किसी दूसरे के द्वारा खींची गई लकीर को यदि छोटा करना हो तो इसके दो उपाय है. एक या तो उसके नीचे या फिर उसके बगल में बड़ी लकीर खींच दें या फिर पहले से जो लकीर खींची गई है उसे रगड़ कर मिटा दें. अपने देश में हम दूसरे की लकीर को छोटा बनाने के लिए अपनी बड़ी लकीर नहीं नहीं खींचते हैं. हम दूसरे की लकीर को मिटाकर ही उसे छोटा बनाने के प्रयास में लगे रहते हैं. यह काम हम इतनी तल्‍लीनता से करने में जुटे रहते हैं कि हमें अपनी जिंदगी में या अपने व्‍यवासाय में नया कुछ कर पाने के लिए समय ही नहीं निकाल पाते हैं. क्योंकि हमारा सारा समय दूसरे के द्वारा किए गए कार्यों की आलोचना करना या उसे गलत ठहराने में व्यतीत हो जाता है.

इन दिनों चीन के ऐप का मामला काफी गंभीर है. हमारी सरकार ने चीन के 59 ऐप्‍स को बंद कर दिया है. बहुत अच्‍छी बात है. समस्या चीन के ऐप को बंद करना नहीं है, सवाल है कि बंद करने की नौबत क्यों आई. इस विषय में हम सोच नहीं रहे हैं. जिस दिन चीन ने ऐप्स लांच किए थे या फिर ऐप्स बनाने की घोषणा की थी, हमें भी उससे पहले नहीं तो कम से कम उस दिन इस दिशा में सोचना चाहिए था. हो सकता है हम अपने देशवासियों को चीनी ऐप्‍स की तुलना में किसी दूसरे ऐप्‍स का विकल्प उपलब्ध करवाते तो शायद वे चीनी ऐप्स की ओर आकर्षित नहीं होते. यही वजह है कि आज हम अपने आप को विकसित करने के बजाए हम चीन के ऐप्‍स को उड़ाने में लगे हैं.


कभी हमने यह सोचने की कोशिश की कि चीन के ऐप्स इतने लोकप्रिय क्यों हो जाते हैं. इसके दो कारण है एक तो हमारे देश में एक बहुत बड़ी आबादी के पास कोई काम नहीं है और वह इन एप्स के जरिए अपना मनोरंजन कर अपना दिन काट रही है. ऐसे लोगों के पास काम का ना होना किसी न किसी की गलती तो है ही. सवाल यह उठता है कि किसी समस्या के विकराल हो जाने के बाद ही हमारी नींद क्यों टूटती है. जिस दिन चीन के ये ऐप्स भारतीय नागरिकों के मोबाइल फोन के लिए उपलब्ध थे उसी दिन हम इससे होने वाली समस्या का आकलन क्यों नहीं कर सके. उस दिन इस समस्या की गंभीरता को हम क्यों नहीं समझ सके. इसके दो कारण हैं एक या तो हमें गंभीरता का पता नहीं था या फिर हम इसकी समस्या को या इससे उत्पन्न होने वाली समस्या को समझ नहीं पाए.
चीन हमारा दुश्‍मन है. दुश्‍मन से अच्‍छे गुण सीखने में परहेज नहीं करना चाहिए. हम चीन की बुराई करते हैं मगर उसकी अच्छाइयों की तरफ कभी ध्यान नहीं देते. विश्व में हमारी जनसंख्या का अनुपात 17.6 है जबकि चीन का  18.4 है. तकनीकी के विकास और विस्तार से वैश्विक उत्पादन में चीन का योगदान 28% है जबकि हमारा सिर्फ 3%. वर्ष 1986 में हमारी तुलना में चीन की प्रति व्यक्ति आय 15% और क्रय शक्ति आधार पर 20% कम थी. आज उसकी प्रति व्‍यक्ति आय हम से 5 गुना ज्यादा है. कभी हम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि हमसे थोड़ी ही से अधिक आबादी वाला चीज हमसे इतना आगे कैसे है. हम सिर्फ उसे नीचा दिखाने उसकी बुराई करने में लगे रहते हैं कभी असलियत जानने की कोशिश नहीं करते कभी सच्चाई समझने की कोशिश नहीं करते।

कभी हम यह सोचने का प्रयास करते हैं कि हम एक ऑद्योगिक देश क्‍यों नहीं बन पा रहे हैं. आखिर क्‍या कारण है कि इस देश में उद्योग फल-फूल नहीं पा रहे हैं. इसके लिए सिर्फ और सिर्फ कार्यपालिका जिम्‍मेदार है. हमारे यहां के नियम कानून इतने कठिन है कि उनका पालन करना मुश्किल ही नहीं असंभव हो जाता है. किसी नये उद्योग की स्‍थापना के लिए कितने दफ्तरों से अनुमति लेनी पड़ती है, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं है. यदि किसी को है भी तो वह कोई उद्योग‍पति नहीं बल्कि कार्यालयों के बाहर बैठे मध्‍यस्‍थ होते हैं. विश्व के दूसरे देशों में ऐसी स्थिति नहीं ही होगी, वहां उद्योग को बढ़ावा देने के हर संभव प्रयास किए जाते होंगे. अपने देश में मानव श्रम सस्ता है लेकिन दूसरे देशों के महंगे मानव श्रम की तुलना में काफी महंगा है. दूसरे देशों में एक मानव श्रम 8 घंटे में जितना उत्पादन करता है अपने देश में उतना उत्पादन करने के लिए तीन मानव श्रम की आवश्यकता पड़ती है.

 

संक्रमण का यह समय हमारे लिए समस्‍याओं के साथ नये अवसर भी लेकर आया है. यदि इस अवसर का लाभ उठाने में हम चूक गए तो यह देश हित में नहीं होगा. यही उचित समय है जब सरकार को उद्योग के प्रति लचीला रूख अपनाने की जरूरत है. यदि अब भी इस दिशा में नहीं शुरूआत की गई तो आने वाले दिन काफी मुश्किल भरे होंगे. अब वह समय आ गया है जब हमें कृषि प्रधान देश के साथ-साथ उद्योग प्रधान देश बनने की भी जरूरत है. मन की बात को धरातल पर क्रियान्वित करने का समय आ गया है.

 
 


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