21 जून को फादर्स डे था. बहुत से बच्‍चों ने अपने पिता के पैर छुए होंगे. हालांकि पैर छूने का प्रचलन अब समाप्‍त प्राय स्थिति में है. आने वाले कुछ वर्षों के बाद बच्‍चों को यह पता भी नहीं होगा कि बड़ों को पैर छूकर प्रणाम करना चाहिए. क्‍योंकि उन बच्‍चों के माता-पिता ने युवावस्‍था से ही यह बंद कर दिया है. बच्‍चे जब अपने माता-पिता को प्रणाम करते हैं तो वे कई प्रकार के आशीर्वाद देते हैं. इन आशीर्वादों में प्रचलित आशीर्वाद हैं, खुश रहो. कुछ पिता यह भी कहते हैं कि तुम्‍हारी मनोकामनाएं पूर्ण हों. मगर ऐसे पिताओं की संख्‍या बहुत कम होगी, जिन्‍होंने कल अपने बच्‍चों को अच्‍छा इंसान बनने का आशीर्वाद दिया होगा. 
हमारे बच्‍चे एक अच्‍छा इंसान बनें, इस विषय में हम कभी सोचते ही नहीं हैं. जब सोचते नहीं हैं तो आशीर्वाद भी नहीं देते हैं. क्‍योंकि हम में से अपने बेटे को इंजीनियर बनाना चाहता है, तो कोई डॉक्‍टर. जिस पिता को यह पता है कि उसमें बेटे को डॉक्‍टर अथवा इंजीनियर बनाने की क्षमता उनमें नहीं है, वे अपने बेटे को सरकारी नौकरी के योग्‍य बनाना चाहते हैं. पिता इस बात को भली भांति जानते हैं कि सरकारी नौकरियां अब नहीं हैं. इसके बावजूद वे अपने बेटे को कुछ और बनाने के लिए तैयार नहीं होते. 
जिस दौर से हम गुजर रहे हैं, जिस समाज में हम रह रहे हैं और जिस परिवार में हमारी परवरिश हो रही है उसमें अच्‍छा इंसान बनने पर कभी जोर नहीं दिया जाता. लोगों को लगता है कि यदि हम बच्‍चे को अच्‍छा इंसान बना देंगे तो वह करेगा क्‍या. वह इस बात को जरूरी नहीं समझते कि बच्‍चे को डॉक्‍टर, इंजीनियर बनाने के साथ एक अच्‍छा इंसान बनने की भी सीख दें. शायद उन्‍हें ऐसा लगता हो कि अच्‍छा इंसान बन जाएगा तो मरीजों और ठेकेदारों से पैसे नहीं ऐंठ पाएगा. क्‍योंकि अच्‍छे इंसान के पास सोचने-समझने की शक्ति होती है और वह अच्‍छे-बुरे की पहचान कर सकता है. उनकी नजर में अच्‍छे-बुरे की यही पहचान एक अच्‍छे इंसान को गलत काम करने से रोकता है. 
जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें हम अपने बच्‍चे को सिर्फ पढ़ाना चाहते हैं. वैसी पढ़ाई जिसमें उसे एक डिग्री मिल सके और उस डिग्री के बल पर वह अपने लिए एक अच्‍छी नौकरी खोज सके. जब डिग्री के आधार पर नौकरी नहीं मिलती है तब हम निराश हो जाते हैं. हताशा का भाव हमें गलत काम करने के लिए प्रेरित करता है. डिग्री होने के साथ-साथ हम यदि एक अच्‍छे इंसान भी होंगे तो हम कभी कोई गलत काम करने के लिए आगे नहीं बढ़ेंगे. हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी है, जिसमें ज्ञान के बदले डिग्री को प्राथमिकता दी जाती है. यह बोलने की बात नहीं है. जिस दिन से हम अपनी जिन्‍दगी में इस बात को अम्‍ल में लाने लगेंगे, उस दिन से जीवन और जीवन के प्रति हमारा नजरिया बदल जाएगा. 
 


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