मेरे प्रिय नवयुवक साथियों,
मुझे पता है कि वर्तमान हालात को उजागर करते मेरे इस खत को पढ़कर आप या तो इस पर गौर नहीं करेंगे या इसको पूर्णत: निरर्थक समझेंगे. हाँ, यह भी हो सकता है कि आप मेरे विचारों को पढ़कर मुझे बुरा भला कहें, पुराने खयालातो वाली लेखिका कहकर इस चिंतनीय मुद्दे को सिरे से ख़ारिज कर दें, खैर यह कहने का तो आपका हक भी बनता है, स्वतंत्र होकर कहिए. जब आप इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंगे, मेरी आलोचना होगी, इस पर चिंतन होगा, तभी इसका कुछ सार्थक परिणाम भी निकलेगा. भविष्य आपका है, सार्थक, निरर्थक का विचार आपको ही करना होगा. एक राष्ट्र चिंतक और टमटमिया (छोटी) लेखिका होने के नाते यह मेरा फ़र्ज बनता है कि मै दूरदृष्टि से वर्तमान हालात पर अपने विचार रखते हुए कलम की अस्मिता को जीवित रखूँ.

ध्यातव्य है कि दुनियाँ में बढ़ रही काल्पनिक वैचारिक भीड़ बेहद खतरनाक एवं चिंतनीय है. काल्पनिक इस लिए कह रही हूँ कि इस भीड़ के पीछे सोशल मीड़िया को हथियार बनाकर कुछ छद्म मान्सिकता वाले लोगों की हमारे नव स्वर्णिम समाज को दिशाहीन करने की एक सोची-समझी साजिश है. आज की आपाधापी भरी जिन्दगी में हम इतने अस्त व्यस्त हैं कि हम समाज में हो रही गतिविधियों के मूल को जानने की कोशिश ही नहीं करते. मुझे इस बात को कहनें में कोई गुरेज नहीं हैं कि हिन्दुस्तान में फल फूल रहे बड़े टी. वी. चैनलों एवं बड़ी सोशल साइट्स के आँका विदेशों में बैठकर अपने मंसूबों से स्वर्णिम हिन्दुस्तान को तोड़ने की साज़िस कर रहें हैं. उन्हें भली भाँति पता है कि यदि सबसे बड़े लोकतंत्र वाले इस देश को तोड़ना है तो इसके युवाओं को बर्गलाना पड़ेगा, दिशाहीन करना पड़ेगा और उनको सोशल साइट्स द्वारा काल्पनिकता के दलदल में ढ़केलना पड़ेगा, गर देश की बुनियाद कमजोर हो जाएगी तो मजबूत राष्ट्र अपने आप ढ़ह जाएगा. आज खामियाज़ा भी हमारे सामने है, जो बेहद चिंतनीय है.

सन् अस्सी के दशक में भारत के महान दार्शनिक ड़ा रजनीश (ओशो) ने भी इस दिशाहीन काल्पनिक भीड़ पर चिन्ता जाहिर की थी और अस्वीकृति में उठा हाथ' पुस्तक में उन्होने साफ़ तौर पर कहा था कि भीड़ के भय के कारण हम असत्यों एवं गलत कदम को स्वीकार कर लेते हैं, जिसको हम सत्य मानकर बैठे हैं वह सत्य है ? या सिर्फ भीड़ का भय है कि चारों तरफ के लोग क्या कहेंगे ? चारों तरफ के लोग जिस दिशा में चल रहें हैं, उसी दिशा में तो मै भी चल रहा हूँ. ऐसा व्यक्ति सच तक कभी नहीं पहुँच सकता, जो भीड़ को स्वीकार कर लेता है. वास्तविकता (सत्य) की खोज भीड़ से मुक्त होती है. भीड़ में तो लोग एक दूसरे से ही भयभीत रहते हैं. सीधे तौर पर यह असत्य (काल्पनिक) को सत्य (वास्तविक) बनाने की तरकीबें हैं. सत्य (वास्तविकता) अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है, लेकिन असत्य ( काल्पनिकता) को भीड़ का सहारा चाहिए, उसके बिना वह खड़ा नहीं हो सकता.......  

आजकल हम यह मान बैठें हैं कि गर हमें ज़माने में रहना है तो ज़माने के रूख को स्वीकारना होगा. बात बिल्कुल सौ टके की है, ज़मानें का रूख करो, कौन मना कर रहा है ? परिणाम भी तो हमें ही भुगतना है. लगातार नैतिक पतन और संस्कारों का हनन हो रहा है, जिससे गरीबी, भुखमरी, आत्महत्या, वृद्धाश्रम , अनाथाश्रम.... की संख्या में लगातार इजाफ़ा हो रहा है. ज़मानें के साथ चलने में मुझे कोई गुरेज नहीं है, अत्याधुनिकता को अपनाओं, मगर उसके अच्छे बुरे पहलुओं को भी जानों और फिर उसका आत्मसात् करो, साथ ही साथ अपने अध्यात्म, संस्कार और सभ्यता को भी जीवित रखो. जो सदियों से सारे विश्व के लिए अनुकरणीय था और इसी वजह से आज भी वैश्विक स्तर पर दुनियाँ की निगाहें भारत पर ही टिकी हैं.

एक वाकया सचमुच हम सबको गौरवान्वित कर देने वाला है. एक बात यह साफ कर दूँ कि न तो मै किसी राजनीतिक पार्टी से हूँ और न ही किसी का महिमा-मण्ड़न कर रही हूँ. उस पल को याद दिलाना चाहती हूँ, जब हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री किसी मुल्क के राष्ट्राध्यक्ष को गीता भेट की थी और कहा था कि मेरे पास इससे ज्यादा देने को कुछ भी नहीं है और विश्व के पास इससे ज्यादा लेनें को भी कुछ नहीं है. परन्तु आज हमारी युवा पीढ़ी चौबीसो घड़ी सोशल साइट्स पर इतनी व्यस्त है कि उसके पास गीता जैसा नीतिशास्त्र और रामायण जैसा प्रयोगशास्त्र पढ़नें की फुरसत ही नहीं है.

आज हमारे नवयुवकों के मन पर सोशल साइट ऐसी परत जमा चुकी है कि वह उसी काल्पनिक दुनियाँ को ही वास्तविक दुनियाँ समझ बैठा है. खेलना- कूदना, मिलना-जुलना, निमंत्रण देना, किसी से बातें करना, प्रेम सम्बंध बनाना, शोक व्यक्त करना, गलत बात को सच साबित करना और तो और अपना बहुमूल्य समय व्यर्थ में गवानें का एक अहम माध्यम बन गया है. वजह साफ है, आज हम सोशल साइट्स की दुनियाँ में इतने मशगूल हैं कि हमारे पास वास्तविक जीवन जीने का वक्त ही नहीं बचा है. आज सोशल मीड़िया पर धर्म, अध्यात्म, तकनीक, प्रेरणा व अन्य प्रकार के अच्छे-बुरे पोस्ट प्रसारित होते रहते हैं कि हमें गूढ़ से गूढ़ चीजें भी बिल्कुल आसान सी लगती हैं, हम उसका कुछ अंश भी आत्मसात् नही करते परन्तु उन पोस्टों पर अपनी लम्बी चौड़ी प्रतिक्रिया देकर स्वयं को अच्छा साबित करने का प्रयत्न हर पल जरूर करते हैं. सार्थक बदलाव तब तक नहीं हो सकता जब तक कि हम किसी भी विषय पर चिंतन मनन न करें और उसका अमल न करें. सच्चाई यह है कि सोशल मीड़िया पर अच्छे अच्छे पोस्ट एवं प्रतिक्रिया करने वाला नवयुवक बाहर से तो बड़ा योग्य, समझदार और सफलता को अपनी मुठ्ठी में समेटकर रखने वाला प्रतीत होता है परन्तु अन्दर ही अन्दर वह उतना ही अयोग्य, कुत्सित मान्सिकता एवं भीड़ के भय से भयभीत रहता है. यही तो दुनियाँ की भीड़ और काल्पनिक संसार है, जो हमें सच से कोसों दूर रखता है.

यह बेहद चिंतनीय है कि आज सोशल साइट्स पर तकरीबन 20 करोड़ पोर्न वीड़ियो एवं क्लीपिंग उपलब्ध हैं, जोकि सीधे तौर पर इंटरनेट से ड़ाउनलोड़ किया जा सकता है. कई बार इस गंभीर मुद्दे पर भारत सरकार और विपक्षी दलों में बहस होती रही है, परन्तु बेनतीजा ही रही है. साल 2015 में राष्ट्रहित में भारत सरकार द्वारा 857 पोर्न कन्टेंट वाली बेबसाइट की लिस्ट इंटरनेट सर्विस प्रदाताओं को सौंपी थी और इनको ब्लाक करने का आदेश दिया गया था. सरकार के इस फैसले के खिलाफ विपक्षी लोगों द्वारा बड़ा हंगामा किया गया था और सरकार को अपना निर्णय वापस लेना पड़ा था. खैर यह तो साफ तौर पर सरकार की नैतिक हार ही थी. विभिन्न शोधों और अपराधियों के बयानों से यह स्पष्ट हो चुका है कि देश में बढ़ रही बलात्कार की घटनाएँ, अश्लील गतिविधियों व अन्य अमानवीय घटनाओं में पोर्न साइट्स की विशेष भूमिका रही है. एक तरफ सेक्स जहाँ शारीरिक और मानसिक जरूरतों को पूरा करनें में सहायक है, वहीं दूसरी ओर पोर्न सेक्स के प्रति एक वहशीपन एवं उन्माद पैदा करता है. जहाँ इन्सान मानसिक तौर पर जानवरों जैसा वर्ताव करनें लगता है.

दुनियाँ के ऐसे तमाम देश हैं जिन्होंने पोर्न साइट के विरूद्ध अभियान छेड़ा हुआ है और हमारे यहाँ जब सरकार संजीदा हुई तो तथाकथित बौद्धिक प्रगतिशाली लोगों ने अपनी ओछी दलीलें देकर सरकार को घुटने टिका दिए. इन्दौर के एक वकील कमलेश वासवानी पोर्न साइटों के खिलाफ कोर्ट पहुँचे, तो यह मुद्दा कुछ तथाकथित नैतिक लोगों को आर्टिकल 21  राइट टू पर्सनल लिबर्टी का हनन लगनें लगा. अन्तत: चीफ जस्टिस ने इस मुद्दे को फिर सरकार के पाले में ड़ाल दिया. साल 2014 में चीन ने 180000 अस्लील कन्टेंट वाली आनलाइन बेबसाइटों पर प्रतिबन्ध लगाकर समूचे विश्व के सामने एक बानगी पेश की, तो भारत क्यूँ नहीं कर सकता ?

एक शोध बड़ा चौकाने वाला है कि आज हमारे नवयुवक सोशल साइट्स की दुनियाँ में इतने मशगूल हो चुकें हैं कि उनका अधिकांश समय इसी पर व्यतीत होता है. एक अच्छे स्वस्थ्य नवयुवक को गर तीन दिन के लिए मोबाइल और सोशल साइट्स से दूर कर दिया जाए तो उसका ब्लड़प्रेसर स्वतः बढ़ जाएगा और सिकन उसके चेहरे से साफ झलकने लगेगी. यह सिर्फ और सिर्फ इस सोशल साइट्स की देन है. जिस वक्त हमारे नवयुवकों को आत्मसंयम के साथ अपनी काबिलियत को बढ़ाने की आवश्यकता रहती है, उस वक्त वो अपना बहुमूल्य समय सोशल साइट्स की इस काल्पनिक दुनियाँ में ज़ाया करते हैं.

अन्त में मै यह साफ कहना चाहती हूँ कि आप सोशल साइट्स से सार्थक बाते जरूर आत्मसात् कीजिए, सार्थक प्रयोग कीजिए, अत्याधुनिकता अपनाइए, टेक्नोंलाजिकल एड़वांस बनिए, कोई गुरेज़ नहीं है. परन्तु आप कुछ भी उपयोग करने से पहले उसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर विचार कीजिए. एक सुदृढ़ समाज और राष्ट्र बनाने के लिए हम सबको यह आवश्यकता है कि मानसिक रूप से संयमित बनें, दूरदृष्टि एवं निर्णय शक्ति ठोस रखें और सकारात्मक दिशा में गतिशील रहें. जिससे कि प्रत्येक नवयुवक राष्ट्र को बेहतर बनाने में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दे सकें.

आपकी
शालिनी तिवारी
 


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