हिंदुस्तान हिंदी से है , हिन्द से है और जब हिन्द में ही हिंदी की दुर्दशा हो तो लगता है जैसे किसी देश की आत्मा ही नहीं है. देश को एकसूत्र में जोड़कर रखने वाली एक भाषा होती है जो देश का हरेक व्यक्ति जानता समझता है और संवाद के माध्यम से वो अपने देश में होने का अहसास पाता  है. हिंदी भारतीय भाषाओं में सबसे ज्यादा बोली-समझी जाने वाली भाषा है और ये कोई आज से नहीं है बल्कि संस्कृतनिष्ठ भारत के समय से इसका विकास निर्बाध गति से हुआ है. भारतीय इतिहास में देवनागरी लिपि को करीब दस हजार साल पहले का बताया गया है , इस लिपि के अनुसार भारत में ही कई भाषाओं का विकास हुआ जिसमें हिंदी सबसे बड़ी भाषा के रूप में रही.  देवनागरी लिपि को ही एक तरह से हिंदी का पर्याय माना जाने लगा था. समस्त भारतवर्ष में हिंदी का प्रचार-प्रसार अन्य भाषाओं से अधिक था और इसी वजह से इस भाषा को देश की एक राष्ट्रीय भाषा घोषित करने के लिए प्रयास भी होते रहे.  विडम्बना ये है कि आज तक देश की कोइ एक भाषा नहीं है जिसके मान-सम्मान में पूरी दुनिया उठ खड़ी हो.  हिंदी को जन जन की भाषा मानकर इसका प्रसार अवश्य पूरी दुनिया में हुआ और दुनिया यह भी मानती है कि भारत हिंदी भाषा का देश है , किन्तु एक तरफ जहां दुनिया ये मानती है , दूसरी तरफ भारत में भी इस भारतीय भाषा को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.  जैसे देश की आत्मा को ही मारा जा रहा है.  ये दुखद है.  बहरहाल, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही देश वासियों को ऐसा अनुभव हुआ कि देश का राजकाज को चलाने के लिए एक भाषा का होना आवश्यक है . ऐसे में ये प्रश्न उठा कि भाषायी  विविधता वाले इस देश में एक ऐसी भाषा कौन सी होगी जो देश को एकता के सूत्र में बंधे. चूंकि हिंदी सम्पर्क भाषा के रूप में भारतभर में युगो - युगो से रही है तभी तो राष्ट्रीय काॅग्रेंस की पहली महिला अध्यक्ष श्रीमती एनी बिसेन्ट ने कहा भी था  हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में मिल सकता है और भारत भर में यात्रा कर सकता है .  भारतीय भाषाओं में हिंदी ही सर्वाधिक विस्तृत क्षेत्र में बोली जाने वाली एवं सर्वत्र समझी जाने वाली भाषा है. हिंदी कई भाषाओं का मिश्रण है कहने का अभिप्राय यह है कि हिंदी ने अपनी सभी भाषाओं से कुछ न कुछ लिया है इसलिए आज यह इतनी समृद्ध बन पाई है. हिंदी हिंद की भाषा है . हिंदी को संपर्क भाषा ,राज भाषा का पद तो प्राप्त है परन्तु हमारे ही कुछ लोगों के कारण यह अभी तक राष्ट्र भाषा का गौरव नहीं प्राप्त कर पाई है .
 राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जी का ऐसा मानना था कि राष्ट्रभाषा के सारे गुण भारत की भाषाओ में केवल हिंदी में मिलते हैं. उन्होंने कहा था " अगर हिन्दुस्तान को सचमुच आगे बढ़ना है तो चाहे कोई माने या न माने राष्ट्रभाषा तो हिंदी ही बन सकती है क्योंकि जो स्थान हिंदी को प्राप्त है वह किसी और भाषा को नहीं मिल सकता.  " 14 सितंबर 1949 को भारत के संविधान में हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई. तब से हिंदी भाषा - भाषी प्रदेशों में ही राजकाज हिंदी में होता है तमिलनाडु , बंगाल , महाराष्ट्र ,या फिर आंध्र प्रदेश हो सबकी सरकारें अपनी- अपनी भाषा में कार्य करती हैं.
राजभाषा अधिनियम के द्वारा जब से अंग्रेजी को दृढ़ता से स्थापित कर दिया गया , तब से राजकर्मचारियों को यह विश्वास हो गया कि अंग्रेजी का भविष्य उज्जवल है. इसके बाद से ही अंग्रेजी भाषा के कुछ प्रबल समर्थको ने क्षेत्रीय भाषाओं की आड़ लेकर हिंदी का पूरी तरह से विरोध किया है. हमारे ही देश में कुछ राज्यों में राजनीतिज्ञो ने हिंदी विरोध को चुनाव का मुद्दा बना रखा है.इन लोगों का ऐसा मानना है कि देशी भाषाओं को अपनाने से भारत के टुकड़े - टुकड़े हो जाएंगे. ऐसे लोगों द्वारा ही समय-समय पर हिंदी का विरोध होता रहा है. आज जब हिंदी विश्व में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली और समझ जाने वाली भाषा बन गई है तब इस तरह की मानसिकता रखने वालों के द्वारा इसे तोड़ कर कमजोर करने की साज़िश की जा रही है. ये लोग इस बात को भली-भांति जानते हैं कि यदि हिंदी का संयुक्त परिवार टूटता है तो इसका सीधा फायदा अंग्रेजी को ही होगा.
पर यहां मैं एक बात इन लोगों से कहना चाहूंगी कि भाषाएं हमेशा लोगों को जोड़ती है . लोगों में भाषा को लेकर विवाद पैदा कर राजनीति करना तो राजनेताओं का काम है.
हमारे देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री पी .वी  नरसिम्हा राव जो कि एक जाने माने अर्थशास्त्री तो थे ही साथ में उन्हें विभिन्न बोलियों का भी ज्ञान प्राप्त था. वे दक्षिण के होते हुए भी अपना भाषण जादा तर हिंदी में देते  थे . उनकी इतनी लोकप्रियता का कारण कहीं न कहीं हिंदी ही रही है.अब सोनिया गांधी जी को ही ले लीजिए उन्हे भी जब ऐसा लगा कि अगर भारत में जन जन से संपर्क रखना है  तो हिंदी का ज्ञान  होना जरूरी है इसलिए उन्होंने हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया.
हिंदी का विरोध करने वालों में नौकरशाही व्यवस्था के वे लोग आते हैं जिन्होंने केवल अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त किया है. ये लोग इस भाषा के कट्टर पक्षधर रहते हुए दूसरे जो हिंदी बोलते हैं उन्हें हतोत्साहित करते . आजादी के इतने शाल बाद भी हम अंग्रेजी भाषा के गुलाम हैं. कई जगहों पर हम हिंदी में बात करने में हिचकिचाते हैं और अंग्रेजी में बात करके शायद शिक्षित होने का प्रमाण देना चाहते हैं.
रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ऐसे ही लोगों को लक्ष्य कर के कहा था कि  हमने अपनी आंखें खोलकर चश्में लगा लिए है
 इन सब को देखते हुए आज के समय यह जरूरी हो गया है कि अभिभावक अपने बच्चों को हिंदी भाषा से प्रेम करना सिखाएं और सरकार की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि वे सभी प्राथमिक विद्यालयों में हिंदी विषय को अनिवार्य बनाएं.
हमारे संविधान में देश की सभी भाषाओं को सम्मान प्राप्त है . तभी तो हर राज्य को अपनी भाषा बनाऐ रखने का अधिकार है. यदि हिंदी राष्ट्रभाषा बनती है तो दुसरी भाषा का महत्व खत्म हो जाएगा ऐसा नहीं है हमारे देश में कितने ही सुन्दर पक्षी है पर राष्ट्रीय पक्षी तो मोर ही है इससे हमारे देश के अन्य पक्षीयो का महत्व तो खत्म नहीं होता और न ही हम उन्हे अराष्ट्रीय पक्षी  कहेंगे.उसी तरह राष्ट्रीय पशु चीता के होने से क्या अन्य पशुओं की महत्ता कम हुई है नही न . एक लोकप्रिय नायक के ऊपर जब काले हिरण का शिकार करने का आरोपी लगा तो उसे भी अदालतों के चक्कर लगाने पड़े.
 हमारे देश के ही साथ लंका , बर्मा और पाकिस्तान में स्वतंत्र सत्ता की स्थापना हुई पर आज इन सबके पास अपनी राष्ट्रभाषा है पर हम आज भी भाषा के नाम पर राजनीति कर रहे हैं . ये अलग बात है कि लोकप्रियता और व्यापकता के कारण हिंदी राष्ट्र भाषा का गौरव प्राप्त करती है और कई जगहों पर राजभाषा को राष्ट्र भाषा के रूप में पुकारा भी जाता है परन्तु इन दोनों में प्रर्याप्त अंतर है . राजभाषा ( राज्य की भाषा ) है और राष्ट्र भाषा ( जन भाषा ) है
मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी के प्रो . डॉ. करुणा शंकर उपाध्याय के अनुसार विश्व में जिन तीस देशों की प्रतिव्यक्ति आय सर्वाधिक है उनमें से केवल चार देशों की भाषा अंग्रेजी है , हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि विश्व के जिन देशों ने विकास किया है उन सबने अपनी भाषा में विकास किया है. अफ्रीकी देशों के पिछड़े पन का कारण विदेशी भाषाएं भी है . 
हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसमें हमारे देश के हर भाषा के साहित्यकारो ने साहित्य लिखा जैसे प्रभाकर माचवे , मुक्तिबोध , यशपाल  उपेन्द्र नाथ अश्क  आदि इन लोगों की बजह  से ही आज हिंदी इतनी समृद्ध हो सकी है. वंदे मातरम् के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी ने कहा था   हिंदी एक दिन भारत की राष्ट्र भाषा होकर रहेगी
पर वो दिन कब आएगा ..?
आज हम अपनी आजादी के 71 वां वर्षगांठ मना चुके हैं फिर भी हम अपने राष्ट्र को एक राष्ट्र भाषा देने में नाकाम रहे हैं. वो दिन कब आएगा जब हमारे पास भी हमारी राष्ट्रभाषा होगी जो हम बहुभाषीयो को भाषा के द्वारा एकता के सूत्र में पिरोएगी .
जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने और सुषमा स्वराज विदेश मंत्री बनीं तब सबको ऐसा लगा कि इन लोगों को हिंदी से प्रेम है ये लोग या इनकी सरकार हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए कुछ न कुछ काम अवश्य करेगी . कई बार हिंदी के बुद्धिजीवी  इनके पास अपनी फरीयाद ले कर पहुंचे भी है और गुहार भी लगाई है की वो हिंदी को हमारे देश की राष्ट्रभाषा के साथ संयुक्त राष्ट्र की औपचारिक भाषा का दर्जा प्रदान करे . पर अभी तक इस ओर कोई काम नहीं हुआ . इन लोगों की सरकार बने 4 वर्ष पूर्ण हो गए हैं. फिर भी सभी हिंदी प्रेमी ये उम्मीद लगाए बैठे हैं कि शायद जाते जाते ही ये सरकार हिंदी के लिए कुछ काम कर जाए.


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