लद्दाख हिंसा की जांच के लिए केंद्र का बड़ा फैसला, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी.एस. चौहान करेंगे न्यायिक आयोग का नेतृत्व

लद्दाख हिंसा की जांच के लिए केंद्र का बड़ा फैसला, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी.एस. चौहान करेंगे न्यायिक आयोग का नेतृत्व

प्रेषित समय :20:56:28 PM / Fri, Oct 17th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

लेह/नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने लद्दाख में 24 सितंबर को हुई दुर्भाग्यपूर्ण हिंसा और पुलिस कार्रवाई की जांच के लिए एक बड़ी घोषणा की है। इस घटना में चार लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे। गृह मंत्रालय ने शुक्रवार को घोषणा करते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बीएस चौहान को इस मामले की न्यायिक जाँच करने के लिए नियुक्त किया गया है। यह घोषणा लेह में मारे गए, घायल हुए या गिरफ्तार किए गए लोगों के प्रति एकजुटता दिखाते हुए एक नियोजित विरोध मार्च और ब्लैकआउट से ठीक एक दिन पहले आई है। यह कदम केंद्र सरकार द्वारा लद्दाख के निवासियों के साथ बातचीत की इच्छा को पुन: स्थापित करने के रूप में देखा जा रहा है।

लद्दाख में यह हिंसा ऐसे समय में हुई जब लेह के निवासी लंबे समय से केंद्र शासित प्रदेश के लिए राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। 24 सितंबर को हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाए जाने के बाद चार लोगों की मौत हो गई थी और 70 से अधिक लोग घायल हुए थे। इस घटना के बाद स्थानीय अधिकारियों ने तत्काल कर्फ्यू जैसी पाबंदियाँ लगाई थीं, मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया था, और 70 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें लेह एपेक्स बॉडी (LAB) के प्रमुख नेता सोनम वांगचुक भी शामिल थे, जिन पर बाद में राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत आरोप लगाए गए थे। हालाँकि कुछ पाबंदियों में अब ढील दी गई है और इंटरनेट सेवा बहाल कर दी गई है, लेकिन LAB और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) जैसे समूह अभी भी सामान्य स्थिति के दावों पर सवाल उठा रहे हैं।

इस पूरी घटना के बाद से ही, आंदोलन का नेतृत्व कर रहे लेह एपेक्स बॉडी और अन्य राजनीतिक व धार्मिक समूहों ने पुलिस कार्रवाई की न्यायिक जाँच को केंद्र के साथ वार्ता फिर से शुरू करने की प्राथमिक शर्तों में से एक बताया था। प्रदर्शनकारियों द्वारा स्वायत्तता की मांगों पर 6 अक्टूबर को होने वाली प्रस्तावित वार्ता को भी न्यायिक जाँच और सभी बंदियों, विशेषकर सोनम वांगचुक की रिहाई की माँग पर अड़े रहने के कारण रद्द कर दिया गया था। अब गृह मंत्रालय की यह घोषणा प्रदर्शनकारी समूहों की एक प्रमुख मांग को पूरा करती है, जिसका उद्देश्य घटना की परिस्थितियों, पुलिस कार्रवाई और दुर्भाग्यपूर्ण मौतों के कारणों की निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करना है।

जस्टिस बीएस चौहान, जिन्होंने 2009 से 2014 तक सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में कार्य किया है, उन्हें इस न्यायिक जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सुप्रीम कोर्ट में अपनी सेवा से पहले, उन्होंने ओडिशा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और इलाहाबाद व राजस्थान उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश के रूप में भी कार्य किया था। सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने 2016 से 2018 तक विधि आयोग की अध्यक्षता की और बाद में गैंगस्टर विकास दुबे के कथित मुठभेड़ मामले में उत्तर प्रदेश पुलिस को क्लीन चिट देने वाले जांच आयोग का नेतृत्व किया था। उनके विस्तृत और अनुभवी न्यायिक करियर को देखते हुए, उनकी नियुक्ति को जाँच की गंभीरता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

गृह मंत्रालय ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया कि एक निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए, भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने आज माननीय डॉ. जस्टिस बीएस चौहान द्वारा न्यायिक जाँच किए जाने की अधिसूचना जारी की है, जो गंभीर कानून और व्यवस्था की स्थिति, पुलिस कार्रवाई और परिणामस्वरूप चार व्यक्तियों की दुर्भाग्यपूर्ण मौतों की परिस्थितियों की जाँच करेंगे। जाँच प्रक्रिया में जस्टिस चौहान की सहायता के लिए सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश मोहन सिंह परिहार को न्यायिक सचिव और आईएएस अधिकारी तुषार आनंद को प्रशासनिक सचिव के रूप में नियुक्त किया गया है।

गृह मंत्रालय ने इस प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से लद्दाख के निवासियों के साथ निरंतर संवाद की केंद्र सरकार की इच्छा को भी दोहराया। मंत्रालय ने कहा कि वे लेह अपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के साथ उच्च शक्ति समिति या किसी अन्य मंच के माध्यम से चर्चा का स्वागत करना जारी रखेंगे। सरकार ने विश्वास व्यक्त किया कि निरंतर संवाद से निकट भविष्य में वांछित परिणाम प्राप्त होंगे और वह लद्दाख के लोगों की आकांक्षाओं के प्रति प्रतिबद्ध है। यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब LAB सदस्यों ने यह आरोप लगाया है कि सरकार ने चर्चा को फिर से शुरू करने या उनकी प्रमुख मांगों को संबोधित करने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया है।

लद्दाख के राजनीतिक और धार्मिक समूहों के बीच व्याप्त गहरा असंतोष और विरोध प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि में, यह न्यायिक जांच न केवल घटनाक्रम को स्पष्ट करने में मदद करेगी, बल्कि केंद्र सरकार और स्थानीय प्रतिनिधियों के बीच टूटे हुए विश्वास को बहाल करने का एक आधार भी प्रदान कर सकती है। प्रदर्शनकारी समूहों ने न्यायिक जांच की मांग को अपनी प्राथमिक शर्तों में रखा था, इसलिए अब इस जांच की घोषणा के बाद, यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि LAB और KDA के नेता अपने आगामी विरोध प्रदर्शनों और वार्ता की रणनीति पर क्या फैसला लेते हैं। लद्दाख के लोग शांति और न्याय के साथ-साथ अपने क्षेत्र के लिए संवैधानिक सुरक्षा और राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे हैं, और केंद्र का यह कदम इन मांगों को संबोधित करने की दिशा में पहला ठोस कदम साबित हो सकता है। यह पूरा घटनाक्रम केंद्र और लद्दाख के निवासियों के बीच एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है, जहाँ संवाद और न्याय के माध्यम से समाधान तलाशा जाएगा।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-