लिखने वाला प्रत्‍येक व्‍यक्ति लेखक नहीं हो सकता, उसी प्रकार छपा हुआ कोई भी कागज आर्टिकल नहीं हो सकता. आर्टिकल लिखना यानि कि शब्दों का सही तरीके से इस्तेमाल करना है. इससे आप अपनी बातों को कम से कम शब्दों में और ज्यादा से ज्यादा जानकारी के साथ बयान कर सकें. बोलने और लिखने में फर्क यह है कि बोलते समय सुनने वाला व्यक्ति आपके सामने होता है और आप यह समझ सकते है कि वह आपकी बात को समझ भी रहा है या नहीं. या फिर आप जो कुछ भी कह रहे हैं वह उसके सिर के डुपर से गुजर रहा है. कहीं आपकी बातों को सुनते हुये उसे जम्‍हाईयां तो नहीं आ रही है. सुनने वाले की परिस्थिति को देखकर आप अपने बोलने की कला अथवा विषयवस्‍तु में परिवर्तन कर उसे दिलचस्‍प बना सकते हैं. लेकिन लिखे हुये के साथआप कुछ नहीं कर सकते. उसमें किसी भी प्रकार का बदलाव करना आपके हाथ में नहीं होता है.

लिखने से पहले आपको यह तय कर लेना चाहिए कि आप क्‍या लिखना चाह रहे हैं. समाचार, विचार, फीचर, व्‍यंग्‍य या फिर कुछ और. जिस किसी भी व्‍यक्ति को अक्षर ज्ञान है, उसे लगता है कि लिखना बहुत ही आसान काम है. जब आप लिखने बैठते हैं तब आपको असलियत का पता चलता है कि यह आसान नहीं बल्कि कितना कठिन कार्य है. उस समय हमें पता ही नहीं चलता कि कहां से शुरू करना है और कहां खत्‍म.

समाचार लिखना आसान काम है. इसमें आपको घटना का ब्‍योरा देना होता है. कई बार घटना आपकी आंखों के सामने घटती हैं तो कई बार किसी से जानकारी प्राप्‍त कर आप उस घटना के विषय में लिखते हैं. इस प्रकार के लेखन मे कौन, क्या, कहाँ, कब, क्यों और कैसे तथ्‍यों को ध्‍यान में रखा जाता है. समाचार लेखन में उन्‍होंने कहा, बताया, सूत्रों से पता चला है जैसे शब्‍दों का प्रयोग बहुत किया जाता है. जहां तथ्‍यों में संदेह हो उसे सूत्रों के हवाले से लिख दिया जाता है. जब आप विचार अथवा अभिमत लिख रहे होते हैं तब समाचार लेखन में प्रयोग होने वाले शब्‍दों का प्रयोग नहीं कर सकते. अभिमत आपके अपने होते हैं और आप पाठकों को उस पर सोचने व मनन करने के लिए अभिप्रेरित करते हैं.

लेखन, लेखन होता है. यह अच्‍छा या बुरा नहीं होता. इसका मानदंड रूचिकर और अरूचिकर होता है. यदि किसी लेखक का लिख हुआ कोई पाठक शुरू से अंत तक पढ़ जाए तो यह मान लेना चाहिए कि वह आलेख पठनीय है. पाठकों की अभिरूचि का विषय है. बदल रहे इस दौर में पाठकों के पास बड़े खबरिया आर्टिकल को पढ़ने का समय नहीं है. क्‍योंकि उसमें दी गई अधिकांश सूचनाएं पाठकों के पास पहले से है.

कुछ बातों का विशेष ध्‍यान रखा जाना चाहिए. किन्‍तु-परन्‍तु, चूंकि-इसलिए, अगर-मगर जैसे शब्‍दों का प्रयोग वैचारिक लेखन में कम से कम किया जाना चाहिए. दूसरी और सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि वाक्‍य छोटे लिखने चाहिएं. कोई माने या न माने छोटे वाक्‍य लिखना बहुत ही कठिन कार्य है. अपने देश में हिंदी के कुछ गिने-चुने ही पत्रकार हैं, जो छोटे वाक्‍य लिखते हैं. अंग्रेजी में छोटे वाक्‍य लिखने की परंपरा नहीं है. उस भाषा में बड़े-बड़े वाक्‍य, अधिक से अधिक कौमा और सेमी कॉलन का प्रयोग करने वाले बुद्धिमान माने जाते है. जब भी आप कॉमा और सेमी कॉलम का प्रयोग कर बड़े वाक्‍य लिखते हैं, पाठक दिग्‍भ्रमित होते हैं. छोटे वाक्‍य लिखिए, अच्‍छा लिखिए और अच्‍छे लेखक बनिए.


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