महाराष्ट्र में सत्ता के समीकरण जमाने और बिगाड़ने में शरद पवार का कोई सानी नहीं है. इस खेल में उन्होंने बड़े -बड़े दिग्गजों को किनारे लगाया है और इसी का परिचय इस बार भी दिया.  विधानसभा चुनावों में अपने भाषणों में पवार कहते थे अभी मैं बूढा नहीं हुआ हूँ ,कुछ लोगों को अब भी सत्ता से बाहर घर बिठाने का मादा रखता हूँ.  उस समय उनके विरोधी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेता भले ही उनकी बातों को हलके में ले रहे थे लेकिन प्रदेश में चुनाव परिणाम के बाद बीस दिन तक चला सत्ता बनाने के इस संग्राम को देखें तो हर सूत्र शरद पवार से जुड़ा ही नजर आया. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनके सहयोगी भले ही चुनाव प्रचार में यह कहते रहे की शरद पवार की राजनीति अब ख़त्म हो गयी ,उनका समय ख़त्म हो गया लेकिन पवार के वार ने उन्हें सबसे बड़ा दल होने के बाद भी सत्ता की कुर्सी पर नहीं बैठने दिया. महाराष्ट्र में विभिन्न पार्श्वभूमि और विचारधाराओं की पार्टियों को एक साथ लेकर सरकार बनाने का अनुभव पवार का अच्छा ख़ासा है और इसकी शुरुवात उन्होंने 1978 में की और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले प्रदेश के सबसे युवा नेता बने ,उनका यह रेकॉर्ड आज भी कायम है. शरद पवार पर अपने ही राजनीतिक गुरु वसंत दादा पाटिल की सरकार गिराने और उनके साथ विश्वासघात करने का आरोप लगता रहा है. यह कहानी 80 के दशक की है और महारष्ट्र की राजनीति का जो चित्र आज दिख रहा है दोनों में काफी कुछ समानता है. 1975 में तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लगाए जाने के बाद उनका कांग्रेस में भी विरोध बढ़ने लगा था और परिणाम कांग्रेस में टूट हुआ. यशवंतराव चव्हाण और ब्रम्हानंद रेड्डी ने इंदिरा गांधी के खिलाफ बगावत कर रेड्डी कांग्रेस की स्थापना की. वसंतदादा पाटिल और शरद पवार ने यशवंतराव चव्हाण का साथ दिया और रेड्डी कांग्रेस में शामिल हो गए.  महाराष्ट्र में कांग्रेस की कमान नासिकराव तिरपुडें को मिल गयी जो इंदिरा गांधी के समर्थक थे. 1978 का विधानसभा चुनाव हुआ और महाराष्ट्र में जनता पार्टी ,इंदिरा कांग्रेस और रेड्डी कांग्रेस ने अलग -अलग चुनाव लड़ा. जनता पार्टी को 99,इंदिरा काँग्रेस को  62, और  रेड्डी काँग्रेस को  69 सीटों पर विजय मिली. शेतकरी कामगार पक्ष को  13, माकपा को  9 और 36 सीटों पर निर्दलीय जीतकर आये. यानी किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला  था . महाराष्ट्र में  जनता पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिए रणनीति बनने लगी थी.  इस सिलसिले में रेड्डी काँग्रेस के वसंतदादा पाटिल ने  दिल्ली जाकर  यशवंतराव चव्हाण, ब्रह्मानंद रेड्डी, चंद्रशेखर से चर्चाएं की और उनके साथ इंदिरा गांधी से चर्चा की.  चर्चा का मुख्य बिंदु यही था महाराष्ट्र की सत्ता से जनता पार्टी को दूर रखना.  इंदिराजी ने उस पर अपनी सहमति दे दी और प्रदेश का सबसे बड़ा दल जनता पार्टी ज्यादा सीटें जीतकर भी सत्ता से बाहर हो गया. वसंतदादा पाटिल मुख्यमंत्री बने और शरद पवार उद्योग मंत्री.  लेकिन नासिकराव तिरपुडें को लगातार सत्ता में रहते हुए भी वसंतदादा पाटिल की आलोचना करते थे. तिरपुंडे उप मुख्यमंत्री थे लिहाजा वे बार बार यह करके अपना वर्चस्व दिखाना चाहते थे. ऐसी परिस्थितियों में करीब चार माह बाद ही "1978 के जुलाई महीने में विधानसभा का मानसून अधिवेशन शुरू हुआ शरद पवार ने अपना दांव चल दिया. वे 40 विधायक लेकर सरकार से बाहर हो गए. उनके साथ सुशील कुमार शिंदे, सुंदरराव सोळंके और दत्ता मेघे जैसे मंत्रियों ने भी इस्तीफ़ा देकर सरकार छोड़ दी.  वसंतदादा पाटिल की सरकार गिर गयी और पवार जनता पार्टी को साथ लेकर पहली बार मुख्यमंत्री बने.  उन्होंने जो गठबंधन बनाया था वह पुलोद ( पुरोगामी लोकशाही दल ) यानी प्रगतिशील डेमोक्रेटिक दल का नाम दिया.  महाराष्ट्र में यह पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी और वह भी शरद पवार के नेतृत्व में. वसंतदादा का साथ छोड़ने के बाद पवार ने समाजवादी कांग्रेस नामक पार्टी की स्थापना की थी.  बताया जाता है कि पवार ने इस खेल में यशवंतराव चव्हाण को भी भरोसे में लिया था और उनकी के पार्टी के मुख्यमंत्री की सरकार गिरा दी थी. शरद पवार की यह सरकार पौने दो साल तक ही चली.  केंद्र में जनता पार्टी की सरकार गिराकर इंदिरा गांधी जब पूर्ण बहुमत के साथ फिर से सत्तासीन हुई तो उन्होंने महाराष्ट्र सरकार को भंग कर दिया था.  इसके लिए उन्होंने ना सिर्फ जनता पार्टी में तोड़ फोड़ की अपितु शरद पवार के विधायकों को भी तोड़ दिया.  इस बार विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता पार्टी ने एनसीपी के दर्जनों विधायकों को तोड़कर अपनी पार्टी में शामिल कर लिया था तो पवार ने सार्वजनिक  बात का उदाहरण दिया था.  उन्होंने कहा था कि एक बार उनके 60 विधायक थे और 54 ने उनका साथ छोड़ दिया था लेकिन अगले चुनाव में वे फिर से 60 विधायकों को चुनवाने में सफल हुए थे.  पवार ने इस कहा था इस बार भी वे वही इतिहास दोहराएंगे.  उन्होंने कहा था कि कई लोगों को घर बिठाना है.  पवार ने उम्र के इस पड़ाव में कुछ वैसा ही इस  चुनाव में कर दिखाया है.  पिछले 20 दिनों  से महाराष्ट्र में जो सत्ता संघर्ष चल रहा है उसका यह परिणाम लाने में शरद पवार की भूमिका महत्वपूर्ण रही. जिस तरह से उन्होंने कांग्रेस और शिवसेना को करीब लाकर एक नया समीकरण बनाया है यह उसी घटना को याद दिलाता है जब जनता पार्टी को रोकने के लिए इंदिरा कांग्रेस और रेड्डी कांग्रेस का मेल हुआ था.


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