आशुतोष राणा इशारे-इशारे में बहुत सी बातें कह जाते हैं. पिछले 20 वर्षों से उनके संपर्क में हूं. वे ज्ञानी हैं, स्‍वाभिमानी हैं. यह लिखने की भूल नहीं कर सकता कि मैं उन्‍हें जानता हूं. जब भी उनसे मिलता हूं उनके विषय में एक नई धारणा (सकारात्‍मक) मन में बनती है. उनकी बातें गूढ़ होती हैं. एक अर्थ के अनेक अर्थ निकलते हैं. यह आपके ऊपर है कि आप कितना समझते हैं. उनकी लिखी किताब ''मौन मुस्‍कान की मार'' मेरे टेबल पर रखी है. इस किताब के पृष्‍ठ संख्‍या 47 पर लिखा है-''बदलाव कोई ठेले पर बिकने वाली मूंगफली नहीं है कि अठन्‍नी दी और उठा लिया. बदलाव के लिए ऐसी तैसी करनी पड़ती है.'' 
बात तो सही है कि बदलाव कोई ठेले पर बिकने वाली मूंगफली नहीं है. छह साल पहले हमने सुनना शुरू किया था इस बदलाव के विषय में. अब भी उसी जोश के साथ सुन रहे हैं. उस समय देश बदल रहा था अब हिन्‍दुस्‍तां बदल रहा है. उस समय शुरू हुआ बदलाव अभी भी जारी है. न जाने कब तक जारी रहेगा. हम इस बदलाव की प्रक्रिया का हिस्‍सा बने हैं तो हम यह अपेक्षा भी रखते हैं कि इसके सुखद परिणाम हमें दिखने भी चाहिएं. कई बार तो ऐसा लगता है कि कहीं यह बदलाव बोलवचन का हिस्‍सा बनकर तो नहीं रह गया है. 
2016 में शुरू हुआ यह कैंपेन '' देखो आसमां से खिलकर सूरज निकल रहा है….देश का परचम अब ऊंचा उड़ रहा है….बरसों का अंधेरा अब रोशन हो रहा है….गरीब की रसोई से अब धुआं हट रहा है….मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश बदल रहा है. इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि गरीब की रसोई से धुंआ हट रह है. इसके अलावा कुछ नहीं हो रहा है. यह अतिश्‍योक्ति नहीं है मगर स्थिति ऐसी बन चुकी है कि हम कह सकते हैं, ''देश बदल रहा है, वादों पर जी रहा है.'' आप भी जानते हैं, हम भी जानते हैं और वादा करने वाले भी जानते हैं कि वादों और बदलाव की प्रक्रिया के क्रियान्‍वयन में जमीन आसमान का अंतर है. वादों और हकीकत के बीच एक बहुत बड़ी गहरी खाई है. इस खाई में झांकने की हिम्‍मत नहीं होती है. इतना सघन अंधेरा है कि देखने में डर लगता है. 
अंधेरी गहरी खाई में देखकर हम कहीं डर न जाएं इसलिए हमें वादों में मकड़जाल में फंसाकर रख जाता है ताकि हम आसमान में इंद्रधनुष को देखकर सपने देखते रहें. सपने दिखाने के लिए हम कतई वर्तमान सरकार को जिम्‍मेदार नहीं ठहरा सकते हैं. हमारा जन्‍म ही सपने देखने के लिए हुआ है. आजाद होने के अगले दिन से ही हमें सपने दिखाए जा रहे हैं और अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि हम खुली आंखों से सपने देखने लगे हैं. ऐसे सपने जो कभी सच नहीं हो सकते. ऊपर जिस कैंपेन का जिक्र किया गया है उसकी एक लाईन यह भी है, '' युवाओं के   हाथों से अब भारत संवर रहा है, गांव का सड़क अब शहर से जुड़ रहा है.'' किन युवाओं की हाथों में भारत संवर रहा है. पिछले छह वर्षों से कितने युवाओं को सरकारी अथवा अर्द्धसरकारी क्षेत्र में नौकरियां मिली हैं. नौकरी के विज्ञापन ही नहीं निकलते हैं, नौकरी कहां से मिलेंगी. अब तो सरकारी कंपनियां भी जिस तेजी के साथ निजी क्षेत्रों के हाथें में सौंपी जा रही है, रही सही आस भी खत्‍म हो रही है. कोराना के संक्रमण से पहले बेरोजगारों के पास स्‍वरोजगार (पकौड़ा तलने) का भी अवसर था. पिछले तीन महीनों में यह अवसर भी हाथ से फिसलता हुआ दिख रहा है. रोजगारहीन युवाओं के हाथों में भारत कैसे संवरेगा, यह बहुत बडा यक्ष प्रश्‍न है. 
सात साल पहले जिन सपनों को साकार करने के लिए सत्‍ता परिवर्तन की लहर चली थी. वे सपने हमारी आंखों में अभी भी जिन्‍दा हैं. हम उन सपनों को जिन्‍दा रखना चाहते हैं, उसे साकार होते देखना चाहते हैं. यह उनका दायित्‍व है कि वे इन सपनों को साकार करने की दिशा में सार्थक कदम उठाएं. बदलाव ठेले पर बिकने वाली मूंगफली नहीं है और आप उसे खरीद नहीं सकते. बदलाव के लिए काम करने पड़ते हैं. सिर्फ बोलवचन से बदलाव नहीं आता. यह आप भी समझते हैं और यह हम भी समझते हैं. 
बोलवचन को कर्म में बदलने का समय अभी भी बचा है. कोरोना के संक्रमण के बाद एक नई दुनिया का उदय होना है. कई पुरानी चीजें बेकार हो जाएंगी. जिसके उदय की कभी किसी ने कल्‍पना नहीं की थी उसका अभ्‍युदय हो सकता है. यहां उदय का तात्‍पर्य व्‍यवसाय और कार्यप्रणलियों से है. व्‍यावसायिक भाषा में हमें उत्‍पादन के साथ-साथ उपभोग पर भी ध्‍यान देना होगा. लाखों करोड़ रूपये मैन्‍युफैक्‍चरिंग सेक्‍टर के हवाले कर देने से कंज्‍प्‍शन नहीं बढ़ेगा. अर्थशास्‍त्र का मामूली सा सिद्धांत है कि मांग और आपूर्ति में संतुलन बना रहना चाहिए. 
कभी ध्‍यान दीजिए, सैकड़ों लोग जो हमारे-आपके आस-पास छोटे मोटे रोजगार कर अपना गुजर बसर कर रहे थे, आज दिखाई नहीं देते हैं. कहां चले गए हैं. कभी हम सोचते हैं उनके विषय में. कभी हमने यह जानने की कोशिश की है कि उनका दिन कैसे कट रहा है. हमें सपने देखने से फुर्सत ही नहीं है. हमें अपने देश को बदलते हुए देखने से फुर्सत नहीं है कि हम अपने आस-पास हो रहे इस बदलाव को नंगी आंखों से देख पाएं. वक्‍त कभी भी किसी का भी बदल सकता है. हमें वक्‍त के बदलने का इंतजार नहीं करना चाहिए. वक्‍त हमें बदल दे, उससे अच्‍छा तो यह है कि हम वक्‍त के साथ बदल जाएं. 


 


जानिए 2020 में कैसा रहेगा आपका भविष्य


खबर : चर्चा में


************************************************************************************

बॉलीवुड      कारोबार      दुनिया      खेल      इन्फो     राशिफल     मोबाइल

************************************************************************************


पलपलइंडिया का ऐनडरोएड मोबाइल एप्प डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे.

खबरे पढने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने, ट्विटर और गूगल+ पर फालो भी कर सकते है.



अन्य जानकारियां :

सुरुचि: इस पेज पर कुकिंग और रेसेपी के बारे में रोज़ जानिए कुछ नया

तनमन: इस पेज पर जाने सेहतमंद रहने के तरीके और जानकारियां

शैली: यह पेज देगा स्टाइल और ब्यूटीटिप्स सहित लाइफस्टाइल को नया टच

मंगलपरिणय: इस पेज पर मिलेगी विवाह से जुड़ी हर वो जानकारी जिसे आप जानना चाहेंगी

आधी दुनिया: यह पेज साझा करता है महिलाओं की जिन्दगी के हर छुए-अनछुए पहलुओं को

यात्रा: इस पेज पर जानें देश-विदेश के पर्यटन स्थलों को

वास्तुशास्त्र: यह पेज देगा खुशहाल जिन्दगी की बेहद आसान टिप्स