इस कहानी के दोनों पात्रों में विरोधाभास के बावजूद समानता है.दोनों को मध्यप्रदेश की कांग्रेस माना जा सकता है.तो कहानी ये है कि एक ठाकुर साहब थे.उनके घर के सामने से एक दलित पगड़ी पहन कर गुजर रहा था.ठाकुर साहब को भला कहां बर्दाश्त होता.उन्होंने दलित को टोका, पगड़ी पहन कर तो तू मेरे सामने से गुजर नहीं सकता। दलित ने दलील दी, ठाकुर साहब, जमाना बदल गया है अब आजकल ऐसा नहीं होता है। ठाकुर ने तलवार निकाल ली.कहा, तेरी तो पगड़ी भी गर्दन के साथ मेरे कदमों में होगी.दलित ने कहा, यह तो अन्याय है, मौका मुझे भी मिलना चाहिए.मैं भी घर से तलवार लेकर आता हूं। ठाकुर राजी हो गया.उधर दलित तलवार लेने घर गया और इधर ठाकुर चिंता में.कहीं इसने मुझे हरा दिया तो बहुत बदनामी होगी.इस बदनामी को लेकर मेरा परिवार कैसे जी पाएगा.लिहाजा, ठाकुर ने पहले परिवार वालों की गर्दन पर ही तलवार चला दी.उधर दलित तलवार लेकर लौटा नहीं.ठाकुर उसके घर पहुंचा तो दलित ने दोनों हाथ जोड़ दिए, गलती हो गई ठाकुर साहब.माफ कर दों.मैं कहां आप से लड़ पाऊंगा। और यह कह कर उसने पगड़ी ठाकुर के चरणों में रख दी.

कांग्रेसाध्यक्ष राहुल गांधी की 17 सितम्बर को हो रही मध्यप्रदेश यात्रा का हाल भी कुछ ऐसा ही है.सालों सत्ता में रहे सो ठकुरास जाने से रही.वास्तविकता समझ में आ गई कि हमसे हो नहीं पाएगा। सो लगे हाथ माफी भी मांग ली.तो न अब राहुल गांधी विदिशा में कोई सभा करने जा रहे हैं और ना ही भोपाल में उनका पब्लिक को दर्शन देने के अलावा कोई कार्यक्रम कांग्रेस कर पा रही है.फिर भी अच्छा है कि कम से कम कांग्रेस अपने पन्द्रह हजार कार्यकर्ताओं को बुला कर राहुल गांधी से संवाद तो करवा रही है.इसमें बूथ  से लेकर वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधि शामिल होंगे.सोचे, बीते 15 साल में कांग्रेस की क्या हालत हो गई.एक उसे सत्ता से अलग करने वाली उसकी प्रतिद्वंद्वी भाजपा है जो 25 सितम्बर को कार्यकर्ता महाकुंभ में अपने दस लाख कार्यकर्ताओं को भोपाल लाने जा रही है.इसमें भाजपा के वर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों के साथ हर बूथ के पन्ना प्रमुख भी शामिल रहेंगे.सत्ता में आने के बाद पिछले दो विधानसभा चुनावों से पार्टी का शंखनाद  कार्यकर्ता महाकुंभ से ही हो रहा है.इस कार्यकर्ता महाकुंभ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह दोनों मौजूद रहेंगे.

तो एक तरफ संगठन से समृद्ध भाजपा है.साधनों से सम्पन्न भाजपा है.रणनीति में कोसों आगे खड़ी भाजपा है.दूसरी तरफ बस सम्पन्न और समृद्ध अतीत रह गया है.अतीत की ठकुरास बाकी है लेकिन वर्तमान की दरिद्रता के अहसास का क्या? बीते पन्द्रह सालों में कांग्रेस जमीन पर नया कुछ नहीं कर पाई है.न नया समर्थक वर्ग है और न नए कार्यकर्ता.कांग्रेस के लिए 2003 और 2018 बस आईना है.जब कांग्रेस के आसमान में कुछ नहीं बदला तो जमीन पर कहां से बदलना था.आसमान पर भी उन्हीं चेहरों का कब्जा है जो 2003 में भी काबिज थे.राहुल गांधी ने अपने तई कांग्रेस में बहुत प्रयोग किए हैं.छात्र संगठन से लेकर युवक कांग्रेस तक में संगठन चुनाव कराने की पहल की.कांग्रेस के सिपाही बनाने की कोशिश की.लेकिन नतीजा ढाक के तीन पांत.सोचिए आखिर लोकसभा में कांग्रेस पहली बार इतिहास की शर्मनाक पोजीशन में है.आखिर इसके अकेले दोषी राहुल गांधी तो हैं नहीं.तो जिन्होंने जमीन पर कांग्रेस को समेटा और जो आसमान पर कब्जा किए बैठे हैं, अब उनकी भूमिका बस, कहानी के ठाकुर और दलित से अलग कहां रह गई है.

इसलिए कांग्रेस के नेता कहते हैं कि कांग्रेस का चुनाव तो जनता लड़ती है.खुद और संगठन पर तो भरोसे का अब सवाल ही बाकी नहीं है.पिछले 15 सालों में जनता कांग्रेस के लिए लड़ने को राजी नहीं हो रही है.हर चुनाव से पहले कांग्रेस के नेताओं को लगता है कि बस, जनता बहुत नाराज है.पर वास्तव में नाराज किससे है? यह कांग्रेसी समझ नहीं पा रहे हैं.वाकई में दिख रहा है, जनता में बहुत असंतोष है.कई कारण हैं.समाज का बंटवारा हुआ पड़ा है.पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत आसमान पर है.लेकिन नाराजगी में कांग्रेस का साथ की बजाय नोटा पे हाथ के नारे लग रहे हैं.कांग्रेस इस लायक भी नहीं रह गई है कि सरकार या भाजपा के विरोध को अपने पाले में खींच सकें.इसके लिए एक मजबूत संगठन की जरूरत होती है.जिसे देश की सत्ता पर बहुमत से काबिज होकर भाजपा ने साबित किया है.आखिर 2013 में कांग्रेस के विरोध में बने माहौल को भाजपा ने अपने पक्ष में किया था या नहीं? इस समय कांग्रेस सहित ऐसा कौन सा राजनीतिक दल है जो सरकार के खिलाफ बने माहौल को अपने पक्ष मे मोड़ने में सक्षम नजर आता है.इसलिए मध्यप्रदेश में जो लोग किसी करिश्में की उम्मीद कर रहे हैं, उन्हें नतीजे पर जाने से पहले तसल्ली से इंतजार करना चाहिए.क्योंकि करिश्मा तो अभी शिवराज का ही दिख रहा है.


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