आप मानें या न मानें मगर पिछले पिछले सौ दिनों में यह दुनिया बिल्‍कुल बदल गई है. हमें इसका अंदाजा शायद इसलिए नहीं हो रहा है क्‍योंकि हम अपने घरों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं. हम वही जान रहे हैं जो हमारा मोबाईल बताता है या फिर टीवी दिखाता है. कुछ लोग हैं जो घरों से बाहर निकल रहे हैं और इस बदलती दुनिया के साक्षी बन रहे हैं. ऐसे कुछ लोगों को मैं भी जानता हूं जो अपने चेहरे पर रूमाल बांधे हुये मैदान में डटे हैं और उनसे जो कुछ भी संभव बन पा रहा है, कर रहे हैं. 
हम डरे हुए हैं, सहमें हुए हैं. इस डर की वजह से हमारी सोचने और समझने की क्षमता भी कुंद होती जा रही है. सौ दिन पहले हमारी गलियों की सड़कों पर कुछ बुजुर्ग पुरूष और महिलाएं गांव से सब्जियां और फूल लाकर बेचा करते थे. जब से हम घरों में बंद हो गए हैं, हमने इनके विषय में सोचना छोड़ दिया है. हमें परवाह ही नहीं है कि वे कहां और किस स्थिति में हैं. घनी बस्तियों में पीपल के पेड़ के नीचे एक पंडित जी बैठे रहा करते थे. हम में से अब कुछ ही लोगों को पता होगा कि वह पंडित जी कहां और किस हाल में हैं. यही स्थिति चौराहे पर बैठने वाले मोची और किसी दुकान के बाहर टेबल लगाकर कपड़े प्रेस करने वाले धोबी की भी है. हम अपने आप में सिमट गए हैं. दूसरों के विषय में सोचना छोड़ दिया है. अब हमें कोई तीसरा आकर बताता है कि 'वह' कैसा है और 'उसके' लिए वह क्‍या कर रहे हैं. 
हमारे समाज में कम से कम सौ लोग ऐसे होते हैं जो सिर्फ शादी विवाह के मौसम में काम करते हैं और इस पैसे से पूरे साल खाते हैं. इनमें बैंड बाजा वाला और सिर पर लाइट लेकर चलने वाले के साथ-साथ कुछ नचनिया भी होते हैं. इस साल इनको काम नहीं मिला. पैसे नहीं मिले. बाकी भगवान तो सबका मालिक है ही. कुछ काम हमको-आपको करने चाहिए तो कुछ दायित्‍व हमारे पालनहार का भी है. 
अब वह शहनाई बजाने वालों को ही ले लीजिये. बरात के स्वागत में बने गेट के मचान पर परदे के भीतर बैठे अपनी ही धुन में बजाते चले जाते थे. अबकी शादी के मौसम पर कोरोना के मौसम की मार ऐसी पड़ी कि इन्हें बुलाने से लोगों ने किनारा कर लिया. बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश के गाँवों में चले जाइए. वर और वधू दोनों के घर में विवाह के पहले होने वाले विभिन्न अनुष्ठानों में शहनाई की शक्ल का ही चमरुआ बाजा की धूम मची रहती थी. दलित समुदाय की एक विशेष जाति के दो, तीन, चार लोगों का समूह और पीं-पीं की आवाज में बजता हुआ चमरुआ बाजा. उसी से उनका पेट चलता है, उनका परिवार चलता है. एक सीजन की कमाई पूरे साल काम आती है. लेकिन इस बार किसी भी शादी में उनके दर्शन नहीं हुए. किसी को फ़िक्र नहीं, कहाँ हैं वो लोग, कैसे हैं वो लोग. उनके घर चले जाएँ तो किसी कोने में रखे और लटकाए गए उन वाद्य यंत्रों को देख कर आपको किसी उदास चेहरे की छवि दिख सकती है और कहीं संवेदना जाग गयी तो आप एक साहित्य भी रच दे सकते हैं. इसके अलावा मंडप में पंडित जी के मंत्रोच्चार के बीच  एक तरफ मंडली मैं बैठ कर गाली गाने वाली महिलाओं की टोली.  सांस्कृतिक परम्पराओं की विविधता से भरा हमारा देश और शादियों में गालियों की परम्परा ! कहीं कोई अपमान नहीं, कहीं कोई शान नहीं, मंद-मंद मुस्कान के साथ सुनते वर पक्ष के लोग, क्योंकि गालियाँ वर पक्ष के लिए ही होतीं हैं.  इस बार वह टोली भी गायब है. किसी को खबर नहीं, कहाँ है, किस हाल में है. खैर चलिए, यह तो शादी-ब्याह की बात है!
शहरों में सेल और शो लगते हैं. लेकिन गाँव में, छोटे-छोटे कस्बों में आज भी परम्परागत मेलों का प्रचालन बदस्तूर जारी है. हाटों का सिलसिला आज भी जस-का-तस जारी है. ऐसे मेलों में, ऐसे हाटों में तरह-तरह के करतब करने वाले लोग और उन्ही लोगों में कठघोड़वा का नाच करने वाले कलाकार. जिन्होंने नहीं देखा है, उनके लिए बताना ज़रूरी है कि लकड़ी का बना घोड़े के शरीर के आकार का ढांचा होता है. पीठ की ओर से उसमें एक गोल खुली जगह होती है. पीछे कपड़े या धागों से बनी पूँछ लटकती है. घोड़े की गर्दन और मुँह स्पष्ट दिखता है. लेकिन उसके पैर नहीं होते. उसकी धड़ की बनावट से पेट हिस्से से चारों तरफ रंग-बिरंगे छींट के कपड़ों की झालर जमीन तक लटकती रहती है. लकड़ी से बने होने के कारण इसे कठ (काष्ठ) घोड़वा कहते हैं. कठघोड़वा का नाच करने वाला आदमी पैरों में घूँघरू बांधे, सिर पर रंग-बिरंगे कपडे बांधे और एक हाथ में चाबुक लिए घोड़े के शरीर में लम्बवत घुसा रहता है और ठुमक-ठुमक कर नाचता है, काठ के बने घोड़े को इस प्रकार हिलाता-डुलाता है मानों सच में घोड़ा भी नाच रहा हो. कहीं यह कठघोड़वा पंहुचा नहीं कि हुआ शोर और पलक झपकते गाँव के घर-घर से और कोने-कोने से दौड़ कर आते हुए अधनंगे बच्चों का हुजूम, बड़ा अद्भुत नजारा होता है वह. इस बार वह सब गायब है. ऐसी सैकड़ों विधाएं हैं, हज़ारों कलाकार हैं. शहर से दूर, महानगरों से ओझल, कहीं सुदूर गाँवों में, जंगलों में गरीब परिवार के दलित-आदिवासी लोग ही अधिकांशतः इन विधाओं के साधक हैं, गुणी हैं, कलाकार हैं. ये फ़िल्मी गीत नहीं गाते. इनके गीतकार भी इन्ही के बीच से बमुश्किल साक्षर टाइप के लोग होते हैं. प्रेम के गीत, विरह के गीत, विवाह के गीत, ललकार के गीत, हुंकार के गीत, श्रम के परिहार के गीत, हास और परिहास के गीत, होली, प्रभाती, चैतावर, बिरहा, झिझिया..... क्या-क्या गिनाएं, कितना गिनायें. एक सदियों पुरानी परम्परा है, एक अनंत सिलसिला है, एक लम्बी कड़ी है. ऐसे लोग जलसों, मेलों, आयोजनों से अलग भी आपके शहर में कहीं किसी मैदान में, कहीं किसी सड़क के किनारे अपने-अपने संसाधनों-साधनों के साथ अपनी प्रतिभा बिखेरते नजर आ जायेंगे. 
आज, वे सभी अदृश्य हैं. और अदृश्य हैं उनकी परेशानियाँ. लॉकडाउन और कोरोना के खौफ ने न केवल उनके पैरों में बेड़ियाँ बाँध रखी हैं, बल्कि उनके जीवन में अभावों का अम्बार भी खडा कर दिया है. किसी-न-किसी को तो उनकी सुध लेनी पड़ेगी. भारत की विविध संस्कृतियों की परम्परा से जन्मी और नसों में समाई हुए कला की एक विशाल भण्डार को, अकूत संपदा को, असीम प्रतिभा को इस तरह उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता. 
 


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