अस्‍त व्‍यस्‍त सा माहौल है. कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि हो क्‍या रहा है. सूरत से चली ट्रेन को सिवान पहुंचने में नौ दिन लग गए. रेलवे की पटरी सड़क नहीं है कि कोई रास्‍ता भटक जाएगा. रेल मंत्री से लेकर रेलवे बोर्ड के चेयरमैन तक ने कह दिया कि रूट बदलना रेलवे के लिए सामान्‍य बात है. यह सामान्‍य बात सुनने में बड़ा असामान्‍य सा लग रहा है. गाड़ी चलाने की रूट आपने तय की. आपने ही तय किया कि गाड़ी कहां-कहां रूकेगी. जब ये सारी चीजें तय कर रहा था  रेलवे प्रशासन उस समय उसे उस रूट की व्‍यस्‍तता का पता नहीं था. इस व्‍यस्‍तता का पता उसे तब चलता है जब गाड़ी अपने ओरिजिनेटिंग स्‍टेशन से गंतव्‍य स्‍टेशन के लिए निकल पड़ती है.

हम यह नहीं मान सकते कि कोई सरकार अपने देश के नागरिकों के साथ इस तरह का व्‍यवहार जानबूझकर कर कर सकती है. किसी न किसी की गल्‍ती से ही हुआ होगा और अब उस पर पर्दा डालने का काम चल रहा है. जब आप काम कर रहे होते हैं तब इस प्रकार की गल्तियां आप किसके साथ करते हैं. उनके साथ करते हैं जिनका आपके जीवन में  कोई महत्‍व नहीं होता है. रेल के डिब्‍बों में अपने गंतव्‍य स्‍टेशन पहुंचने की आस लगाए बैठे लोग, और रेल्‍वे स्‍टेशन पर गाड़ी के इंतजार में धक्‍के खाते लोग  किसी के काम के नहीं हैं. यदि ये काम के होते तो इनकी पूछ-परख भी होती. लिखने में बुरा लग रहा है और पढ़ते वक्‍त और भी बुरा लगेगा मगर सच्‍चाई यही है.

आखिर यह स्थिति क्‍यों है. क्‍योंकि वह वोट बैंक नहीं हैं. वह वोट हैं, वह मतदाता है, लेकिन वह वोट बैंक नहीं हैं. आप कल्‍पना कीजिए कि स्‍टेशनों पर खड़ी यह भीड़ यदि एक वर्ग विशेष की होती या एक जाति विशेष की होती, तब भी इनको ऐसे ही छोड़ दिया जाता. नहीं उस समय वोट बैंक की राजनीति शुरू हो जाती. उनकी खातीरदारी की जाती. खातिरदारी करते हुए फोटो खिंचवाए जाते.

वोट की परवाह किसी को नहीं होती. वोट बैंक की परवाह हर किसी को होती है. व्‍यक्ति विशेष का कोई महत्‍व नहीं है. जाति विशेष समूह या फिर वर्ग विशेष का महत्‍व होता है. क्‍योंकि वह वोट बैंक होता है. समूह का नेता तय करता है कि वोट किसे देना है और सभी उसके ईशारे पर चल पड़ते हैं. स्‍टेशनों पर धक्‍का खाने वाले इन सभी लोगों ने एक वोटर के रूप में अपनी पहचान बनाई होती, तो आज इन्‍हें इस तरह धक्‍का नहीं खाना पड़ता.

राजनीति से जुड़े लोग वोट और वोट बैंक के अंतर को अच्‍छी तरह समझते हैं. यही वजह है कि मुंबई में रहने वाला मजदूर चाहे वह किसी भी प्रदेश, किसी भी जाति का क्‍यों न हो, उसकी समस्‍याओं से किसी भी राजनीतिक दल का दिल नहीं पसीजा. प्रत्‍येक दल में उत्‍तर भारत के लिए अलग से इकाई है, लेकिन उन इकाईयों के प्रमुख लोग भी कहीं नजर नहीं आए. इन नेताओं की नजर में यदि यह भीड़ वोट बैंक होती तो स्‍टेशनों पर यात्रियों से ज्‍यादा राजनेताओं की भीड़ होती. इनके लिए खाने के पैकेट भी होते और पीने के लिए पानी भी होता. पार्किंग की जगह से इन्‍‍हें रेड कार्पेट पर चलाकर डिब्‍बों तक पहुंचाया जाता. क्‍योंकि अगली बार वोट जो लेना होता.

अब भी चेत जाना चाहिए. यह समझाना चाहिए कि बदलते दौर में वोट बैंक से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण वोट होता है. मगर गल्‍ती हम करते हैं तो सुधरना भी हमें ही पड़ेगा. अपनी अहमियत खुद बतानी पड़ेगी. वरना ऐसे ही धक्‍के खाते रहेंगे.

 


जानिए 2020 में कैसा रहेगा आपका भविष्य


खबर : चर्चा में


************************************************************************************

बॉलीवुड      कारोबार      दुनिया      खेल      इन्फो     राशिफल     मोबाइल

************************************************************************************


पलपलइंडिया का ऐनडरोएड मोबाइल एप्प डाउनलोड करने के लिए क्लिक करे.

खबरे पढने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने, ट्विटर और गूगल+ पर फालो भी कर सकते है.



अन्य जानकारियां :

सुरुचि: इस पेज पर कुकिंग और रेसेपी के बारे में रोज़ जानिए कुछ नया

तनमन: इस पेज पर जाने सेहतमंद रहने के तरीके और जानकारियां

शैली: यह पेज देगा स्टाइल और ब्यूटीटिप्स सहित लाइफस्टाइल को नया टच

मंगलपरिणय: इस पेज पर मिलेगी विवाह से जुड़ी हर वो जानकारी जिसे आप जानना चाहेंगी

आधी दुनिया: यह पेज साझा करता है महिलाओं की जिन्दगी के हर छुए-अनछुए पहलुओं को

यात्रा: इस पेज पर जानें देश-विदेश के पर्यटन स्थलों को

वास्तुशास्त्र: यह पेज देगा खुशहाल जिन्दगी की बेहद आसान टिप्स