गये  साल डिस्कवरी चैनल पर एक शो देखा था. नदी में उतरे ज़ेबरा पर मगरमच्छों ने हमला किया. वह घायल हुआ, लेकिन किसी तरह पानी से बाहर आ गया. वहाँ एक शेर परिवार ने उसे निशाना बनाना चाहा. ज़ेबरा घायल होने की वजह से भाग नहीं सकता था. इसलिए फिर वो पानी में उत्तर गया. अब हालत यह कि पानी में मगरमच्छ उसे शिकार बनाना चाह रहे थे और ज़मीन पर शेर उसे देखकर जुबान लपलपा रहे थे. दो समान प्रवृत्ति के किन्तु अलग-अलग प्रजातियों वाले खूंखार जीवों के बीच भागते-भागते अंततः ज़ेबरा उनमें से किसी एक का निवाला बन गया.

क्या सभ्य समाज के नाम पर पनपे जंगल में हम भी शिकारियों के निशाने पर हैं? एक-सी प्रवृत्ति किन्तु अलग-अलग प्रजाति वालों के निशाने पर. शायद हम इसी हालत में हैं. ज़मीन और पानी, दोनों ही जगह खतरे से घिरे हुए. हमने कभी आपातकाल का दंश सहा. जवाब में हुकूमत पलट दी. पानी से निकलकर ज़मीन तक पहुँचने की तर्ज पर. 

विज्ञान चेचक का पूर्णतः उन्मूलन कर चुका. लेकिन अब इबोला है. एड्स है. आपातकाल भी अतीत का विषय है. लेकिन, उस जैसी प्रवृत्ति अब भी है. और विस्तृत रूप में. तेजी से घातक संक्रमण फैलाती हुई. 'गोलमाल' फिल्म में अमोल पालेकर कहते हैं, 'कौन कम्बख्त कहता है कि हिटलर मर गया!' उनके सुर में सुर मिलाने का जी करता है. हिटलर यदि 26 जून, 1975 को ज़िंदा था, तो आज भी उसका वजूद कायम है. आपातकाल की 44वीं बरसी पर आप विज्ञापन जारी कर  उन काले दिनों की याद दिला रहे हैं, जिनके लिए इस देश की जनता कांग्रेस को कब का माफ़ कर चुकी है. उसने इंदिरा गाँधी को फिर प्रधानमंत्री बनाया. कांग्रेस की माफी पर आम आदमी के यक़ीन का यह पुख्ता प्रतीक है. लेकिन चुनावी वेला में ऐसा विज्ञापन! साथ में इंदिरा की तुलना हिटलर से कर रहे हैं! यक़ीन मानिये, यह वैसा ही क्रूर आचरण है, जैसा दुनिया ने 1933 से लेकर 1945 के बीच जर्मनी में जोसेफ गोएबल्स के रूप में देखा था.

हिटलर यहूदी नस्ल के समूल सफाये पर आमादा था. इस दिशा में उसका कथन और आचरण कहीं 'कांग्रेस-मुक्त' भारत में तो परिलक्षित नहीं हो रहा है! कुछ कम क्रूर और अपेक्षाकृत सभ्य स्वरुप में! फिर, आप तो किसी की भी न सुनने पर आमादा हैं. दिल्ली पूरी तरह बेदिल हो चुकी है. दिल की बात चली है तो लगे हाथों हृदयप्रदेश यानी मध्यप्रदेश का हाल भी देख लीजिये. आप विरोध सहित विरोधियों को भी कुचलने पर उतारू हैं. जिस कक्ष में बैठकर अविश्वास प्रस्ताव की हत्या की है, विश्वास कीजिये, उस कक्ष का स्वरुप  हिटलर के किसी यातनागृह से पृथक नहीं होगा. सत्ता की तिहरी निरंतरता का ऐसा दम्भ! ताकत बनाये रखने के इतने आततायी जतन! आखिर किस बात से डर रहे हैं आप! अविश्वास प्रस्ताव पर बात तो आप भी रख सकेंगे. विपक्ष के आरोप का जवाब दे सकेंगे. तो फिर नियमों की आड़ मे ये आपातकालीन रवैया क्यों! क्या इसलिए कि आप 'विपक्ष-मुक्त्त मध्यप्रदेश' का प्रादेशिक प्रसारण सुनाकर खुद  को 'मन की बात' का सच्चा पॉकेटबुक एडिशन साबित करना चाह रहे हैं!

दिल्ली और भोपाल की गर्व से अकड़ी गर्दनों के लिए यह कुछ झुककर खुद के गिरेहबान में झाँकने का समय है. विज्ञापन देकर बताइये कि क्यों कर बीते चार साल में लोकसभा के किसी भी स्तर में 75 बैठकें नहीं हो सकी  हैं. क्या वजह रही है कि बैठकों की संख्या के लिहाज से मध्यप्रदेश विधानसभा भी बीते साढ़े चौदह साल से यही फटेहाली झेल रही है.

हुजूर-ऐ-आला! हम तो नदी से बाहर आकर भी 'शिकार' की श्रेणी के ही हैं. शायद यही हमारा प्रारब्ध था. मूँद लीजिये हम से आँखें.  लेकिन आरम्भ में बताये गए ज़ेबरा का तसव्वुर कीजिये. उसकी जगह लोकतंत्र को रखिये. वह भी कभी नदी तो कभी ज़मीन पर उसी जीव की तरह लहुलूहान होकर हांफता हुआ  भाग रहा है. यह लोकतंत्र ही नहीं बचा तो आप भी नहीं रहेंगे. तो देश नहीं, न सही, किन्तु खुद की खातिर ही बचा लीजिये 26 जनवरी, 1950 की इस पैदाइश को.

आप चुनावी महासागर में डुबकी लगाने की तैयारी कर रहे हैं. एक शेर याद आता है, 'कश्ती से कूद जाएं, मगर जायेंगे कहाँ! एक दूसरी जमीन पानी के बाद भी है.' उम्मीद है कि इसका गूनार्थ आपसे बचकर नहीं जा सकेगा. हाँ, यह बात और कि खुद आप ही इस  अर्थ को अछूत मानकर तज दें. यदि ऐसा करें तो एक शेर और याद कर लीजियेगा, 'दामन पे खूं के दाग रहने भी दीजिये. महशर में वरना ढूंढेंगे, फिर किस निशाँ से हम!' याद दिला दें कि यह शेर आपातकाल के बाद लिखा गया था. इसे इंदिरा गाँधी द्वारा देश से माँगी जा रही माफी के  जवाब में कहा गया था. अब आप माफी मांगने का रियाज़ करें या शेरो-शायरी को समझने की मशक़्क़त, ये पूरी तरह आप पर ही निर्भर करता है.


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