बासठ साल की उम्र परिपक्व मानी जाती है, लेकिन मुझे इस बात का बिल्कुल भी यकीन नहीं है कि स्थापना के 62 साल पूरे होने के बावजूद न तो मध्यप्रदेश की शासन, कानून-व्यवस्था परिपक्व हुई है और न ही समाज. वजह दो हैं. इस माह की पहली तारीख को जब मध्यप्रदेश के सीएम लाल परेड ग्राउंड पर स्थापना दिवस समारोह में नाच-गा रहे थे, उससे एक रात पहले कोचिंग से घर लौट रही लड़की के साथ चार लोगों ने गैंगरेप किया. उसके ठीक दो दिन बाद भोपाल रेल्वे स्टेशन पर मिली 12 साल की एक बच्ची के रेप पीड़ित होने और उसके प्रेग्नेंट होने की बात जीआरपी थाने में सामने आई.

दोनों मामले रेल्वे पुलिस की संवेदनशीलता से जुड़े हुए हैं. पहला मामला भोपाल के हबीबगंज स्टेशन के बिल्कुल नजदीक हुआ और दूसरा मामला भोपाल रेल्वे स्टेशन पर सामने आया. ऐसे अधिकांश मामलों में कानून-व्यवस्था संभालने का दावा करने वाली पुलिस की रफा-दफा करने वाली भूमिका तो लगभग सभी को मालूम ही है,लेकिन सबसे हास्यास्पद पहलू ऐसे मामलों की मीडिया रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया पर हो रही सामाजिक बहस की असंवेदनशीलता का है. वह भी ऐसे समय, जबकि निर्भया रेप कांड को पांच बरस बीत चुके हैं. दोषियों को सजा सुनाई जा चुकी है. सुप्रीम कोर्ट ने रेप जैसे जघन्य मामलों की एफआईआर, जांच और फास्ट ट्रैक कोर्ट में उनकी जल्द सुनवाई को लेकर कई साफ गाइडलाइन्स जारी की हैं. लेकिन भोपाल में 72 घंटे में सामने आई दोनों मामलों की मीडिया रिपोर्टिंग को पढ़कर स्पष्ट समझ आता है कि ऐसे मामलों में बजाय संवेदनशील होने के मीडियाकर्मी संवेदनाओं को उभारने, उन्हें भुनाने के एकसूत्रीय एजेंडा पर काम कर रहे हैं. अलबत्ता गाहे-बगाहे वे यह दावा कर सकते हैं कि दोनों मामलों में जो भी कार्रवाई हुई, उसके लिए उन्हें परमवीर चक्र जैसा कोई तमगा मिलना चाहिए. लेकिन वास्तव में वे निहायत ही मूर्ख हैं. उतने ही मूर्ख, जितनी की सोशल मीडिया पर ऐसे मामलों में बहुत ही बेहूदा तरीके से अपनी विलक्षण सोच का परिचय देने वाले लोग. दिक्कत यह है कि मीडिया वालों ने पढ़ना-समझना छोड़ दिया है. यह बात मैं खासतौर पर हिंदी पत्रकारों के लिए कहने को बाध्य हूं कि अंग्रेजी में कोई भी अदालती आदेश का पुलिंदा या विधानसभा में किसी अहम चर्चा या विधेयक की मूल भावना उनके लिए एक‘वजनदार रद्दी’ से बढ़कर और कुछ नहीं होती. रेप के तकरीबन ज्यादातर मामलों में संवेदनहीन रिपोर्टिंग के कारण प्रशासन पर दबाव नहीं बन पाता है कि वह नियम-कानूनों का पालन करे और न ही पुलिस पर कि वह निष्पक्ष तरीके से मामले की जांच कर दोषियों की धरपकड़ कर जल्द से जल्द ट्रायल कोर्ट में पीड़िता के प्रति संवेदनशील रुख अपनाते हुए एक मजबूत केस डायरी पेश करे.

बहरहाल, 25 अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ज्ञानसुधा मिश्र और वी गोपाल गौड़ा की दो सदस्यीय बेंच ने देशभर के सभी डीजीपी से लेकर थाना प्रभारियों तक के लिए कुछ गाइडलाइन दी थी. सीआरपीसी 164 यह कहता है कि रेप का मामला सामने आते ही जांच अधिकारी पीड़िता को लेकर मजिस्ट्रेट के पास जाए और उसका बयान दर्ज कराए. यह काम 24 घंटे तक पूरा हो जाना चाहिए. अगर नहीं हुआ तो जांच अधिकारी को केस डायरी में बताना होगा कि देरी क्यों हुई. इसमें यह भी कहा गया है कि पीड़िता के बयान को तब तक उजागर नहीं किया जाएगा, जब तक सीआरपीसी 173 के तहत मामले की चार्जशीट दाखिल नहीं हो जाती. पीड़िता का तुरंत मेडिकल कराया जाना चाहिए और उसकी रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के सामने पेश की जानी चाहिए. इसी बेंच ने यह भी कहा था कि  सीआरपीसी 1973 को बदलने और उसे और संवेदनशील बनाने की दिशा में प्रयास होने चाहिए, जो न केवल पीड़िता को न्याय दिलाने वाला हो, बल्कि आरोपी को सुबूतों के अभाव में जमानत पर छूटने भी न दे. विधि आयोग ने इसी साल मई में अपनी रिपोर्ट में इस सच को स्वीकारा है कि इस बारे में पहला करना जरूरी है ताकि वास्तविक अपराधी छूट न पाएं और साक्ष्यों को प्रभावित न कर सकें. लेकिन सरकार के कानों में अभी तक शायद रिपोर्ट की बातें पहुंची नहीं है और पहुंचे भी कैसे ? नोट बंदी,जीएसटी और कारेाबारी कामों से उसे फुर्सत मिले तो?

ऐसी घटनाओं पर अमूमन शहर में गुस्से के प्रतीक स्वरूप मोमबत्तियां जलाकर विरोध प्रदर्शन करने और सोशल मीडिया पर अपनी संवेदनात्मक अभिव्यक्ति करने की आजादी सभी को है. लेकिन इस अहम बात की ओर किसी का ध्यान नहीं जाता कि यही आजादी तो उस बहस को आगे बढ़ाने की भी है, जो ऐसी घटनाओं को भविष्य में रोकने के लिए कानून-वयवस्था पर सुधार का दबाव बनाने का काम करे. अंग्रेजी राज में राजे-रजवाड़े अपने यहां किसी की मौत होने पर रोने वालों को किराए पर बुलाया करते थे. रेप जैसे जघन्य मामलों में भी ऐसे छाती पीटने वालों की कमी नहीं है. इस असंवेदनशीलता के बीच सबसे बुरा असर उन लड़कियों के सपनों पर पड़ता है, जो आजादी से घूमना चाहती हैं, पढ़कर आगे बढ़ना चाहती हैं, इस पुरुषप्रधान समाज के साथ कदम मिलाकर अपनी पहचान बनाना चाहती हैं. पुलिस का असंवेदनशील रवैया जहां महिलाओं के मन में खौफ पैदा करता है तो सोशल मीडिया का जनमानस गाहे-बगाहे अपने ही परिवार में लड़कियों के सपनों के पर कतरने की कोशिश करता है.

सीधी बात है, अगर पुलिस नाकाम है तो उसे आइना दिखाने का काम सिर्फ कॉर्पोरेटी मीडिया का ही क्यों हो ? अगर हर व्यक्ति को देश के कानून और अधिकारों की जानकारी हो तो वह दोनों को आइना दिखा सकता है,  पॉजिटिव मंडे जैसे ‘जुमलों’ की आड़ में अपनी दागदार छवि को धोने और धंधा चमकाने की मीडिया की कोशिश नाकाम रहे. इसके लिए, घड़ियाली आंसू बहाने के बजाय सोए हुओं को जगाने की जरूरत है. अब नहीं जगेंगे तो आगे और भी हजारों निर्भया की बलि चढ़ेगी और सोशल मीडिया उनका वैसे ही चीरहरण करेगा, जैसा सभ्य कहलाने का दावा करने वाले इस‘असभ्य’ समाज में हो रहा है.  


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