गोस्वामी तुलसीदास त्रेताकाल के लिए कह गए, समरथ को नहीं दोष गुसार्इं . बात सोलह आने सही है. त्रेताकाल नहीं देखा है तो वर्तमान में मध्यप्रदेश की भाजपा का काल देख लीजिए. तुलसीदास पूरी तरह सही दिखते हैं. क्योंकि इस पार्टी में अब केवल उसे ही दोष नहीं दिया जा रहा जो समर्थ है. बात से और लात से भी. विधानसभा चुनाव की मौजूदा गहमागहमी के बीच केवल उनकी पूछपरख हो रही है, जो खुलकर अपनी नाराजगी का इजहार कर रहे हैं. पार्टी को आंखें दिखा रहे हैं.हम भी खेलेंगे, नहीं तो खेल बिगाड़ेंगे की तर्ज पर धमकी दे रहे हैं. ऐसे लोगों को घर जाकर पुचकारा जा रहा है. उनकी मनुहार की जा रही है. किसी को पद तो किसी के परिवार में टिकट देकर संतुष्ट करने के जतन चल रहे हैं. लेकिन जो गुस्सा पीकर रह गए, उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी जा रही. उनकी प्रशंसा में कोई स्वर नहीं उठ रहा. उन्हें इस बात का कोई दिलासा नहीं दिया जा रहा कि आगे सब ठीक हो जाएगा. 

क्या यह सचमुच वही भाजपा है, जिसमें बमुश्किल कुछ दशक पहले तक बगावत को पूरी ताकत से कुचलने का काम किया जाता था. संगठन सबसे बड़ा है. व्यक्ति संगठन से बड़ा नहीं हो सकता, जिसके ध्येय वाक्य रहे हैं. वीरेंद्र कुमार सखलेचा से लेकर उमा भारती तक विद्रोही तेवरों को ठिकाने लगाने में क्षण भर की देर नहीं की थी? और इसके लिए कभी फायदे-नुकसान के गणित पर ध्यान नहीं दिया. कार्यकर्ताओं का ऐसा असम्मान भी पहले कभी नहीं किया गया, जैसा इस बार देखने में आया है. बाबूलाल गौर या सरताज सिंह की हैसियत भी बड़ी है लेकिन क्या दोनों में से कोई भी बाबूलाल गौर या सकलेचा जैसा कद रखता है. आज का एक भी नाखुश भाजपाई सखलेचा या साध्वी जितनी ताकत नहीं रखता, लेकिन उनकी मनुहार कुछ इस अंदाज में की जा रही है, गोया वह नहीं रहे तो पार्टी तिनके की तरह बिखर जाएगी. मंदसौर की गरोठ विधानसभा सीट को ही लीजिए. उपचुनाव में चंदर सिंह सिसोदिया भाजपा के टिकट और कृपा से जीत गए थे. इन हजरत की इस बार भी चुनाव लड़ने की तैयारी थी, लेकिन उनकी जगह पार्टी ने टिकट दिया जिलाध्यक्ष देवीलाल धाकड़ को. निवर्तमान होने जा रहे विधायक ने आंखें तरेरीं, बगावत की धमकी दी तो उन्हें तुरंत ही पार्टी की मंदसौर जिला इकाई का अध्यक्ष बना दिया गया. जो विधानसभा के आधे कार्यकाल के बाद ही टिकट काट देने लायक, नालायक निकला उसे भाजपा ने एक पूरे जिले के अध्यक्ष का दायित्व सौंप दिया. तो क्या मानकर चलें कि पार्टी संगठन के अन्य पद भी इसी तरह बागियों के लिए आरक्षित की श्रेणी में आ जाएंगे? कम से कम मंदसौर का उदाहरण देखकर तो यही लगता है. जबकि इसी मंदसौर-नीमच जिले से पार्टी के वरिष्ठ नेता कैलाश चावला भी आते हैं.उनका टिकट काट दिया गया. उन्होंने पार्टी अनुशासन का पालन करते हुए वरिष्ठ नेताओं के सामने चुपचाप अपनी बात कही. फिर असफल किंतु शांत होकर क्षेत्र में वापस चले गए. आज तक खबर नहीं आयी है कि चावला ने बगावत  की धमकी दी या फिर पार्टी के विरोध में कोई सार्वजनिक बयानबाजी की. जबकि उनकी जगह जिसे उम्मीदवार बनाया गया है, उसने दो बार बगावत कर निर्दलीय चुनाव लड़ा और भाजपा को नुकसान पहुंचाया. उसके पिता ने भी दो बार भाजपा से बगावत कर पार्टी को दो चुनावों में हार का मुंह देखने के लिए विवश किया. लेकिन पार्टी के किसी नीति-निर्धारक ने चावला को घर जाकर कम से कम बात करने का जतन तक नहीं किया. ऐसा ही व्यवहार पार्टी ने प्रदेश महामंत्री बंशीलाल गुर्जर के साथ किया. उनका सुवासरा विधानसभा से टिकट पक्का था लेकिन पार्टी ने उसे टिकट दे दिया जो 2013 की लहर में उज्जैन संभाग में हारने वाला इकलौता शख्स था. लेकिन इस बारे में बंशीलाल गुर्जर से कुछ पूछना या समझाना पार्टी ने जरूरी नहीं समझा. बहुत सारे जातीय समीकरणों का ध्यान भाजपा ने रखा लेकिन पूरे प्रदेश में केवल एक गुर्जर को टिकट दिया. कांग्रेस ने इस समाज के दस उम्मीदवार खड़े किए हैं.सचमुच इस पार्टी का वही दौर आ गया है, जिसके लिए कहते हैं, आजकल मां भी तब तक बच्चे को दूध नहीं पिलाती, जब तक कि वह रोता नहीं है.

 

आप बाबूलाल गौर के आगे नतमस्तक नहीं हुए, लेकिन बिछ तो गए ही. उनकी बहू कृष्णा गौर को टिकट देकर. क्या गोविंदपुरा सीट गौर परिवार की जागीर है? क्या इस क्षेत्र में श्वसुर और बहू के अलावा और एक भी काबिल भाजपाई नहीं है? लेकिन गौर की नाराजगी भारी न पड़ जाए, इस खातिर यहां लम्बे समय से पार्टी के लिए ईमानदारी से काम कर रहे अनेकानेक चेहरों को नजरंदाज कर कृष्णा गौर को टिकट दे दिया गया. कृष्णा की राजनीतिक जमीन में संघर्ष का कोई स्थान नहीं है. गौर साहब के मुख्यमंत्री रहते ही उन्हें पर्यटन निगम के अध्यक्ष की कुर्सी मिल गई. तब हो सकता था कि पार्टी का यह निर्णय सराहा गया हो, क्योंकि दुर्भाग्य से तब गौर साहब के पुत्र का अचानक निधन हुआ था. लेकिन फिर उन्हें सामान्य महिला सीट होते हुए भी भाजपा ने महापौर का चुनाव लड़ा दिया. क्या भाजपा के पास सामान्य वर्ग की कोई महिला नेता भोपाल में नहीं थीं? इसके बाद उन्हें महिला मोर्चा सहित प्रदेश भाजपा संगठन में अहम जिम्मेदारियां मिली. हो सकता है कृष्णा गौर बहुत योग्य हों लेकिन जमीनी राजनीति का संघर्ष उनके हिस्से में कभी नहीं आया. जबकि संघर्ष की डगर पर अब तक चलते गोविंदपुरा के ही कई पार्टीजनों को पार्षद का टिकट तक नसीब नहीं हो सका है. इंदौर के सियासी फलक पर  उदीयमान हुए आकाश विजयवर्गीय, सांची में नामूदार हुए मुदित शेजवार तथा रामपुर बघेलान में प्रकट होने वाले विक्रम सिंह भी भाजपा के इसी भीरू चेहरे का परिचायक हैं. वंशवाद के लिए कांग्रेस को पानी पी-पीकर कोसने वाली यह पार्टी वंश के दंश को जिस तरह बेशर्मी से गहना बनाकर ओढ़ रही है, उसे देखकर यकीनन सच्चे भाजपाइयों को आघात ही लगा होगा. 

एक ठग मिठाई की दुकान पर गया. दुकानदार से दस किलो दूध मांगा. फिर उसमें भारी मात्रा में शकर सहित कई मिठाइयां डलवाता चला गया. सब होने के बाद उसने दुकानदार से दूध को मथने के लिए कहा. फिर पूछा, अब यह क्या है? दुकानदार बोला, 'रबड़ी. ठग ने कहा, 'तो मुझे सौ ग्राम रबड़ी दे दो. फिर सौ ग्राम रबड़ी के पैसे देकर वह चलता बना. आज की भाजपा के चतुरसुजान ठग पार्टी के उद्देश्यों और कार्यक्रमों को इसी तरह मथकर अपने-अपने हिस्से की रबड़ी तैयार करने में जुट गए हैं. उस डरपोक दुकानदार की तरह पार्टी के आला नेता भी चुपचाप यह सब देख रहे हैं. अंजाम क्या होगा, यह अलग से बताने की जरूरत नहीं है.


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