जबलपुर. शहर में वर्षों से उपेक्षा का शिकार बनी महिला मार्केट एक बार फिर चर्चा में है. बल्देबाग क्षेत्र में निगम द्वारा महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बनाई गई यह मार्केट आज बदहाल स्थिति में खड़ी है. पूरी इमारत में लगभग 54 सटर बने हुए हैं, लेकिन इनमें से 80 प्रतिशत से अधिक सालों से बंद पड़े हुए हैं. जिस उद्देश्य से यह मार्केट बनाई गई थी, वह जमीन पर आते-आते धीरे–धीरे खत्म होता दिखाई दे रहा है, जबकि जरूरतमंद महिलाओं को आज भी रोजगार के अवसरों की कमी का सामना करना पड़ रहा है.
स्थानीय निवासियों और व्यापारियों का कहना है कि मार्केट की यह स्थिति नई नहीं है. यह कई वर्षों से ऐसे ही पड़ा हुआ है और निगम कभी-कभार निरीक्षण कर ही जाता है, मगर वास्तविक सुधार आज तक नहीं हुआ. हैरानी की बात यह है कि जहां एक ओर मार्केट का बड़ा हिस्सा बंद पड़ा है, वहीं कुछ चुनिंदा दुकानें बाहरी प्रभावशाली लोगों द्वारा कब्जे में लेकर मोटे किराए पर दूसरों को दे दी गई हैं. सूत्रों के अनुसार बिल्डिंग में जो 9 से 10 दुकानें खुलती दिखाई देती हैं, उनमें से अधिकांश उद्योगपतियों या आर्थिक रूप से सक्षम लोगों के नियंत्रण में हैं. ये लोग निगम की किराया दरों को नजरअंदाज करते हुए 4 से 5 हजार रुपये प्रति माह वसूली कर रहे हैं, जबकि निगम के रिकॉर्ड में इन दुकानों का वास्तविक किराया केवल 700 से 800 रुपये निर्धारित है.
स्थानीय दुकानदार बताते हैं कि यह मार्केट मूलतः उन महिलाओं के लिए बनाई गई थी जो सिलाई, ब्यूटी पार्लर, घरेलू उत्पादों की बिक्री, हैंडीक्राफ्ट, दैनिक जरूरतों के सामान और छोटे व्यवसायों के जरिए अपनी आय बढ़ाना चाहती थीं. लेकिन वर्ष दर वर्ष मार्केट की स्थिति खराब होती गई और कई सटरों पर धूल जम गई. जिन दुकानों को आवंटित किया जाना था, वे बिना उपयोग के बंद पड़ी रहीं. कुछ दुकानों को वर्षों पहले जिन लोगों ने लिया, उन्होंने व्यवसाय शुरू नहीं किया और फिर लंबे समय तक सटर बंद ही रखे. दूसरी तरफ जो लोग वास्तव में दुकान लेकर व्यवसाय करना चाहते थे, उन्हें मार्केट की इस स्थिति के कारण कभी मौका ही नहीं मिला.
कहा जा रहा है कि कई प्रभावशाली लोगों ने इन दुकानों को अपने प्रभाव का प्रयोग करके कब्जे में ले लिया. निगम द्वारा तय किराए से अधिक राशि लेकर ये दुकानें निजी स्तर पर किराए पर दी जा रही हैं. यह स्थिति न केवल नियमों के खिलाफ है, बल्कि यह उन जरूरतमंद महिलाओं के अधिकारों का हनन भी है जिनके नाम पर यह भवन बनाया गया था. स्थानीय निवासियों ने शिकायत की है कि कई दुकानों के बाहर झाड़ियां उग आई हैं, सटर जंग खा चुके हैं और बिल्डिंग के भीतर अंधेरा छाया रहता है, जिससे मार्केट का पूरा वातावरण असुरक्षित तथा उपेक्षित दिखाई देता है.
वहीं, निगम की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं. लोगों का कहना है कि निगम केवल कागजों में कार्रवाई करता है, लेकिन जमीन पर सख्त कदम उठाने से बचता है. किसी भी दुकान का किराया आज तक वास्तविक दर पर जमा नहीं कराया गया, जबकि मोटी रकम अवैध रूप से वसूली जा रही है. कई बार नागरिकों ने शिकायत दर्ज कराई, मगर उस पर कोई प्रभावी कार्यवाही होती नहीं दिखी. निगम कर्मचारियों द्वारा किए गए नियमित निरीक्षण भी केवल औपचारिकता भर साबित होते हैं.
इलाके की महिलाओं का कहना है कि अगर यह मार्केट सही तरीके से संचालित होती, तो कई परिवारों को स्थायी आय का साधन मिल सकता था. लेकिन वर्तमान स्थिति में यह इमारत सिर्फ खोखले सरकारी दावों का प्रतीक बनकर रह गई है. कई महिलाएं रोज़गार की तलाश में इधर-उधर भटक रही हैं, जबकि उनके नाम पर बनाई गई दुकानों पर आर्थिक रूप से सक्षम लोगों का कब्जा मजबूती से बैठे हैं. कुछ महिलाओं ने बताया कि अगर मार्केट को पुनर्जीवित किया जाए और उचित आवंटन प्रक्रिया अपनाई जाए, तो यह क्षेत्र छोटे व्यवसायों का मजबूत केंद्र बन सकता है.
मार्केट की स्थिति को लेकर आम नागरिकों में भी गहरी नाराजगी है. स्थानीय लोगों का कहना है कि निगम द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई यह इमारत अब खंडहर में तब्दील होने की कगार पर है, और यदि समय रहते इसे सुधारने की दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो सार्वजनिक संपत्ति का ह्रास और बढ़ सकता है. उनका यह भी कहना है कि अगर दुकानों का उचित सर्वे किया जाए और फर्जी कब्जों को हटाया जाए, तो वास्तविक किराया निगम के खाते में आएगा और राजस्व भी बढ़ेगा. लेकिन फिलहाल ऐसा कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा है.
नगर निगम के अधिकारियों से इस संबंध में प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की गई, लेकिन किसी ने आधिकारिक रूप से बात करने से परहेज किया. हालांकि कुछ कर्मचारियों ने अनौपचारिक रूप से माना कि मार्केट की स्थिति वाकई खराब है और कई दुकानों पर अवैध कब्जा है. उन्होंने आश्वासन दिया कि आने वाले दिनों में इसकी जांच की जाएगी, मगर स्थानीय लोगों के अनुसार ऐसी घोषणाएँ पहले भी कई बार हो चुकी हैं, लेकिन परिणाम हमेशा शून्य रहे हैं.
उधर, मार्केट की बदहाली से जुड़े वीडियो और पोस्ट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं. #jansamasya जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं और लोग निगम की कार्यशैली पर खुलकर सवाल उठा रहे हैं. इन पोस्टों में साफ दिख रहा है कि मार्केट बिना उपयोग के पड़े होने के बावजूद उद्योगपति और प्रभावशाली लोग इसका मनचाहा उपयोग कर रहे हैं, जबकि जरूरतमंद नागरिक मौके से वंचित हैं.
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि निगम इस प्रकरण को लेकर कोई ठोस कार्रवाई करता है या नहीं. शहरवासियों की अपेक्षा है कि इस मार्केट को पुनर्जीवित किया जाए, अवैध कब्जे हटाए जाएं और दुकानों को उन महिलाओं को दिया जाए जिनके लिए यह इमारत बनाई गई थी. फिलहाल, बल्देबाग की यह महिला मार्केट कागजों में तो सक्रिय है, लेकिन हकीकत में निगम की नाकामी और स्थानीय तंत्र की लापरवाही की गवाही दे रही है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

