क्या अब भी यह बहस मौजू है कि राजनीति में वंशवाद हो या नहीं हो? सन्दर्भ उस नियम का है, जिसके तहत भाजपा ने चुनाव में स्थापित नेताओं के परिवारजनों को टिकट देने के नियम कड़े कर दिए हैं. इसे राजनीतिक शुचिता का मामला मत समझिये. शुचिता और सियासत का तालमेल तलाशना चील के घोंसले में मांस पाने की कोशिश जैसा ही है. ऐसे नियम बनते हैं, असंतोष को थामने के लिए. पार्टी के भीतर का असंतोष.
गंदगी से बजबजाते राजनीतिक सिस्टम को  ठीक करने का कोई भी जतन आज तक पूरी तरह कामयाब नहीं हुआ है. दशकों में एकाध टीएन शेषन आता है. वो अकेला जो ठीक कर सका, बस उतना ही लोकतंत्र पर मेहरबानी के  रूप में ले लिया जाना चाहिए. हम निस्पृह भाव से तमाम गलत आचरण उदरस्थ किये जा रहे हैं. भ्रष्टाचार के आगे नतमस्तक हैं. भ्रष्टतम राजनेता को हम जाति या क्षेत्र के आधार पर वोट दे देते हैं. उसकी तमाम मीठी बातों में घुले ज़हर को हम जानबूझकर नज़रअंदाज़ करते हैं. नेता ही क्यों, इंसानों की बाकी कौमों पर आइये. हम यातायात के नियमों का उल्लंघन करने में शान महसूस करते हैं. टैक्स की चोरी करने वालों से देश के खराब हालात पर बुद्धि विलास करते थकते नहीं हैं. उन तथाकथित बुद्धिजीवियों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं, जो समाज को नैतिकता की तालीम देते हैं और खुद किसी 'माया मेमसाब' फिल्म देखने इसलिए टूट पड़ते हैं कि उसमें ज़ोरदार बैडरूम सीन है. हम वो हैं, जो समुदाय के आधार पर किसी बलात्कार मामले में आवाज़ उठाने या चुप रहने का निर्णय लेते हैं. और हम वह भी हैं जिनके लिए 15 अगस्त या 26 जनवरी की याद एडवांस में दारू और मुर्गा का इंतज़ाम करने के तौर पर ही आती है. 
हम खुद गलत हैं. गलत लोगों को जन प्रतिनिधि चुनते हैं. फिर उम्मीद करते हैं कि राजनेता सही हों. नैतिकता और ईमानदारी से भरे हुए. यह तो वैसा ही हुआ, जैसे दिन भर एक-दूसरे को खाने को दौड़ती सास-बहू शाम को एक ही टेलीविज़न पर 'कहानी घर-घर की' वाली तुलसी और बा का प्रेम देखकर टसुए बहाती हैं. समस्या यह है कि हमें  देश  में भगत सिंह चाहिए, लेकिन पड़ोसी के बेटे के रूप में. जब हम खुद इस कदर नौटंकी से भरे हुए हैं, तो नेताओं से सदाचार की अपेक्षा क्यूँ? आने दीजिये उनके परिजनों को सियासत में. नहीं, तो फिर हलफ उठाइये कि आप अपनी संतान का करियर राजनीति में बनाएंगे. वह भी ठीक वैसा महान राजनीतिज्ञ, जैसा आप मौजूदा जन  प्रतिनिधियों के न होने पर शिकायत करते हैं. लेकिन आप ऐसा नहीं करेंगे.  क्योंकि आप जानते हैं कि जिस भ्रष्ट सिस्टम को आपके चलते पल्लवित होने का मौका मिला, उस भ्रष्ट सिस्टम में अन्ना हज़ारे जैसी आवाज़ भी नक्कारखाने में तूती की शक्ल ले लेती है. 
नियम का चोला ओढ़ने वाली भाजपा तो खुद पार्टी विद डिफरेंस का चोला त्याग चुकी है. इसलिए वंशवाद के नाम पर ऐसी दिखावटी जुगत कर वह केवल राहुल गाँधी पर निशाना साधना चाह रही है. चुनाव आने दीजिये, नियम उसी तरह एक कोने में पड़ा दिखेगा, जिस तरह अयोध्या में भगवान् राम आज भी टेंट के भीतर ही दिख रहे हैं. न इस नियम की व्याख्या में समय बर्बाद कीजिये और न ही इसके लिए किसी तारीफ या निंदा की मशक्कत कीजिये. सब कुछ वैसा ही चलेगा, जैसा आपके वोट पाने वाले चाहते हैं. 'कोऊ नृप होये, हमें का लाभ' का रट्टा लगाइये. कायरता का गद्दा बिछाइये. निस्पृहता का तकिया रखिये. नपुसंकता की चादर ओढ़िये और लम्बी  नींद लीजिये. आप ही के लिए किसी ने लिखा है, ' किस-किस  को याद कीजिये, किस-किस पे रोइये. आराम बड़ी चीज है, मुंह ढँक के सोइये.' शुभ रात्रि, क्योंकि सुबह तो आप खुद ही देखना नहीं चाहते हैं.
  


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