे हैं. इनकी सीएए के विरोध में कोई जगह नहीं है, क्योंकि वे हमारे राष्ट्र की अखंडता पर सवाल उठा रहे हैं. साथ ही सीएए के खिलाफ मजबूत आंदोलन को कमजोर कर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि इन छात्रों ने कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल के बाहर भाजपा सांसद स्वपन दासगुप्ता और विश्व भारती विश्वविद्यालय के कुलपति बिद्युत चक्रवर्ती का विरोध करने के दौरान कश्मीर मांगे आजादी, असम मांगे आजादी जैसे नारे लगाए. ये छात्र एक लंबा बैनर भी साथ लेकर चल रहे थे, जिसमें लिखा था कि हिन्दुराष्ट्र रेपिस्ट है. जाहिर है यह वामपंथी स्कूल के जेएनयू ब्रीड के छात्र ही हैं. इनके आंदोलन से फर्क नहीं पड़ता लेकिन वैचारिक दिवालिएपन से जूझ रही कांग्रेस के इनके साथ जाने से उसे खुद बहुत फर्क पड़ता है.

कांग्रेस के लिए यह गंभीरता से सोचने का मौका है कि वो अपनी देशव्यापी पहचान के बावजूद लोकसभा में आखिर दो अंकों तक कैसे सिमट गई. अब अभिषेक मनु संघवी सुप्रीम कोर्ट के बड़े वकीलों में से तो एक हैं लेकिन कांग्रेस में उनकी हैसियत क्या है, इसके बारे में मुझे ज्यादा पता नहीं है. अगर संघवी ने देश विरोधी नारों पर अपने विचार सार्वजनिक तौर पर प्रकट किए हैं तो इसका कांग्रेस को नोटिस लेना चाहिए. भोपाल में अभी दिग्विजय सिंह ने सीएए के विरोध प्रदर्शन में कहा कि पुराने नागरिकता कानून पर्याप्त हैं लेकिन सीएए की जरूरत नहीं है. दिग्विजय सिंह को इसके साथ यह भी बताना था कि पाकिस्तान से विस्थापित होकर आए सैंकड़ों लोगों को सालों से भारत की नागरिकता इन कानूनों के चलते क्यों नहीं मिल सकी. ये सभी पाकिस्तानी विस्थापित हिन्दू हैं. मुझे लगता है कि वामपंथियों के साथ मिलकर आंदोलन से उत्साहित कांग्रेस अपना राजनीतिक नुकसान कर रही है.
2014 का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद बमुश्किल तो देश की एक महान पार्टी से मां, बेटा, बेटी पार्टी में तब्दील हो चुकी कांग्रेस के कर्ताधर्ताओं को यह समझ में आया था कि उनकी प्रो अल्पसंख्यक राजनीति से उपजी प्रतिक्रिया ने ही भाजपा के लिए हिन्दुओं को एक होने का आसान मौका मुहैया कराया था. गुजरात के बीते चुनाव में साफ्ट हिन्दूत्व का चौला ओढ़ने के बावजूद कांग्रेस 17 साल से सत्ता में मौजूद भाजपा को वापसी करने से नहीं रोक पाई थी. इस चुनाव से उसे फिर यह मुगालता लगा था, उसकी यह राजनीति सफल हो सकती है. बाद में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक जैसे राज्यों में सरकार बना कर कांग्रेस को लगा कि बस अब मोदी की विदाई का वक्त आ ही गया है. परिणामों को कांग्रेस यहां फिर समझने में भूल कर गई. कर्नाटक में जेडीयू के साथ सरकार बनाने के बाद कांग्रेस को समझना चाहिए था कि उसने अपनी सरकार गंवा दी है. बड़ी पार्टी तो आखिरकार भाजपा बनी ही थी. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में जहां उसकी सरकार बनी, उसे समझना था कि पन्द्रह साल निरंतर और एक ही मुख्यमंत्री के कार्यकाल से उपजी एंटी इनकंबेंसी उसकी सफलता का कारण है.


राजस्थान में हर पांच साल में सरकार बदलने का ट्रेंड है, वहां भी वो किनारे से ही सरकार में आ पाई. वसुंधरा सरकार की जिस दुर्गति की उम्मीद लगाई गई थी, वहां वो सम्मानजनक तरीके से हारी. उल्लेखनीय जीत केवल छत्तीसगढ़ की ही कहीं जा सकती थी. छह महीने बाद के लोकसभा चुनाव में क्या हुआ? मध्यप्रदेश में एक, छत्तीसगढ़ में दो, राजस्थान, गुजरात शून्य और कर्नाटक में भी सूपड़ा साफ. मोदी सरकार की धमाकेदार वापसी साबित कर रही थी कि देश राष्ट्रवाद को ज्यादा तवज्जों दे रहा है. लेकिन पता नहीं कांग्रेस यह क्यों नहीं समझ पा रही है कि जहां भी देश विरोधी नारे लगे, उन जगहों से उसकी पर्याप्त दूरी होना जरूरी है. आखिर स्वतंत्रता आंदोलन में कांग्रेस की पहचान खुद एक राष्ट्रवादी पार्टी की थी. इंदिरा गांधी तक भी कांग्रेस ने अपनी इस पहचान को बराबर कायम रखा. कांग्रेस वामपंथियों और एक्टिविस्टों के प्रभाव में सोनिया गांधी के दो दशक के अध्यक्ष कार्यकाल में ज्यादा आई. लिहाजा, कांग्रेस में जो खांटी राजनीति करने वाले नेता हो सकते हैं, उनकी पूछ परख कम हो गई. ऐसे खांटी राजनीतिज्ञों में से एक दिग्विजय सिंह भी है.


लेकिन दुर्भाग्य से आरएसएस से लड़ने की झोंक में वे खुद कम्युनिस्टों से विचार ग्रहण करने लगे. इसलिए उनके कांग्रेस महासचिव और उत्तर प्रदेश का प्रभारी रहते हुए जिस प्रो अल्पसंख्यक राजनीति की ऊंचाई पर कांग्रेस पहुंची, अनंतत: उसी ने उसे जमींदोज कर दिया. कांग्रेस के पास अब भी वक्त है. ठीक है कि वो पारिवारिक फर्म से मुक्ति नहीं पा सकती लेकिन इंदिरा गांधी की डेढ़ दशक की प्रभावी राजनीति से तो सीख सकती है. इंदिरा गांधी ने अपनी लंबी पारी में न कभी हिन्दुओं को गरियाया था न कभी अल्पसंख्यकों को ज्यादा पुचकारा था. इंदिरा गांधी के गले में पड़ी रूद्राक्ष की माला हमेशा हिन्दुओं को भाती रही. वे दरगाहों में चादर चढ़ाने से भी परहेज नहीं करती थीं. मंदिरों में उनकी उपस्थिति स्वाभाविक लगती थी. राहुल या प्रियंका की तरह नकली नहीं. इसलिए कांग्रेस को अगर वापसी करना है तो उसे चिंतन के एक गंभीर दौर से गुजरना होगा. उसके लिए हालात इस समय, न खुदा ही मिला न विसाले सनम, न इधर के रहे न उधर के वाले हैं. कांग्रेस पर अब न तो मुस्लिम भरोसा करते हैं और ना ही बहुसंख्यक हिन्दू. मुसलमानों की मजबूरी है कि जहां और कोई नहीं, वहां कांग्रेस ही सही. भाजपा को वोट देना उनके लिए हमेशा मुश्किल भरा है. लेकिन मोदी सरकार से लड़ने के लिए सीएए, एनआरसी, एनपीआर से हटके भी ढ़ेर सारे मुद्दे हैं जिन पर लड़ कर कांग्रेस देशवासियों का भरोसा हासिल कर सकती है. मोदी सरकार में कोई सुर्खाब के पर तो लगे नहीं है.


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