गजब का गुरूवार! जबरदस्त जुम्मेरात! हर ओर औरत. सर्वोच्च न्यायालय की चिंता में. घुसपैठियों के रोम-रोम में. कांग्रेसी महाराजा द्वारा किए गए अपमान को बिसराने में और भोपाल के मंत्री निवास में भाई के खिलाफ मां के दर्द भरे तारों को छेड़ती वीणा में. 

देश की सबसे बड़ी अदालत का दीपक एक बार फिर निराशा के अंधेरे को चीरता दिख रहा है. यह शर्म का ही द्योतक है कि इक्कीसवीं सदी में किसी संविधान पीठ को यह कहना पड़े कि महिला पति की बपौती नहीं है. हालांकि इस दिशा में मनोरमा,मुक्ता, गृह शोभा और मेरी सहेली दशकों से सक्रिय हैं. स्त्री के चीत्कार को चीखकर सुनाती रहीं. लेकिन मामला महज मैग्जीन का था, सो कागजी ही साबित हुआ. यह तब ही सुलझता दिख रहा है, जब चीत्कार के हक में अदालत का हथौड़ा गरजा. उम्मीद करें कि सुधार का यह क्रम यूं ही चलता रहेगा. कामयाबी के साथ. दीपक की रोशनी को साधुवाद.

श्रीलाल शुक्ल से वाक्य उधार लेकर एक बात लिखी जा सकती है. वह यह कि बांग्लादेशी घुसपैठियों की बांछें, वो जिस्म में जहां कहीं भी होती हों, खिल गई होंगी. यह जानकर कि ममतामयी आंचल अब भी उन पर छाया हुआ है. उन्हें उनके सारे दुर्गुण और पापों के साथ इसी देश में सुरक्षित रखने वाला आंचल. आंचल कपड़े का होता है और इसी कपड़े से कफन भी बनता है. जिसके नीचे देश की सुरक्षा और इसके वास्तविक नागरिकों के अधिकारों को शव की तरह ढंकने का जतन चल रहा है. सनसनी की भूख ने मीडिया को डायबिटीज के मरीज में तब्दील कर दिया है. उसे लगातार एक निश्चित अवधि पर खुराक चाहिए. अस्तु उसके लिए सन 2005 में घुसपैठियों का विरोध करती ममता बनर्जी भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, जितनी आज घुसपैठियों का समर्थन करती मुख्यमंत्री. 

ऐसे में अधीर रंजन चौधरी का तथ्यात्मक आरोप सेलिब्रिटी मुख्यमंत्री के आगे सिंगल कॉलम खबर जितनी ही हैसियत रख पा रहा है. दीपेन पाठक, दिगंत सैकिया और प्रदीप पचोनी की बगावत को सांत्वना पुरस्कार की तरह ही तवज्जो मिल पा रही है. डायबिटीज की भूख चौधरी, पाठक, सैकिया या पचोनी जैसी छोटी खुराक से नहीं मिटती. इसलिए न तो बीमार को दोष देना ठीक है और न ही बीमारी को कोसने का कोई अर्थ रह जाता है. 

कोसना तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी गलत ही होगा. नूरी खान के गुरूवार की सुबह से लगातार बहे आंसू अंतत: महाराजा के लिए उनका गुस्सा भी बहा ले गए. खान के आंसू सूखे तो आंखों के भीतर फिर कांग्रेसनुमा टापू उदित हो गया. उस टापू पर बीस साल की पार्टी-भक्ति की फसल लहलहा रही थी. सिंधिया के प्रति सम्मान वाले फूल खिले हुए थे. फसल वाले खेत और फूलों वाली क्यारी, दोनों में समझाइश/हिदायत/चेतावनी ब्रांड का खाद डला हुआ था. नूरी ने शाम को खेत तथा क्यारी में कीटनाशक का छिड़काव किया, ताकि टिड्डी दल वहां से भाग निकले. वह टिड्डियां, जो नूरी की नजर में भाजपा हैं. मीडिया की नजर में सनसनी हैं और जरा-भी समझदार इंसान की दृष्टि में जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है. 

लेकिन एक मां का अस्तित्व है. केरवा कोठी का वजूद है. अजय सिंह राहुल का कद बदस्तूर बना हुआ है और वीणा सिंह का संघर्ष भी कायम है. मामला खालिस पारिवारिक है. उस पर टिप्पणी उचित नहीं होती. बशर्ते कि खुद परिवार द्वारा इसे मीडिया के सामने नहीं परोसा जाता. कम से कम एक पक्ष तो इस कहानी घर-घर की, को कहानी घर से बाहर की, बनाने का दोषी है ही. मां युद्ध का आगाज करने के बाद पाशर््व में चली गईं. अब एक तरफ बेटी तो दूसरी ओर बेटा तलवार भांज रहे हैं. भाई पर कीचड़ उछाला जा रहा है. वह कीचड़, जिसमें कमल खिलता है. बहन के आरोपों का शालीनता से जवाब दिया जा रहा है. वह शालीनता, जिसमें राजनीतिक विवशता भी छिपी हुई है. आरोप-प्रत्यारोप के गलत-सही होने का पता नहीं, लेकिन यह सब जिस तरह से हो रहा है, उसे सही तो कतई नहीं कहा जा सकता. 

कहा तो यह भी नहीं जा सकता कि कहकशा परवीन के जरिए राज्यसभा में प्रश्नकाल का संचालन कराना केवल एम वेंकैया नायडू के वश की बात थी. लेकिन सच यह है कि ऐसा नायडू ही कर सके. इसकी तारीफ की जाना चाहिए, सुमित्रा महाजन, सुषमा स्वराज और निर्मला सीतारमण जैसे निर्णयों की तरह ही. लेकिन फिर भी चित्त अशांत ही है. कोई बात इसे खाये जा रही है. उस खटमल की तरह, जो एअर इंडिया के विमान में कहीं गायब हो गया है. उसे किसी एयर होस्टेस ने तो गायब नहीं कर दिया? गुरूवार महिलाओं की शक्ति का दिन था और शक्ति के आगे खून चूसने वाले किसी खटमल के अस्तित्व की भला क्या बिसात हो सकती है! सच मानिए, खटमल विलुप्त नहीं हुआ. वह कहीं छिपकर अब भी खून चूस रहा है. इस खटमल को समूल खत्म कर सके, ऐसा गुरूवार कब आएगा? देश वाले तो इसका जवाब नहीं ही दे पाएंगे, तो चलिए किसी घुसपैठिए से ही यह सवाल कर लिया जाए या इसके लिए भी किसी संविधान पीठ के गठन का इंतजार कर लें.


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