प्रोटीन और प्रामाणिकता की तलाश में Gen Z ने खोला किचन का ताला, क्षेत्रीय व्यंजन बन रहे हैं सोशल मीडिया पर थेरेपी का नया मंत्र

प्रोटीन और प्रामाणिकता की तलाश में Gen Z ने खोला किचन का ताला

प्रेषित समय :19:54:55 PM / Tue, Nov 11th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. युवा पीढ़ी, जिसे 'जेन ज़ी' (Gen Z) के नाम से जाना जाता है, अब स्मार्टफोन की स्क्रीन से निकलकर किचन के प्लेटफॉर्म तक पहुंच गई है, लेकिन उनका यह पाक प्रेम पिछली पीढ़ियों से काफी अलग है. यह पीढ़ी न केवल फ्यूजन और वायरल स्नैक्स की दीवानी है, बल्कि अब वह अपनी डाइट को प्रोटीन-केंद्रित रखते हुए भारत और पड़ोसी देशों के क्षेत्रीय और गुमनाम व्यंजनों की खोज में जुटी है. खाना पकाना अब इनके लिए केवल आवश्यकता नहीं रही, बल्कि यह आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम, एक आरामदायक थेरेपी और सोशल मीडिया पर आकर्षक कंटेंट का नया स्रोत बन गया है.

पारंपरिक रूप से किचन की कमान अक्सर मां या दादी के हाथ में होती थी, लेकिन अब जेन ज़ी, जो टेक्नोलॉजी और वैश्विक संस्कृति से गहराई से जुड़ी है, अपने लिए खुद खाना बना रही है. इस बदलाव का मुख्य कारण स्वास्थ्य चेतना में वृद्धि है. जिम जाने वाले या फिटनेस पर ध्यान देने वाले ये युवा अब कैलोरी से ज्यादा प्रोटीन काउंट पर ध्यान दे रहे हैं. इसी कारण, उनकी प्लेट से अब मैदा और चीनी धीरे-धीरे हट रही है, और उनकी जगह जटिल कार्बोहाइड्रेट्स, लीन प्रोटीन और किण्वित (fermented) खाद्य पदार्थ ले रहे हैं. वे ऐसी रेसिपी खोज रहे हैं जो स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पोषण से भरपूर हों, और यही कारण है कि भारतीय क्षेत्रीय व्यंजनों ने उन्हें आकर्षित किया है.

इस ट्रेंड के केंद्र में ओड़िशा का पारंपरिक व्यंजन पोइटा भात और नेपाल का लोकप्रिय आलू चुकाउनी जैसे क्षेत्रीय व्यंजन हैं. पोइटा भात, जो कि बचा हुआ चावल को रात भर पानी में भिगोकर फर्मेंट करने से बनता है, अब एक वायरल डिटॉक्स और कूलिंग फूड बन गया है. जेन ज़ी इसे दही, नमक, हरी मिर्च और सरसों के तेल के साथ मिलाकर न केवल इसकी सादगी को पसंद कर रही है, बल्कि इसके प्रोबायोटिक गुणों और पेट को ठंडा रखने की क्षमता के कारण इसे 'सुपरफूड' का दर्जा दे रही है. यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर कई फूड व्लॉगर्स इन व्यंजनों को 'दादी की रेसिपी' या 'प्रामाणिक देसी फूड' टैग के साथ पेश कर रहे हैं, जिससे इनकी लोकप्रियता में जबरदस्त उछाल आया है.

इसी तरह, पड़ोसी देश नेपाल का आलू चुकाउनी—एक प्रकार का आलू सलाद जिसे उबले हुए आलू को दही, भुने हुए तिल के पाउडर, सरसों के तेल और मेथी के तड़के के साथ बनाया जाता है—भी युवाओं की रसोई में जगह बना रहा है. यह व्यंजन कम समय में तैयार हो जाता है, इसमें भरपूर मात्रा में प्रोटीन (दही से) और आवश्यक फैटी एसिड्स (तिल और सरसों के तेल से) होते हैं, जो इसे 'क्विक मील' और 'फिटनेस मील' दोनों की श्रेणी में ला खड़ा करता है. इसका अनूठा, तीखा और मलाईदार स्वाद इस पीढ़ी को एक नया 'फूड एक्सपीरियंस' दे रहा है, जिसकी वे हमेशा तलाश में रहते हैं.

जेन ज़ी के लिए, यह खाना पकाना केवल पेट भरने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक मानसिक शांतिकरण (mental de-stressing) की प्रक्रिया है. कई युवा कंटेंट क्रिएटर्स बताते हैं कि सब्जियां काटने और धीमी आंच पर खाना पकाने की प्रक्रिया उन्हें तनाव से मुक्ति दिलाती है. यह उनके व्यस्त और तकनीक-केंद्रित जीवन से एक ब्रेक देता है, जहां वे रचनात्मकता का प्रदर्शन कर सकते हैं. इसके अलावा, इंस्टाग्राम रील्स और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉर्म्स ने घर पर खाना बनाने को एक आकर्षक 'सोशल कंटेंट' में बदल दिया है. युवाओं को अपने बनाए हुए एस्थेटिकली pleasing (सौंदर्यपूर्ण) भोजन की तस्वीरें और वीडियो साझा करने में आनंद आता है, जिससे उनके फॉलोअर्स बढ़ते हैं और वे एक 'फूड इन्फ्लुएंसर' के रूप में अपनी पहचान बना पाते हैं. यह चलन उन्हें 'खाना पकाने के माध्यम से कहानी सुनाने' और अपनी सांस्कृतिक पहचान को सेलिब्रेट करने का मौका भी देता है.

निष्कर्ष रूप में, जेन ज़ी ने भारतीय खाद्य परिदृश्य को एक नई दिशा दी है. उन्होंने भोजन को 'कार्यक्षमता (Functionality)' से जोड़ दिया है, जहां हर व्यंजन का एक उद्देश्य होता है—चाहे वह प्रोटीन बढ़ाना हो, पेट को ठंडा रखना हो, या मानसिक शांति देना हो. क्षेत्रीय व्यंजनों को अपनाकर वे जड़ों से जुड़ रहे हैं, जबकि सोशल मीडिया का उपयोग कर वे इन व्यंजनों को वैश्विक मंच पर ला रहे हैं. यह किचन ट्रेंड केवल एक अस्थायी सनक नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी पीढ़ी के खान-पान के प्रति गंभीर दृष्टिकोण को दर्शाता है जो स्वास्थ्य, स्थिरता और प्रामाणिकता को प्राथमिकता देती है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-