अनिल मिश्र/गयाजी
सनातन धर्म में प्रत्येक दिन का एक खास महत्व है इसी प्रकार सनातन धर्म में देवी देवताओं ,पशु पक्षियों और प्रकृति को पूजकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं. इस प्रकार इस दुनिया से शरीर त्याग कर परलोकवास करने वाले मृत आत्माओं के शांति एवं मोक्ष प्रदान करने के लिए श्राद्ध कर्म और तर्पण एवं पिंडदान करने का महत्व है. वही उनके प्रति श्रद्धा के साथ तर्पण एवं पिंडदान करने से परिवार के प्रति मंगल कामना एवं आशीर्वाद प्राप्त करने का भी विधान है. जब बात पितरों की हो तो बिहार की गयाजी धाम का वर्णन करना जरूरी है. गरुड़ पुराण और वायु पुराण में गया की महत्ता विशेष रूप से बताई गई है. हिंदू धर्म में यह मानता है कि गयाजी में पिंडदान करने से पितरों को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है पुराणों के अनुसार भगवान विष्णु ने गयासुर नामक एक राक्षस को वरदान दिया था. जो भी गया जी में श्राद्ध कर्म करेगा उसके पितरों को मोक्ष मिलेगा. पौराणिक कथाओं के अनुसार गयासुर नामक एक राक्षस ब्रह्मा जी से वरदान मांगा कि वह इतना पवित्र हो जाए कि लोग उसके दर्शन मात्र से पाप मुक्त हो जाए.
इस वरदान के बाद गयासुर ने लोगों को मोक्ष देना शुरू कर दिया .यमराज इससे चिंतित हो गए तब उन्होंने देवताओं से सहायता मांगी. देवताओं ने गयासुर के पास आकर यज्ञ करने की इच्छा जताई. त्पश्चात गयासुर इसके लिए तैयार हो गए और अपने शरीर पर यज्ञ करने की अनुमति दे दिया .ब्रह्मा जी ने गयासुर को यज्ञ पूरा होने तक शरीर नहीं हिलना का वचन दिया .यज्ञ शुरू होते ही गयासुर को अपने शरीर पर बोझ का एहसास हुआ और उसके बाद वह हिलने की कोशिश करने लगा तो भगवान विष्णु ने उसके शरीर के ऊपर अपना पैर रख दिया. जिसके कारण वह शांत हो गया .इसी कारण इसे विष्णुपद यानी विष्णु भगवान का चरण कहा जाता है इसके साथ ही गयासुर को वरदान दिया गया कि वह यह जगह गया नाम से जाना जाएगा और जो भी यहां पिंडदान करेगा उसके पूर्वक यानी पीटर 108 कल तक मौत की प्राप्त करेंगे.
इसके बाद यहां पिंडदान शुरू हो गया पौराणिक कथाओं के अनुसार त्रेता युग में भगवान राम और सीता ने यहां पिंडदान किया है भगवान राम के देर से आने के कारण दशरथ जी का आत्मा प्रकट हो गया और तुरंत पिंडदान करने को कहा. लेकिन श्री राम पिण्ड दान की सामग्री लाने चले गए थे .तो सीता माता ने अनतः सलिला जिसे फल्गु नदी है उसी में बालू यानी की रेत उढ़ाकर पिंडदान दे दिया .इसी कारण यहां पर सीता कुंड है .वही पांडवों ने भी यहां पर आकर पिंडदान किया है ऐसा वर्णन मिलता है.
वैसे गया में सालों भर पिंडदान का कार्य होता है . लेकिन भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्दशी तिथि यानी की अनंत चतुर्दशी से लेकर आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक यहां पिंडदान विशेष रूप होता से होता है जिसे पितृपक्ष बोला जाता है. यहां पर जिला प्रशासन द्वारा पितृ पक्ष मेले का आयोजन किया जाता है किया जाता है. प्राचीन काल में प्राचीन काल में यहां पर एक वर्ष के यानी की 365 वेदियां हुआ करती थी.
प्रत्येक दिन एक वर्ष तक पिंडदान लोग करते थे लेकिन लोगों लेकिन जिला प्रशासन उदासीनता और अतिक्रमण होने के कारण अभी मात्र शेष 55 वेदियां ही बची हैं. प्रति वर्ष पितृ पक्ष के मौके पर लगभग 20 से 25 लाख श्रद्धालु आकर अपने पूर्वजों की पिंडदान यहां करते हैं इस दौरान जिला प्रशासन द्वारा विशेष व्यवस्था किया जाता है इस बार भी किया गया है टेंट सिटी से लेकर कई तरह की सुविधा उपलब्ध कराई गई है.छह सितंबर से शुरू इस पितृपक्ष में अभी तक प्रमुख लोगों में आने वालों में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, लोकप्रिय टीवी सीरियल महाभारत के दुर्योधन के पात्र पुनीत इस्सर और बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर बाबा धीरेंद्र नाथ शास्त्री भी आकर अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना के लिए यहां पिंडदान कर रहे हैं.
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