पहले हम आस्तिक और नास्तिक होते थे. जो भगवान में आस्‍था रखते उन्‍हें आस्तिक कहा जाता है और वे जो भगवान में आस्‍था नहीं रखते , नास्तिक कहलाते हैं. जब से हमने इंसानों को भगवान का दर्जा देना शुरू कर दिया है तब से हम न तो आस्तिक रहे और न ही नास्तिक. हम भक्‍त बन गए हैं. हमने दिल से भक्ति शुरू कर दी है इसलिए दिमाग ने सोचना बंद कर दिया है. तब भी हम जब अपने इंसान रूपी भगवान के विषय में सोचना शुरू करते हैं तो हमारा दिल हमें धिक्‍कारने लगता है. यह सबसे खतरनाक स्थिति है. हम अपने विवेक को संतुलित रखते हुए विवेचना नहीं कर पाते हैं. यह भक्ति का ही प्रभाव होता है जब हम अपने किसी जानने वाले के खिलाफ भी उठ खड़े होते हैं. उसका विरोध करना शुरू कर देते हैं. आपसी रिश्‍तों का बिगड़ना किसी भी सभ्‍य समाज के लिए सबसे अधिक हानिकारक होता है. इतना अधिक हानिकारक होता है कि शब्‍दों से शुरू हुआ विवाद कब घृणा में बदल जाता है पता भी नहीं चलता. कई बार तो यह हिंसक रूप भी ले लेता है.

सबसे बड़ी समस्‍या तो तब शुरू होती है जब भक्‍तों में भी इस बात की होड़ लग जाती है कि सबसे बड़ा भक्‍त कौन है. अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा भक्‍त साबित करने के लिए तो कुछ लोग मर्यादा की सारी सीमाएँ लाँघ जाते हैं. इसका दुष्‍परिणाम यह होता है कि आप जिसकी भक्ति कर रहे होते हैं, उसकी छवि खराब होती है. हम एक अच्‍छे भक्‍त की छवि बनाने के चक्‍कर में अपने आदर्श पुरूष की छवि को मटियामेट कर देते हैं. भक्ति के प्रदर्शन से जिनका आप भला चाहते हैं उनका नुकसान अधिक होता है, फ़ायदा कम.

जब से केन्‍द्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी है भक्ति और भक्‍तों की वजह से समस्याएँ गंभीर होती जा रही हैं. गंभीर इस हद तक कि पता ही नहीं चलता कि लोग नेता की प्रशंसा कर रहे हैं या यह मान बैठे हैं कि भक्ति में कुछ भी बोल दो नेता के पास बुद्धि-विवेक तो होता नहीं, वह खुश ही होगा. भक्ति कहीं भारत के तारणहार से आरम्भ होती है और किसी एक की नाक की तुलना किसी और की नाक तक पहुँच जाती है. किसी एक को घेरने के लिए किसी दूसरे की भक्ति बहुत ज़रूरी होती है, वरना जिसकी भक्ति की जा रही होती है, उसी के घिर जाने का ख़तरा पैदा हो जाता है. भक्त निर्विकार-सा हो जाता है और उसे सामने खडा व्यक्ति कोई नेता नहीं, बल्कि स्वयं जगतनियंता और परवरदिगार जैसे लगने लगता है.

देश में हालत ऐसी अनबूझ पहेलियों जैसी हो गयी है कि अब भक्त परम्परा को पुनर्परिभाषित करना आवश्यक हो गया है. देश को यह जानने का हक़ तो होना ही चाहिए कि भक्त अपने नेता का गुणगान कर रहा है या उसकी कब्र खोद रहा है. क्योंकि जिसकी भक्ति की जा रही है उसके कन्धों पर देश का भार है. वही तो इस देश के लोकतंत्र का प्रहरी है. वह है तो संविधान है. वह नहीं, तो देश अनाथ है. ऐसे नेता की कब्र खुद गयी तो फिर लोकतंत्र, संविधान और देश, ये तीनों तो त्रिशंकु की तरह लटक जायेंगे. मेरा तो साफ़ मानना है कि भक्ति को कोरोनावायरस की तरह नहीं होना चाहिए, जिसका कोई निर्धारित लक्षण नहीं हो. भक्ति को गिरगिट की तरह भी नहीं होना चाहिए,  जिसका पल-पल रंग बदलता हो. भक्ति को पेट्रोल की तरह होना चाहिए. एकदम शंका से मुक्त. चिंगारी सटेगी तो ज्वाला उठेगी. भक्ति स्पष्ट हो तो नेता भी निश्चिन्त रहता है, अन्यथा उसे भक्तों की भक्ति समझने के लिए अलग से एक भक्त रखना पड़ता है. कभी-कभी तो भक्त प्रसाद का आनंद उठाता रहता है और नेता भक्तों के चक्कर में अपनी लुटिया डुबो लेता है. कीमत आम लोग चुकाते रहते हैं. अत समय आ गया है कि भक्तों की बढ़ती फ़ौज को देखते हुए सदन में मनोनीत सदस्यों में एक स्थान भक्त श्रेणी के लिए भी अरक्षित किया जाए, ताकि यह बड़े और छोटे भक्तों का भेद मिटे और एक समरस भक्त समाज का निर्माण हो सके.


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