लोहा गरम है. लेकिन वह फिलहाल ममता बनर्जी के दिमाग से कम ही गरम हो पाया है. लिहाजा उस पर हथौड़ा चलाने का यह फिलहाल उचित अवसर नहीं है. हालात के बहाने हिसाब चुकाने का सही समय आ गया दिखता है, किंतु वह आया नहीं है. हां, खुशबू बता रही है कि वो रास्ते में है, मौजे-हवा के हाथ में उसका सुराग है. इसलिए  पश्चिम बंगाल के मामले में राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को थोड़ा सा इंतजार कीजिए की तर्ज पर खुद को थामे रखना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को  हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है वाले अंदाज में संयम रखना होगा.   पिछले दो-तीन से चर्चा सरगर्म है कि पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है. केन्द्र सरकार ने ममता सरकार के लिए एडवायजरी जारी की. फिर त्रिपाठी ने दिल्ली आकर मोदी और शाह से बातचीत की है. इसके बाद कैलाश विजयवर्गीय उम्मीद से दिखने लगे हैं

उनके चेले-चपाटों की फौज ने अखबार में इश्तिहार देकर अपने नेता को बंगाल विजय की शुभकामनाएं भी दे डाली हैं. हालांकि आज विजयवर्गीय ने इंदौर में एक तरह से किसानों के मुद्दे पर शक्ति प्रदर्शन कर अपने आगे के इरादों का मध्यप्रदेश के लिए इजहार कर दिया है. गिरिराज सिंह के मुंह पर तो अमित शाह ने नीतिश कुमार छाप टेप चिपका दिया है. वरना यकीन मानिए कि अब तक वह तो पश्चिम बंगाल के भावी भाजपाई मुख्यमंत्री का नाम तक घोषित कर चुके होते. भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष दिलीप घोष सहित इसी राज्य से केंद्रीय मंत्री बने बाबुल सुप्रियो ने भी मुख्यमंत्री की शपथ लेने के लिए सूट या कुर्ते का नाप दे दिया होगा.  लेकिन क्या राष्ट्रपति शासन वाकई लागू होगा? इससे भी बड़ा सवाल यह कि क्या यह कदम उठाना किसी भी लिहाज से भाजपा के लिए शुभ साबित होगा.


 

इस समय नीतिश जैसे जो लोग भाजपा के सहयोगी है, वे तो केन्द्र सरकार के इस कदम का विरोध करेंगे ही, जिन्हें भविष्य के लिए मोदी साधने का काम कर रहे हैं, वे जगन मोहन रेड्डी, केसीआर या नवीन पटनायक भी बिदक सकते हैं. कम से कम मुझे तो इसमें संदेह है. इस आधार पर मेरा आंकलन है कि त्रिपाठी को किसी भी सूरत में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश नहीं करना चाहिए. राज्य में दो साल बाद विधानसभा चुनाव हैं. यह घड़ी जिस अनुपात में नजदीक आ रही है, उसी तेजी से ममता बनर्जी की बौखलाहट उबल-उबलकर सामने आती दिखती है. उनका असली चरित्र रेशा-रेशा उधड़कर प्रकट हो रहा है. न्यूज चैनल्स पर दिखाये जा रहे उनके तमाम हालिया वीडियो इस बात की तस्दीक करते हैं कि उनके भीतर अपने निजी स्वार्थ के लिए तानाशाही रवैया अपनाने के पूरे गुण मौजूद हैं. जय श्रीराम के उद्घोष को गाली बताकर वह धर्म निरपेक्षता के नाम पर अपने भयावह इरादों का सार्वजनिक प्रदर्शन कर चुकी हैं.


हालिया चुनाव के बाद से इस राज्य में अब तक मची हिंसा से साफ है कि सिंगूर के नाम पर जनता के पक्ष में आक्रामक तेवर अपनाने वाली बनर्जी का अब एकसूत्रीय एजेंडा किसी भी तरह अपनी हुकूमत कायम रखना और सियासी ताकत को बढ़ाना है. फिर भाजपा के पश्चिम बंगाल में बढ़े जनाधार के बीच विधानसभा चुनाव की गरमाहट का ममता के पहले से ही प्रतिशोध के लिए सुलग रहे दिमाग पर असर होना अवश्यंभावी है. तो क्यों कर ऐसी सरकार को अस्थिर करने का जतन किया जाए, जो अपनी सुप्रीमो के विक्षिप्त व्यवहार के बोझ तले पहले ही टूटकर गिरने की कगार पर आ गयी है? आखिर तृणमूल में लोग ममता से छिटक ही रहे हैं, भाजपा को उन्हें और छिटकने का मौका देना चाहिए. भाजपा को चाहिए कि ममता को इसी तरह आगे बढ़ने दे. बल्कि सतत रूप से उनके गुस्से में र्इंधन का बंदोबस्त करती चले. ममता ने क्रोध में आखिर कह ही दिया कि देश में वह अकेली ऐसी हैं, जो भाजपा का विरोध कर रही हैं.


यानी ममता ने बीते पांच साल सतत रूप से भाजपा के खिलाफ संघर्ष कर रही कांग्रेस सहित बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, तेलगू देशम, डीएमके, वामपंथी दल और राष्ट्रीय जनता दल के किये-कराये को सिरे से खारिज कर दिया है. विपक्षी एकता चुनाव से पहले भी आकार नहीं ले सकी थी और मोदी सरकार ममता के इस रवैये पर राहत की सांस ले सकती है कि ऐसा भविष्य में भी कोई अवसर नहीं आएगा. यकीनन यह दल भी बनर्जी से खुश तो नहीं ही होंगे. तय मानिये कि तुनकमिजाज ममता का यही रुख कायम रहेगा और इसके चलते वह दिन आ सकता है, जब भाजपा-विरोधी दलों के बीच  उनकी बचीखुची स्वीकार्यता खत्म हो जाए. पश्चिम बंगाल की जनता सब देख और समझ रही है. चुनाव पूर्व और उसके बाद की हिंसा की आग के पीछे छिपे आतिशी मंसूबों को वह भांप चुकी है. इसका कुछ हद तक जवाब उसने लोकसभा चुनाव में दिया और बाकी का हिसाब वह विधानसभा चुनाव में चुकता कर देगी. लेकिन ऐसा होने से पहले यदि ममता की सरकार को केंद्र की ओर से अस्थिर किया गया तो यह तृणमूल सुप्रीमो के लिए सियासी शहादत का सुअवसर बन जाएगा. वह सहानुभूति की दम पर फिर ताकत अर्जित करने की कोशिश करेंगी. धारा 356 का लंबे समय से देश में उपयोग नहीं हुआ है लिहाजा पश्चिम बंगाल में यदि होगा तो लस्त हो चुके विपक्षी और क्षेत्रीय दलों को भी सरकार के खिलाफ खड़े होने का मौका मिलेगा इसलिए बेहतर है कि भाजपा इंतजार करे.  


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