हम कोई कहानी अथवा किताब क्‍यों पढ़ते हैं? पढ़कर यदि हम समझते हैं तो उस पर अमल क्‍यों नहीं करते हैं? हो सकता है कि इन दिनों मेरा दिमाग खराब हो गया हो. इसलिए शायद मैं बहकी-बहकी बातें सोचने लगा हूं. हर साल की तरह इस साल भी 31 जुलाई को हम प्रेमचंद जयंती मनाएंगे. उनकी कहानियों पर चर्चा करेंगे और शांत बैठ जाएंगे. हम उन कहानियों से कुछ सीखते क्‍यों नहीं हैं? यदि सीखना नहीं है तो फिर पढ़ना क्‍यों है? स्‍कूलों में परीक्षा पास करने के लिए पढ़ने की आवश्‍यकता तो समझ में आती है, मगर उसके बाद क्‍यों? यदि पढ़कर कुछ सीखना नहीं है तो फिर उस पर चर्चा करने की क्‍या जरूरत है? 
मैं यहां पर प्रेमचंद की दो कहानियों का जिक्र करना चाहता हूं. पहली है 'नमक का दरोगा' और दूसरी है 'बड़े घर की बेटी'. वैसे मुंशी प्रेमचंद जी की लिखी सभी कहानियों की अपनी प्रासंगिकता है. मैंने ऊपर जिन दो कहानियों का उल्‍लेख किया है यदि हम उन कहानियों को ठीक से पढ़े होते तो आज हमारे समाज की दशा दुर्दशा में नहीं बदल चुकी होती. नमक का दरोगा यदि हमें याद होता तो आज समाज में रिश्‍वत की महामारी नहीं फैली होती. कोढ़ में खाज की तरह यह समस्‍या हमें तिल तिल कर मार रही है. 
नमक का दरोगा समाज की यथार्थ स्थिति को उदघाटित करती हुई कहानी है. यह कहानी है एक ईमानदार और कर्तव्यपरायण व्यक्ति मुंशी वंशीधर की, जो समाज में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की मिशाल कायम करता है। इसके दूसरे पात्र हैं पंडित अलोपीदीन, दातागंज के सबसे अधिक अमीर और इज्जतदार व्यक्ति. राजनीति व प्रशासन में उनकी अच्छी पकड़ है, जिसकी बदौलत वो बेरोकटोक अवैध कारोबार करते है. अलोपीदिन ने धन के बल पर समाज के सभी वर्गों के व्यक्तियों को अपना गुलाम बना रखा है और वह पैसे कमाने के लिए नियम-विरुद्ध कार्य करता है. दरोगा मुंशी वंशीधर पण्डित अलोपीदीन की नमक की गाड़ियों को पकड़ लेता है, जिन्हें टैक्स की चोरी करते हुए कानपुर ले जाया जा रहा है. अलोपीदीन दरोगा वंशीधर को रिश्वत देकर बचने का प्रयास करते हैं, किन्तु उसके ईमान को डिगा नहीं पाते हैं. दरोगा वंशीधर जमादार को पंडित अलोपीदीन को हिरासत में लेने का हुक्म देता है. वो अलोपीदीन को अदालत में गुनाहगार के रूप में प्रस्तुत करते हैं. लेकिन बकील और प्रशासनिक आधिकारी उसे निर्दोष साबित कर देते हैं और वंशीधर को नौकरी से वेदखल कर दिया जाता है. कहानी आगे बढ़ती है बाद में पंडित अलोपीदीन, वंशीधर के घर जाकर माफी मांगता है और अपने कारोवार का स्थाई मैनेजर वना देता है तथा उसकी ईमानदारी और कर्तव्य-निष्ठा के आगे नतमस्तक हो जाता है. 
आज हमारे समाज में कितने बंशीधर हैं. जबकि पंडित अलोपीदिनों की संख्‍या दिन दूनी और रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ती जा रही है. 'न खाएंगे और न खाने देंगे' का नारा सुनकर लगा था कि आने वाले दिनों में हमारे समाज में अलोपीदिनों की संख्‍या कम होगी, मगर ऐसा हो न सका. हुआ वह, जो सोचा नहीं था. कम होने के बजाए अनगिनत नए अलोपीदिन पैदा हो गए. नमक का दरोगा में समाज पर एक करारा व्‍यंग्‍य भी है. जिन बंशीधरों को अलोपीदिनों की वजह से नौकरी गंवानी पड़ती है, उन्‍हें अपने भरण पोषण के लिए अंत में अलोपीदिन के यहां ही नौकरी करनी पड़ती है. चिंतन करने पर इसका एक दूसरा पहलू भी दिखाई देता है जिसमें यह समझ में आता है कि अलोपीदिन जैसे बेईमानों को अपने कारोबार को संभालने के लिए वंशीधर जैसे ईमानदार लोग ही चाहिए होते हैं. 
दरोगा वंशीधर जैसे ईमानदार लोगों का हमारे समाज में आज भी अभाव है और पण्डित अलोपीदीन जैसे रिश्वत देकर दो नम्बर के अवैध धंधे करने वालों की तो जैसे बाढ़ सी ही आई हुई है। मुंशी प्रेमचन्द जी की यह कहानी यूँ तो बहुत अच्छी है, किन्तु कहानी का अंत पाठकों को कुछ खटकता भी है। इस विस्तृत संसार में वंशीधर के लिए धैर्य अपना मित्र, बुध्दि अपनी पथप्रदर्शक और आत्मावलम्बन ही अपना सहायक था। आश्चर्य की बात है कि वो पण्डित अलोपीदीन जैसे बेईमान व्यक्ति का नौकर बनना कैसे स्वीकार कर लेता है? मुंशी प्रेमचन्द जी से कहीं भूल हुई या फिर ये कहानी हमारे समाज का एक यथार्थ बताती है कि एक ईमानदार दरोगा सरकारी नौकरी से निकाले जाने पर मजबूरन पण्डित अलोपीदीन जैसे बे‌ईमान आदमी के यहाँ नौकरी करना स्वीकार कर लेता है.
'बड़े घर की बेटी' बेनी माधव सिंह और उनके दो बेटों की कहानी है.  बेनीमाधव सिंह गौरीपुर गॉँव के जमींदार और नम्बरदार थे. उनके दो बेटे थे. बड़े का नाम श्रीकंठ सिंह था. उसने बहुत दिनों के परिश्रम के बाद बी.ए. की डिग्री प्राप्त की थी. अब एक दफ्तर में नौकर था. छोटा लड़का लाल-बिहारी सिंह दोहरे बदन का, सजीला जवान था. भरा हुआ मुखड़ा,चौड़ी छाती. भैंस का दो सेर ताजा दूध वह उठ कर सबेरे पी जाता था. श्रीकंठ सिंह की दशा बिलकुल विपरीत थी. 
आनंदी एक बड़े उच्च कुल की लड़की थी. उसके बाप भूपसिंह एक छोटी-सी रियासत के ताल्लुकेदार थे. सात बहनों में आनंदी उनकी चौथी लड़की थी. एक दिन भूप सिंह की मुलाकात श्रीकंठ से हो गई. लड़का उन्‍हें पसंद आया और श्रीकंठ सिंह का आनंदी के साथ ब्याह हो गया.
आनंदी अपने नये घर में आयी, तो यहॉँ का रंग-ढंग कुछ और ही देखा. जिस टीम-टाम की उसे बचपन से ही आदत पड़ी हुई थी, वह यहां नाम-मात्र को भी न थी. मकान में खिड़कियॉँ तक न थीं, न जमीन पर फर्श, न दीवार पर तस्वीरें. यह एक सीधा-सादा देहाती गृहस्थी का मकान था; किन्तु आनंदी ने थोड़े ही दिनों में अपने को इस नयी अवस्था के ऐसा अनुकूल बना लिया, मानों उसने विलास के सामान कभी देखे ही न थे.
एक दिन दोपहर में उसका देवर लालबिहारी सिंह दो चिड़िया लिये हुए आया और भावज से बोला - जल्दी से पका दो, मुझे भूख लगी है. आनंदी भोजन बनाकर उसकी राह देख रही थी. अब वह नया व्यंजन बनाने बैठी. हांड़ी में देखा, तो घी पाव-भर से अधिक न था. बड़े घर की बेटी, किफायत क्या जाने. उसने सब घी मांस में डाल दिया. लालबिहारी खाने बैठा, तो दाल में घी न था, बोला-दाल में घी क्यों नहीं छोड़ा?
आनंदी ने कहा–घी सब मॉँस में पड़ गया. लालबिहारी जोर से बोला–अभी परसों घी आया है. इतना जल्द उठ गया? इस छोटी सी बात का बतंगड़ बन गया. नौबत लाल बिहारी के घर छोड़ने तक पहुंच गई. 
मगर आनंदी ने ही स्थिति को संभाला और लाल बिहारी को घर से बाहर जाने से रोका. प्रेमचंद की आनंदी अब समाज से गायब क्‍यों हो गई है. आनंदी के न होने से ही आज वृद्धाश्रमों की भीड़ लगी है. जिन माताओं-पिताओं को घर में होना चाहिए वे वृद्धाश्रम में पड़े हैं. समाज को उन्‍नत बनाने के लिए, बच्‍चों को अच्छी परवरिश देने के लिए आनंदी जैसा किरदार हर घर में होना चाहिए. और आनंदी अपने ससुराल में ‘बड़े घर की बेटी’ की भूमिका आनंद और आत्मसम्मान के साथ निभा सके इसलिए लालबिहारियों के तेवर में सौम्यता लानी चाहिए.


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