भैरव अष्टमी पर काल भैरव की करें इस विशेष विधि से पूजा, हर संकट होगा दूर जानिये महापूजा का शुभ मुहूर्त

भैरव अष्टमी पर काल भैरव की करें इस विशेष विधि से पूजा, हर संकट होगा दूर जानिये महापूजा का शुभ मुहूर्त

प्रेषित समय :17:58:22 PM / Tue, Nov 11th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

राष्ट्रीय धार्मिक डेस्क: हिन्दू धर्म में अति पूजनीय और शीघ्र फलदायी देवता, भगवान शिव के रौद्र स्वरूप काल भैरव को समर्पित भैरव अष्टमी का पावन पर्व इस वर्ष 12 नवंबर, बुधवार को मनाया जाएगा. चूँकि भैरव अष्टमी काल भैरव का प्राकट्य दिवस है, इसलिए इस दिन इनकी पूजा का महत्व सामान्य दिनों की अपेक्षा कई गुना बढ़ जाता है. विशेषकर शत्रु बाधा, असाध्य रोग, कानूनी परेशानियों, और नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति पाने के लिए इस दिन की गई साधना अचूक फल देती है. ज्योतिषियों और तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार, इस दिन पूजा के लिए कुछ विशेष मुहूर्त और विशिष्ट पूजन विधि का पालन करना अनिवार्य है, तभी भगवान भैरव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है और भक्त को भयमुक्त जीवन का आशीर्वाद मिलता है.

शुभ मुहूर्त और काल पूजा का समय:

धार्मिक पंचांग के अनुसार, भैरव अष्टमी इस वर्ष 12 नवंबर, बुधवार को पड़ रही है. इस दिन की पूजा में काल (मध्यरात्रि) का विशेष महत्व होता है, क्योंकि भैरव स्वयं काल के स्वामी हैं.

  • भैरव अष्टमी तिथि आरंभ: 11 नवंबर, मंगलवार की रात्रि (या 12 नवंबर, बुधवार की भोर) से होगा.

  • भैरव अष्टमी तिथि समाप्त: 12 नवंबर, बुधवार की मध्यरात्रि के बाद होगा.

  • सबसे शुभ मुहूर्त (काल पूजा): चूंकि भैरव जी को रात्रि का देवता माना जाता है, इसलिए इनकी पूजा के लिए सबसे उत्तम समय निशीथ काल (मध्यरात्रि) होता है. 12 नवंबर की रात्रि में 11:50 बजे से लेकर 12:40 बजे तक का समय 'निशीथ काल' कहलाएगा. इस 50 मिनट के दौरान की गई पूजा से भैरव जी अति शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं.

  • अन्य शुभ समय: यदि कोई भक्त निशीथ काल में पूजा नहीं कर सकता है, तो वह पूरे दिन ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4:30 से 5:30 बजे तक) या सायंकाल प्रदोष वेला (शाम 5:30 से 7:00 बजे तक) में भी पूजा कर सकता है, लेकिन काल पूजा का फल सबसे अधिक होता है.

पूजा की विशेष विधि और विधान:

भैरव अष्टमी के दिन भक्त को सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इसके बाद, घर के पूजा स्थल या किसी भैरव मंदिर में जाकर पूजा शुरू करनी चाहिए. भैरव की पूजा में काले रंग की वस्तुएं और सरसों का तेल विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है.

  1. शुद्धि और संकल्प: सबसे पहले पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें. फिर हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर व्रत या पूजा का संकल्प लें.

  2. भैरव जी का अभिषेक: भैरव जी की प्रतिमा या तस्वीर को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल) से अभिषेक करें.

  3. वस्त्र और श्रृंगार: भैरव जी को नए वस्त्र (विशेषकर काले या गहरे रंग के) अर्पित करें. उन्हें इत्र, चंदन या अष्टगंध लगाएं.

  4. माला और फूल: भैरव जी को गेंदे के फूल या गुलाब के फूल की माला अर्पित करें.

  5. नैवेद्य और भोग: भैरव जी को प्रसन्न करने के लिए उड़द की दाल से बनी वस्तुएं (जैसे पकौड़े, दही बड़े), गुड़नारियल, और शराब (तंत्र पूजा में) का भोग लगाया जाता है. सामान्य भक्त काले तिल और मिठाई का भोग लगा सकते हैं.

  6. दीपक और धूप: भैरव जी के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाना अत्यंत शुभ माना जाता है. दीपक में एक या दो काले तिल डालना भी आवश्यक माना गया है. धूप-दीप जलाकर पूजन करें.

  7. मंत्र जाप: पूजा के दौरान "ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय कुरू कुरू बटुकाय ह्रीं" या "ॐ काल भैरवाय नमः" मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करना चाहिए. यह मंत्र सभी प्रकार के संकटों और भय से मुक्ति दिलाता है.

  8. भैरव कथा और आरती: पूजा के अंत में भैरव कथा का पाठ करें और फिर उनकी आरती गाएँ.

भैरव पूजा के विशेष नियम और सावधानियाँ:

  • कुत्ते को भोजन: भैरव जी के वाहन श्वान (कुत्ता) को इस दिन भोजन कराना अनिवार्य माना गया है. घर पर बने मीठे या नमकीन पकवान, रोटी या दूध कुत्ते को ज़रूर खिलाएं. इससे भैरव जी अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्त के कष्टों को अपने वाहन पर लेकर दूर कर देते हैं.

  • यात्रा का त्याग: भैरव अष्टमी पर दिन के समय यात्रा करना या यात्रा शुरू करना शुभ नहीं माना जाता है, क्योंकि भैरव को काल का रूप माना जाता है और रात में उनकी पूजा से ही फल मिलता है.

  • क्रोध से बचें: इस दिन किसी पर क्रोध करने या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए. मन को शांत रखकर साधना करनी चाहिए.

  • गुप्त दान: गरीबों और जरूरतमंदों को काला कंबल, तिल, उड़द या सरसों का तेल गुप्त रूप से दान करने से भैरव जी की कृपा सदैव बनी रहती है.

अष्ट भैरव की विशेष उपासना:

भैरव अष्टमी पर अपने विशिष्ट कष्टों और मनोकामनाओं के अनुसार, भक्त अष्ट भैरव (कपाल, क्रोध, असितांग, चंद, गुरु, संहार, उन्मत और भीषण भैरव) में से किसी एक की विशेष उपासना कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, कानूनी मामलों में सफलता के लिए कपाल भैरव की, बुरी शक्तियों से मुक्ति के लिए भीषण भैरव की, और ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु भैरव की पूजा अत्यंत प्रभावी होती है.

भैरव अष्टमी का पर्व तंत्र, मंत्र और सनातन धर्म की गूढ़ शक्तियों का महापर्व है. इस दिन पूरी श्रद्धा और विधिवत पूजा के साथ, हर भक्त काल के भय से मुक्ति पाकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त कर सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-