कभी प्रवचन में एक कहानी सुनी थी. घनी रात थी. लोगों का समूह नदी पार करने आया. जो नौका दिखी, उस पर बैठ गया. अंधेरे के चलते हाथ को हाथ नहीं सूझता था. लोग अंदाजे से किनारे की ओर जाने की नीयत से बारी-बारी चप्पू चलाते रहे. सूरज निकला तो पता चला कि नाव अपनी जगह से जरा भी आगे नहीं बढ़ी थी. वजह यह कि लोग उस रस्सी को खोलना ही भूल गए थे, जिससे नाव उस किनारे पर बंधी हुई थी.

यहां भी बात रस्सी की ही हो रही है. फांसी के फंदे वाली रस्सी. बलात्कार के मामलों ने भयावहता से देश को घेर रखा है. इस अंधेरे के बीच अपराधों की नदी को पार करने की कोशिश की गई. बारह वर्ष से कम आयु वाली बच्चियों के बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान बनाकर. पहले मध्यप्रदेश, फिर केंद्र और अब कुछ राज्यों में इसके लिए कानून भी बना दिया गया. लेकिन मामला ऊपर बताई गई नाव जैसा ही निकला. व्यवस्था-रूपी नाव को अव्यवस्था-रूपी तंत्र की रस्सी ने बांध रखा है.

इसलिए हुआ यह कि कानून बनने के बाद फांसी की सजाओं का ऐलान तो हो गया, लेकिन एक भी मामले में इस सजा पर अब तक अमल नहीं किया जा सका है. यानी अंधेरे में चप्पू चलाए जाते रहे लेकिन नाव रत्ती भर भी आगे नहीं सरक सकी. फांसी की इस सजा से इन वीभत्स  मामलों के अपराधियों में जो खौफ पैदा होना चाहिए था, वो कहीं नजर नहीं आ रहा है. बल्कि लग ऐसा रहा है कि मासूम बच्चियां अब कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं.

निश्चित ही दण्ड के रूप में भी सही, लेकिन किसी की जान लेने का फैसला दुर्लभतम हालात में ही लिया जाना चाहिए. देश में ऐसा हो भी रहा है, लेकिन ऐसे हालात कानून की नजरों में साबित हो जाने के बावजूद फांसी की सजा के अमल में गैर जरूरी देरी समझ से परे है. बीते चौदह साल में देश में 371 अपराधियों के लिए सजा-ए-मौत का ऐलान किया गया, लेकिन फांसी केवल चार को दी जा सकी है.

वजह यह कि देश की न्याय व्यवस्था आज भी "मोहन जोशी हाजिर हो" की तर्ज पर ही चल रही है. यह वह फिल्म है, जिसका मुख्य किरदार अदालती प्रक्रियाओं के मकडजाल में फंसकर अंतत: दम तोड़ देता है. वास्तविक जीवन में दम तोड़ा जाना चाहिए फांसी की सजा पाए लोगों का, लेकिन मामला लटकाए रखने के अनगिनत लूप होल्स के चलते उनकी बजाय इंसाफ-पसंद लोगों की आशाएं मरती जा रही हैं.

सवाल यह भी है कि इंदिरा हत्याकांड के आरोपियों सहित अफजल गुरू और अजमल कसाब जैसों की फांसी में अपेक्षाकृत ज्यादा विलंब नहीं हुआ. लेकिन निर्भया के दोष-सिद्ध कातिलों सहित उन जैसे अन्य की श्वांस प्रक्रिया का आरोह-अवरोह अब भी चल रहा है. मध्यप्रदेश में नया कानून बनने के बाद बीते आठ महीने में तेरह दरिंदो को मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, लेकिन एक पर भी अब तक अमल नहीं हुआ है. तो सवाल यह कि उस खौफ का क्या हुआ, जिसे पैदा करने की गरज से कानून को और सख्त किया गया है.

बिना समुचित प्रक्रिया अपनाए किसी को फंदे पर टांग दिए जाने की हिमायत कोई नहीं करेगा. किंतु प्रक्रिया के नाम पर रबर इतनी लम्बी तो न खींची जाए कि अंतत: उसके टूटने की नौबत आ जाए. संशोधन तो यह भी होना चाहिए कि किसी दोष-सिद्ध को इस सजा के खिलाफ अपील करने से लेकर उसकी निर्णायक सुनवाई की मियाद भी तय की जाए.

अंग्रेजी में कहा गया है, जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड. यानी न्याय में देर हो जाए तो फिर वह न्याय नहीं रह जाता. इसलिए रेप के मामलों में मृत्यु की सजा के प्रावधान समयसीमा में बांधने ही होंगे. तभी अपराधियों के बीच वह डर पैदा होगा, जो आज के परिवेश की बहुत बड़ी जरूरत बन चुका है. अदालत का फैसला भले ही इंसाफ की श्रेणी में आता हो, लेकिन जब तक उस पर अमल नहीं होगा, तब तक यही कहा जाएगा कि इंसाफ अभी बाकी है.


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