गजब ही कर दिया साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने. भाजपा नेताओं की सिलसिलेवार मृत्यु को टोना-तंत्र से जोड़ना उनकी सोच के निम्नतम स्तर को एक बार फिर उभार कर सामने ले आया है. क्या साध्वी मूलत: ऐसी ही हैं, या फिर उन्होंने खुद को ऐसे स्वरूप में ढाल दिया है. अपने अल्पज्ञान को हिंदुत्व की दुशाला में छिपाने के लिए. तथ्यों तथा साक्ष्यों के लिए अपनी न्यूनतम अक्ल को हिंदुवाद के आवरण में छिपाने के लिए. या फिर ऐसा है कि यह महिला हिंदुत्व के नाम इस तथ्य के संवाहक भाजपा एवं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को ही नुकसान पहुंचाने का प्रण लेकर सत्ता के मैदान में उतरी है. शर्म तो भाजपा के चयन तथा निर्णय, दोनो पर आ रही है

सांसद के चुनाव हेतु साध्वी के चयन का आधार क्या रखा गया था? हिंदुत्व, भगवा या फिर उग्र हिंदुवाद! इस निर्णय का भला क्या तुक था कि उस समय हेमंत करकरे तथा अयोध्या में विवादास्पद ढांचे के गिरने को लेकर दिये गये बे-सिर-पैर के बयानों के बावजूद प्रज्ञा के खिलाफ ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई न की जाए? साध्वी की बे-लगाम जुबान पर भविष्य के अंकुश की खातिर ऐसा किया जाना समय की मांग थी, किंतु पार्टी ने इस ओर औपचारिकता मात्र पूरी करके अपने कर्तव्य की इति-श्री कर ली. नतीजा सामने है. टोना-टोटका कांड को लेकर चहुंओर भाजपा की हंसी उड़ रही है. साध्वी ने जो कुछ कहा, वह भाजपा या संघ का हिंदुत्व कतई नहीं है.

हमें इन दो संगठनों की हिंदुओं से संबंधित मूल अवधारणा से तनिक भी आपत्ति नहीं है, किंतु पार्टी तथा संगठन, दोनो को निर्णायक एवं निश्चयात्मक तरीके से यह साफ करना होगा कि उनका हिंदुत्व साध्वी की इस बारे में सोच से कितना और किस-किस तरह से अलग है. यह एक और मौका मिला है कि प्रज्ञा के ऐसे व्यवहार के खिलाफ बहुत सख्त कदम उठाकर यह साबित कर दिया जाए कि मामला उस दल का है, जो समय के साथ बदलने और कदमताल करने में यकीन रखता है. हिंदू का अर्थ अब वह नहीं रहा, जिसमें तंत्र-मंत्र या मारक मंत्र जैसे दकियानूसी खयालात कभी शामिल किये जाते थे. हिंदुत्व अब एक विज्ञान है. अवधारणा है. आधुनिकतापुट उसमें शामिल हैं.
जड़ों के केवल उन तत्वों के प्रति उसका आग्रह है, जो वैज्ञानिकता, ऐतिहासिक साक्ष्य एवं तथ्यों के नजदीक पाये गये हैं. ऐसे समाज में अंधविश्वास का कोई स्थान नहीं है. किंतु भाजपा अंधविश्वास के चलते मात खा गयी. उसने किसी नेत्रहीन की तरह आचरण करते हुए प्रज्ञा पर यकीन कर लिया और यह अब उसके लिए शर्म का कारण बनकर रह गया है. हालांकि मेरा यह अभिमत भी है कि इस घटनाक्रम पर कम से कम कांग्रेस को तो कुछ भी बोलने का अधिकार नहीं है. क्योंकि यह वही दल है, जिसके तत्कालीन शीर्ष नेताओं ने नेमीचंद जैन उर्फ चंद्रास्वामी जैसे स्वयंभु तांत्रिक को समानांतर सत्ता चलाने का अधिकार दे रखा था.
पार्टी के तमाम दिग्गज अपने-अपने सियासी कुशलक्षेम की खातिर उसके चरणो में लोट लगाते रहते थे. यह दल वह भी है, जिसके भोपाल से चुनाव हारने वाले उम्मीदवार दिग्विजय सिंह ने विजय की खातिर मिर्ची यज्ञ में सपत्नीक हिस्सा लिया था. मध्यप्रदेश विधानसभा के भवन को शापित बताने वालों में कांग्रेस के विधायक भी शामिल हैं. उन में से ही कई इस बात पर यकीन करते हैं कि इस भवन में किसी दोष के चलते कई विधायकों की मौत हो चुकी है. इस लिहाज से वहां पूजा कराया जाना अनिवार्य हो गया है. अंधविश्वास की मूर्खता को केवल प्रज्ञा ठाकुर के खाते में मत डालिये. ऐसे जाहिल दिमाग लोगों की निष्पक्षता के साथ व्याख्या करें. उनका प्रतिकार किया जाए. इस मामले में बीमारों का इलाज नामुमकिन हो चुका दिखता है, लेकिन बीमारी का इलाज अब भी संभव है. उसमें अब तनिक भी विलंब नहीं किया जाना चाहिए.


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