अलीगढ़ से भोपाल तक हमारी बेटियों पर दरिंदों की बुरी नजर है. आखिर हमारी बेटियां कहां जाएं जाएं ? इस बेरहम दुनिया में उनका जीना मुश्किल है. “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता” (जहां नारियों की पूजा होती है देवता वहां निवास करते हैं)का मंत्रजाप  करने वाले देश में क्या बच्चियां और स्त्रियां इतनी असुरक्षित हो गयी हैं कि उनका चलना कठिन है. शहर-दर-शहर उन पर हो रहे हमले और शैतानी हरकतें बताती हैं कि हमारा अपनी जड़ों से नाता टूट गया है. अपने को साबित करने के लिए निकली औरत के खिलाफ शैतानी ताकतें लगी हैं. वे उन्हें फिर उन्हीं कठघरों में बंद कर देना चाहती हैं, जिन्हें सालों बाद तोड़कर वे निकली हैं. हालात यह हैं कि अभिभावक भयभीत हैं और समाज में इसे लेकर गहरी चिंताएं व्याप्त हैं.

     एक लोकतंत्र में होते हुए बच्चियों और स्त्रियों के खिलाफ हो रहे जधन्य अपराधों की खबरें हमें शर्मिन्दा करती हैं. ये बताती हैं कि अभी हमें सभ्य होना सीखना है. घरों की चाहरदीवारी से बाहर निकली बेटियां सुरक्षित घर आ जाएं, ऐसा समाज हम कब बना पाएंगें? जाहिर तौर पर इसका विकास और उन्नति से कोई लेना-देना नहीं है. इस विषय पर घटिया राजनीति हो रही है पर यह राजनीति का विषय भी नहीं है. पुलिस और कानून का भी नहीं. यह विषय तो समाज का है. समाज के मन में चल रही व्यथा का है. हमने ऐसा समाज क्यों बनने दिया जिसमें कोई स्त्री,कोई बच्चा, कोई बच्ची सुरक्षित नहीं है? क्यों हमारे घरों से लेकर शहरों और गांवों तक उनकी व्यथा एक है? वे आज हमसे पूछ रही हैं कि आखिर वे कहां जाएं. स्त्री होना दुख है. यह समय इसे सच साबित कर रहा है. जबकि इस दौर में स्त्री ने अपनी सार्मथ्य के झंडे गाड़े हैं. अपनी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता से स्वयं को इस कठिन समय में स्थापित किया है. एक तरफ ये शक्तिमान स्त्रियों का समय है तो दूसरी ओर ये शोषित-पीड़ित स्त्रियों का भी समय है. इसमें औरत के खिलाफ हो रहे अपराध निरंतर और वीभत्स होते जा रहे हैं. इसमें समाज की भूमिका प्रतिरोध की है. वह कर भी रहा है, किंतु इसका असर गायब दिखता है. कानून हार मान चुके हैं और पुलिस का भय किसी को नहीं हैं. अपराधी अपनी कर रहे हैं और उन्हें नियंत्रित करने वाले हाथ खुद को अक्षम पा रहे हैं. कड़े कानून आखिर क्या कर सकते हैं, यह भी इससे पता चलता है. अपराधी बेखौफ हैं और अनियंत्रित भी. स्त्रियों के खिलाफ ये अपराध क्या अचानक बढ़े हैं या मीडिया कवरेज इन्हें कुछ ज्यादा मिल रहा है.

     हमारा पूरा समाज कठघरे में खड़ा है. स्त्री को गुलाम और दास समझने की मानसिकता भी इसमें जुडी है. पुरूष, स्त्री को जीतना चाहता है. वह इसे अपने पक्ष में एक ट्राफी की तरह इस्तेमाल करना चाहता है. यह मानसिकता कहां से आती है ?हमारे घर-परिवार, नाते-रिश्ते भी सुरक्षित नहीं रहे. छोटे बच्चों और शिशुओं के खिलाफ हो रहे अपराध और उनके खिलाफ होती हिंसा हमें यही बताती है. इसकी जड़ें हमें अपने परिवारों में तलाशनी होंगीं. अपने परिवारों से ही इसकी शुरूआत करनी होगी, जहां स्त्री को आदर देने का वातावरण बनाना होगा. परिवारों में ही बच्चों में शुरू से ऐसे संस्कार भरने होंगें जहां स्त्री की तरफ देखने का नजरिया बदलना होगा. बेटे-बेटी में भेद करती कहानियां आज भी हमारे समाज में गूंजती हैं. ये बातें साबित करती हैं और स्थापित करती हैं कि बेटा कुछ खास है. इससे एक नकारात्मक भावना का विकास होता है. इस सोच से समूचा भारतीय समाज ग्रस्त है ऐसा नहीं है, किंतु कुछ उदाहरण भी वातावरण बिगाड़ने का काम करते हैं. आज की औरत का सपना आगे बढ़ने और अपने सपनों को सच करने का है. वह पुरूष सत्ता को चुनौती देती हुयी दिखती है. किंतु सही मायने में वह पूरक बन रही है. समाज को अपना योगदान दे रही है. किंतु उसके इस योगदान ने उसे निशाने पर ले लिया है. उसकी शुचिता के अपहरण के प्रयास चौतरफा दिखते हैं. फिल्म, टीवी, विज्ञापन और मीडिया माध्यमों से जो स्त्री प्रक्षेपित की जा रही है, वह यह नहीं है. उसे बाजार लुभा रहा है. बाजार चाहता है कि औरत उसे चलाने वाली शक्ति बने, उसे गति देने वाली ताकत बने. इसलिए बाजार ने एक नई औरत बाजार में उतार दी है. जिसे देखकर समाज भौचक है. इस औरत ने फिल्मों,विज्ञापनों, मीडिया में जो और जैसी जगह घेरी है उसने समूचे भारतीय समाज को, उसकी बनी-बनाई सोच को हिलाकर रख दिया है. बावजूद इसके हमें रास्ता निकालना होगा.

  औरत को गरिमा और मान देने के लिए मानसिकता में परिवर्तन करने की जरूरत है. हमारी शिक्षा में, हमारे जीवन में, हमारी वाणी में, हमारे गान में स्त्री का सौंदर्य, उसकी ताकत मुखर हो. हमें उसे अश्लीलता तक ले जाने की जरूरत कहां है. भारत जैसे देश में नारी अपनी शक्ति, सौंदर्य और श्रद्धा से एक विशेष स्थान रखती है. हमारी संस्कृति में सभी प्रमुख विधाओं की अधिष्ठाता देवियां ही हैं. लक्ष्मी- धन की देवी, सरस्वती –विद्या की, अन्नपूर्णाः खाद्यान्न की, दुर्गा- शक्ति यानि रक्षा की. यह पौराणिक कथाएं भी हैं तो भी हमें सिखाती हैं. बताती हैं कि हमें देवियों के साथ क्या व्यवहार करना है. देवियों को पूजता समाज, उनके मंदिरों में श्रद्धा से झूमता समाज, त्यौहारों पर कन्याओं का पूजन करता समाज, इतना असहिष्णु कैसे हो सकता है, यह एक बड़ा सवाल है. पौराणिक पाठ हमें कुछ और बताते हैं, आधुनिकता का प्रवाह हमें कुछ और बताता है. हालात यहां तक बिगड़ गए हैं हम खून के रिश्तों को भी भूल रहे हैं. कोई भी समाज आधुनिकता के साथ अग्रणी होता है किंतु विकृतियों के साथ नहीं. हमें आधुनिकता को स्वीकारते हुए विकृतियों का त्याग करना होगा. ये विकृतियां मानसिक भी हैं और वैचारिक भी. हमें एक ऐसे समाज की रचना की ओर बढ़ना होगा,जहां हर बच्चा सहअस्तित्व की भावना के साथ विकसित हो. उसे अपने साथ वाले के प्रति संवेदना हो, उसके प्रति सम्मान हो और रिश्तों की गहरी समझ हो. सतत संवाद, अभ्यास और शिक्षण संस्थाओं में काम करने वाले लोगों की यह विशेष जिम्मेदारी है. समस्या यह है कि शिक्षक तो हार ही रहे हैं, माता-पिता भी संततियों के आगे समर्पण कर चुके हैं. वे सब मिलकर या तो सिखा नहीं पा रहे हैं या वह ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है. जब उसका शिक्षक ही कक्षा में उपस्थित छात्र तक नहीं पहुंच पा रहा है तो संकट  और गहरा हो जाता है. हमारे आसपास के संकट यही बताते हैं कि शिक्षा और परिवार दोनों ने इस समय में अपनी उपादेयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं. स्त्रियों के खिलाफ इतना निरंतर और व्यापक होता अपराध, उनका घटता सम्मान हमें कई तरह से प्रश्नांकित कर रहा है. यहां बात प्रदेश, जिले और गांव की नहीं है, यही आज भारत का चेहरा है. सारे देश से मिल रहीं  एक जैसी सूचनाएं व्यथित करती हैं. राजनेताओं के बोल दंश दे रहे हैं और हम भारतवासी सिर झुकाए सब सुनने और झेलने के लिए विवश हैं. अपने समाज और अपने लोगों पर कभी स्त्री को भरोसा था, वह भरोसा दरका नहीं है, टूट चुका है. किंतु वह कहां जाए किससे कहे. इस मीडिया समय में वह एक खबर से ज्यादा कहां है. एक खबर के बाद दूसरी खबर और उसके बाद तीसरी. इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा, कहना कठिन है. किंतु एक जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है. वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता, जो हमेशा अंतहीन और प्रायः निष्कर्षहीन ही होती हैं. अपनी बेटियों और स्त्रियों की सुरक्षा के सवाल पर भी हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरूआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी.


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