इस भीषण गर्मी में राजनीति की भी लू चल रही है. देश में राष्ट्रपति पद का चुनाव होने वाला है. एनडीए ने राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार घोषित कर दिया है.
 एनडीए के उम्मीदवार घोषित करने के बाद सोशल मीडिया पर बहस का दौर शुरू हो गया. लालकृष्ण आडवाणी को एक बार फिर बीजेपी ने दरकिनार कर दिया है. आडवाणी जी से हमदर्दी रखने वाले अपना पूरा विरोध सोशल मीडिया पर जता रहे हैं. 
इस विरोध में बीजेपी कार्यकर्ता भी दो खेमें बटते नज़र आए हैं. बीजेपी सासंद शत्रुघन सिंहा ने आडवाणी को राष्ट्रपति के लिए बेहतर विकल्प बताया है. लालकृष्ण आडवाणी को राष्ट्रपति पद के लिए रेस में माना जा रहा था. 
आडवाणी का सपना पहले पीएम बनने का था, फिर देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति बनने का.  ये सिर्फ उनका ही नहीं बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ऐसा लग भी रहा था कि अगले राष्ट्रपति आडवानी ही हो सकते हैं.
 लेकिन रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाकर एनडीए ने आडवाणी समर्थकों के मंसूबे पर पानी फेर दिया. ऐसा लगता है कि अब बीजेपी के एक युग का अंत हो गया है. वो युग है अटल और आडवाणी का. एक समय था जब बीजेपी के लिए ये दोनों वरिष्ठ नेता परचम लहराया करते थे. कहते हैं होइए वही जो राम रच राखा. 
 इसमें कोई शक नही की बीजेपी को शिखर तक पहुंचाने में अटल और आडवाणी का बहुत योगदान है. अटल और आडवाणी के नेतृत्व में बीजेपी के बहुत से नेता आगे बढ़े हैं. बीजेपी के अधिकांश नेताओं के भविष्य सवांरने की बात करें तो आडवाणी ने एक गुरू की भूमिका निभाई है. इनमें से एक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भी है. 
गुजरात दंगों के बाद भी आडवाणी के कारण नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री पद बने रह सके थे. लेकिन ये राजनीति है इसमें हरपल कुछ न कुछ बदलता रहता है. वक्त भी क्या चीज है अपना कमाल दिखा ही देता है. 
1951 में जब जनसंघ की स्थापना  श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी ने की थी. उनके साथ बड़े नेताओं की भूमिका निभाने में प्रोफेसर बलराज मधोक भी थे. बलराज मधोक 1966 में भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष भी बने.  साथ ही साथ बीजेपी की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना भी उन्होने की थी.
 लाल कृष्ण आडवाणी के राजनीति में सक्रिय होने से पहले प्रो मधोक दक्षिणपंथी पार्टी जनसंघ के सबसे बड़े नेता माने जाते थे. 1973  कानपुर में जनसंघ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बलराज मधोक ने एक नोट पेश किया था. जिसमें आर्थिक नीति, बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर जनसंघ की विचारधारा के खिलाफ बातें कही थीं. इसके अलावा संगठन मंत्रियों को हटाकर जनसंघ की कार्यप्रणाली को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने की मांग भी की थी.  
उस समय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी थे. आडवाणी ने मधोक बातों से नाराज होकर उन्हें तीन साल के लिये पार्टी से बाहर कर दिया. इस घटना से बलराज मधोक इतने आहत हुए थे कि फिर कभी जनसंघ और बीजेपी में नहीं लौटे. मधोक जब जनसंघ के अध्यक्ष थे उस समय पार्टी कामयाबी के शीर्ष पर थी. 
 उस समय लोकसभा में जनसंघ गठबन्धन के पास 50 से ज्यादा सीटें थी कहने का तात्पर्य इतना है कि जैसा बोओगे, वैसा ही काटोगे. आज जब बीजेपी आडवाणी को दरकिनार कर रही है. आडवाणी जी को भी संन्यास ले लेना चाहिए. आखिर कब तक अपनी राजनीति की पारी खेलेगें. कभी प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीद, तो कभी राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीद का.  अब कोई मतलब नही रह गया है.
 हालांकि ये कहना गलत नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भाजपा का चेहरा माना जाता था पर पर्दे के पीछे आडवाणी ने भाजपा जैसी पार्टी को खड़ा करने का काम किया है. पर वो दौर कुछ और था. आज के इस दौर में बीजेपी के लिए जो चेहरा उभरा है वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है.
 लेकिन इसमें भी दो राव नहीं है कि आडवाणी को जैसे पूरा देश जानता है, वैसे रामनाथ कोविंद को नहीं जानता.  रामनाथ कोविंद बीजेपी के राज्यसभा सांसद और बिहार के राज्यपाल जरूर रह चुके हैं लेकिन आडवानी ने जिस तरह लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाई है उससे कोविंद कोसों दूर हैं. कोविंद एक कुशल नेतृत्व वाले अच्छे नेता हो सकते हैं.
 पर आडवानी की कुशल नेतृत्व क्षमता पर किसी को कोई शक नही है. देश की राजनीति में वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार करने वाली बात कोई आज की नई नहीं है. भारतीय राजनीति में ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जहां अगली पीढ़ी के नेताओं ने पार्टी या सरकार पर अधिकार पाने के लिए वरिष्ठ नेता को अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 
सोनिया गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी के कपड़े तक फाड़ दिए गए थे. नीतीश कुमार को सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाने वाले जॉर्ज फर्नांडिस की आज स्थिति क्या हुई, ये सभी जानते हैं. कांशीराम के साथ अंत में जो हुआ उससे भी देश वाकिफ है. ये तो पुरानी बातें है अभी हाल में कुछ महीनों पहले मुलायम सिंह का क्या हाल हुआ, इसे बताने की जरूरत नहीं होगी. ऐसे में वरिष्ठ नेताओं को अपमान सहने से अच्छा है कि राजनीति से संन्यास ले लें.

 


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