मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की गायों को लेकर चिंता और प्रदेश की मंत्री इमरती देवी की पुरूषों को लेकर. रविवार को मैं भोपाल से बाहर कुछ दूर तक गया था. विदिशा रोड़ पर मुझे दिग्विजय सिंह की चिंता बिछी नजर आयी. उन गायों की शक्ल में, जो जहां तक सड़क किनारे तो अधिकांश जगहों पर बीच सड़क पर ठीक बीच में बैठकर जुगाली कर रही थीं. गाय का पुल्लिंग सांड होता है. जो आदमी, औरतों के मामले में बदलचन हो जाए, उसे समाज में छुट्टा सांड भी कहा जाता है. सो इन गायों के झुंड के आसपास जहां-तहां ताक में खड़े सांड दिखे, वहां इमरती देवी की चिंता नजर आ गयी. मजे की बात यह कि सड़क किनारे कई जगह मुख्यमंत्री कमलनाथ के उपलब्धियां गिनाने वाले होर्डिंग भी दिख गये, जिनमें किसी भी जगह गाय की फिक्र या छुट्टे सांडों के निंदापूर्ण जिक्र जैसा कोई जतन नहीं किया गया था. मामला थोड़ा मजाकिया सा लग सकता है. इसलिए मुद्दे की बात पर आ जाएं. दिग्विजय ने गायों की फिक्र और इमरती के महिलाओं के गलत व्यवहार का जिक्र किया. दोनों ही कथन राज्य सरकार के कामकाज की समीक्षा के नजदीक नजर आते हैं.
भाजपा तो गौ-माता के नाम पर जुबानी जमा खर्च करती रही, लेकिन प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री सिंह ने ट्विटर पर अंगुलियों की वो करामात दिखायी कि बेचारे वर्तमान मुख्यमंत्री को डिफेंसिव मोड में उतरना पड़ा. दिग्विजय ने जो कहा, वह गौ-मूत्र की तरह पवित्र और उसके गोबर की भांति ही लीप-पोतकर इस्तेमाल करने के लायक है. नाथ यदि वाकई गौवंश की हिफाजत का पुख्ता बंदोबस्त कर गुजरें तो शायद प्रदेश में भाजपा का एक बड़ा समर्थक वर्ग आसानी से उनके पीछे आकर खड़ा हो सकता है. यह उनके लिए बहुत आसान भी है. क्योंकि यह उस राज्य का मामला है, जहां भाजपा के हिंदुत्व के कटु विरोधी भी गाय को आहार के रूप में ग्रहण करने जैसी बात कम से कम सार्वजनिक तौर पर तो नहीं ही कहते हैं. लिहाजा यदि नाथ ने इस चौपाये की चिंता की तो तय है कि उनकी कुरसी के चारों पहियों को शायद और मजबूती मिल जाएगी. लेकिन ऐसा करने से पहले जरा यह तो देख लें कि दिग्विजय के इस गाय प्रेम का राज क्या है. इस पशु के संरक्षण की प्रक्रिया यदि किसी रणनीति का हिस्सा होती तो निश्चित ही पूर्व मुख्यमंंत्री ने अपने वर्तमान समकक्ष को गुपचुप तरीके से यह गणित दिया होता.
बताया होता कि किस तरह गाय की आड़ में खांटी धर्म भीरु मतदाता की भावनाओं को दुहा जा सकता है. लेकिन दिग्विजय ने ऐसा नहीं किया. उन्होंने खुलकर कह दिया, जो नाथ को चुभ-सा गया. सिंह ने जो कहा, उसे तीन दिन से ज्यादा हो रहे हैं. नाथ ने उनके कथन को सदाशयता के साथ ग्रहण किया होता, तो यह मुमकिन ही नहीं था कि तमाम गाय कल भी उसी तरह असुरक्षित दिखतीं, जैसी वे बीते लम्बे समय से हैं. तो लगता है कि गाय हमारी माता है, हमें सियासत से के अलावा कुछ नहीं आता है, वाली बात यहां लागू हो रही है. इस पूरे ट्वीट-ट्वीट खेलने के पीछे गौवंश की अंश मात्र भी चिंता निहित नहीं है. साफ है कि दबाव की राजनीति के आदी हो चुके दिग्विजय ने इस भारी-भरकम जीव के जरिये नाथ के कंधों पर बोझ बढ़ाने का प्रयास किया था, जो अंतत: नाकाम हो गया. मुख्यमंत्री ने यदि अपने राजनीतिक भाई की सलाह पर अमल कर दिया होता, तो इसका सारा श्रेय दिग्विजय के खाते में जाता. ढाई मुख्यमंत्री वाली लानत-मलानत का रोजाना सामना कर रहे नाथ कम से कम अब तो ऐसी और गलतियां नहीं करेंगे.


इमरती देवी भले ही लिखा हुआ ठीक से नहीं पढ़ पाती हैं, लेकिन बगैर लिखा बोलने में उनका कोई सानी नहीं है. इसलिए जिस तरीके से उन्होंने महिलाओं के गलत आचरण के चलते छुट्टा सांड जैसा गलत आचरण करने वाले पुरुषों की चिंता की है, उसे स्क्रिप्टेड वाला मामला नहीं कह सकते हैं. वह खरा-खरा बोलती हैं. जिसमें कई बार खराब-खराब की बू भी आती है. खासतौर से तब, जबकि निर्वाचित जन प्रतिनिधि होने के बावजूद खुद की निष्ठा को जयविलास पैलेस के खूंटे से बांधने वाली बात होती है. इन देवी ने जो कुछ कहा, उससे कई देवियों और उनके अनुचर देवताओं का भड़क उठना तय है. यानी मुसीबत सरकार की ही बढ़ेगी. तो प्रश्न यह कि इतना बड़ा जोखिम लेकर महिला मंत्री महिलाओं के खिलाफ क्यों चली गयीं? उन्हें यह पथ किसने दिखाया? मामला यकीनन स्क्रिप्टेड नहीं है, किंतु हर बात लिखकर नहीं दी जाती. कई महत्वपूर्ण (गोपनीय) रणनीतिक कदम कान में फूंके जाते हैं. इमरती के नेता यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया भी नाथ सरकार से नाराज चल रहे हैं. किसानों का कर्ज माफ न करने की बात पर सरकार को सरे-राह जलील कर चुके हैं.


तो हुआ यूं कि ज्यों ही नाथ खेमे से सज्जन सिंह वर्मा नामक प्यादे को सिंधिया के खिलाफ आगे बढ़ाया गया, त्यों ही सिंधिया गुट के प्यादे ने भी एक कदम आगे रख दिया. लेकिन यहां घमासान जैसी स्थिति नहीं बनेगी. कम से कम खुलकर घमासान तो नहीं होना है. अस्तु होगा यह कि इमरती के कहे पर सोशल मीडिया में नयी बहस का आगाज हो जाएगा और जोरदार बात यह रहेगी कि ऐसी कमोबेश हर चर्चा के अंत में राज्य में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार वाली बात अवश्य कही जाएगी और प्रदेश की सरकार के लिए आरोपों का नया कारखाना तेजी से उत्पादन शुरू कर देगा. अब इमरती देवी ने जिन पुरूषों की बात की है वे साधारण पुरूष तो हैं नहीं. आखिर देश के आला दिमाग कहलाने वाले भारतीय सेवाओं के बड़े वाले बाबू साहब लोग हैं. इमरती देवी को भले ही ना हो लेकिन देश और समाज उनसे राम जैसी नहीं भी तो साधारण मर्यादा की उम्मीद करता ही है. अब अगर शहद पर लार टपकाने से इनकी नीयत बाज नहीं आती तो ट्रेप कर रही महिलाओं से कहीं ज्यादा दोष इनका ही है. फिर भी इमरती और दिग्विजय के कहे का निहितार्थ इतना ही है कि, गाय हो या छुट्टा सांड, दोनों के ही सींग कमलनाथ की तरफ कर दिये गये हैं. मुख्यमंत्री का सियासी कौशल एक बार फिर चुनौती का सामना कर रहा है. एक तरफ नेता प्रतिपक्ष की अघोषित भूमिका वाले दिग्विजय सिंह हैं तो दूसरी ओर इसी भूमिका में मंत्री पद संभाल रहीं इमरती देवी. ऐसे हालात का नाथ सींग पकड़कर मुकाबला करेंगे या इनके प्रहार से बचने का जतन? फिलवक्त यहां सिर्फ सवाल है.


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