रिक्शा चालक से इंटरनेशनल गोल्ड मेडलिस्ट: अजय यादव ने रूस में लहराया परचम, गरीबी की जंजीरें तोड़ बदली तकदीर

रिक्शा चालक से इंटरनेशनल गोल्ड मेडलिस्ट: अजय यादव ने रूस में लहराया परचम, गरीबी की जंजीरें तोड़ बदली तकदीर

प्रेषित समय :20:26:52 PM / Fri, Dec 12th, 2025
Reporter : पलपल रिपोर्टर

अनिल मिश्र/पटना

बिहार प्रदेश के गया जिले के सबसे पिछड़े और सुदूरवर्ती क्षेत्र, फतेहपुर प्रखंड के बथान गाँव का एक साधारण युवक, जिसने अपनी आँखों में बड़े सपने पाले थे, आज उन सपनों को हकीकत में बदलकर पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा बन गया है। यह कहानी है अजय यादव की, जिन्होंने बचपन में दो वक्त की रोटी और शिक्षा के लिए रिक्शा चलाया, कठिन परिश्रम से भारतीय सेना में सिपाही की नौकरी हासिल की और अब अपनी इच्छाशक्ति और ताकत के दम पर पावर लिफ्टिंग की अंतर्राष्ट्रीय दुनिया में भारत का झंडा गाड़ दिया है। अजय यादव ने हाल ही में रूस में आयोजित हुई पावरलिफ्टिंग वर्ल्ड चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर एक बार फिर अपने गाँव, अपने जिले और पूरे देश का नाम रौशन किया है। उनकी यह जीत महज़ एक खेल प्रतियोगिता की सफलता नहीं है, बल्कि यह अथक संघर्ष, अदम्य साहस और कभी हार न मानने वाले जज्बे की एक गौरव गाथा है, जिसे गया की माटी के लाल ने अपने खून-पसीने से लिखा है।

अगर कोई आपसे कहे कि एक व्यक्ति जिसने गरीबी के कारण रिक्शा चलाया हो, जिसने मजदूरी की हो, वह आज दुनिया के सबसे ताकतवर खिलाड़ियों को धूल चटा रहा है, तो शायद आपको सहसा विश्वास न हो। लेकिन गया के अजय यादव ने इस असंभव से लगने वाले कथानक को अपने जीवन का सच बना दिया है। रूस में हुए फाइनल मुकाबले में उन्होंने ईरान के मजबूत प्रतिद्वंद्वी को पछाड़कर न सिर्फ स्वर्ण पदक जीता, बल्कि यह साबित कर दिया कि गरीबी या पृष्ठभूमि कभी भी प्रतिभा और जुनून के आड़े नहीं आ सकती। यह उनका दूसरा अंतर्राष्ट्रीय स्वर्ण पदक है, जिसने पिछले छह महीनों के भीतर ही उनकी धाक को अंतर्राष्ट्रीय फलक पर जमा दिया है। इससे पहले वियतनाम में हुई चैंपियनशिप में भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया था। 4 से 7 दिसंबर तक रूस में चली इस प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में दुनिया के कई देशों के पावरलिफ्टर ने भाग लिया था, लेकिन अजय यादव की दृढ़ता और कौशल के सामने सभी टिक न सके।

अजय यादव की यह सफलता जितनी शानदार है, उनकी पिछली ज़िंदगी उतनी ही संघर्षपूर्ण रही है। उनका जन्म गया जिले के फतेहपुर प्रखंड के बथान गाँव के एक अत्यंत साधारण परिवार में हुआ था। उनके पिता रामबालक प्रसाद, परिवार का भरण-पोषण करने के लिए बैलगाड़ी चलाते थे। ज़ाहिर है, परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी। ऐसे में, अजय की पढ़ाई भी लगातार प्रभावित होती रही। पैसे की तंगी ने उन्हें चैन से बैठने नहीं दिया। एक तरफ पढ़ने का जुनून था और दूसरी तरफ घर चलाने की ज़िम्मेदारी। इन दोनों को साधने के लिए, अजय यादव ने अपनी छात्र जीवन में रिक्शा चलाने जैसा मुश्किल काम भी किया। वह बथान गाँव से सटे झारखंड प्रदेश के कोडरमा स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल झुमरी तिलैया तक जाकर रिक्शा चलाते थे ताकि घर का खर्च चल सके और वह अपनी शिक्षा जारी रख सकें। उन्होंने इस दौरान मजदूरी करने से भी गुरेज नहीं किया। इस संघर्षशील जीवन ने उन्हें भीतर से और भी मजबूत बना दिया। वह जानते थे कि अगर उन्हें इस गरीबी की दलदल से बाहर निकलना है, तो उन्हें कोई बड़ा और सुरक्षित रास्ता चुनना होगा।

उनकी आँखों ने एक सपना देखा – देश की सेवा करने का, सेना में शामिल होने का। दिन-रात की कड़ी मेहनत और सेना में जाने के जुनून ने आखिर रंग लाया। वर्ष 2010 में अजय यादव का चयन भारतीय सेना में सिपाही के पद पर हो गया। उनका चयन उनके और उनके परिवार के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। घर की आर्थिक स्थिति में सुधार आना शुरू हो गया। सेना में शामिल होने के बाद उनकी शुरुआती पोस्टिंग असम में हुई थी, और वर्तमान में वह जम्मू-कश्मीर में देश की सेवा कर रहे हैं। सेना में सिपाही बनने के बाद अजय ने फिटनेस को लेकर अपनी मेहनत को और बढ़ा दिया। उनका शरीर, जो बचपन में रिक्शा चलाकर मजबूत हुआ था, अब सेना के प्रशिक्षण से और भी फौलादी बन चुका था। उनके ट्रेनर ने उनकी शारीरिक क्षमता और अद्भुत शक्ति को पहचान लिया। उन्होंने अजय को पावरलिफ्टिंग के क्षेत्र में अपनी ऊर्जा लगाने की सलाह दी। ट्रेनर की यह सलाह अजय के जीवन को एक नई दिशा देने वाली साबित हुई।

वर्ष 2016 से अजय यादव ने पावरलिफ्टिंग को गंभीरता से लेना शुरू किया। उनकी प्राकृतिक शक्ति, सेना के अनुशासन और ट्रेनर के मार्गदर्शन ने मिलकर एक ऐसी ताक़त को जन्म दिया, जिसने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर तहलका मचाना शुरू कर दिया। सफलताएं एक के बाद एक उनके कदम चूमने लगीं। उनकी मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम तब सामने आया जब जुलाई 2025 में उन्होंने वियतनाम में आयोजित पावरलिफ्टिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। इस चैम्पियनशिप में 40 से अधिक देशों के खिलाड़ी शामिल हुए थे और इसका हर मैच नॉकआउट राउंड का था, यानी एक गलती और आप बाहर। लेकिन अजय यादव ने अपनी मानसिक दृढ़ता और शारीरिक बल का अद्भुत तालमेल दिखाते हुए 82 किलोग्राम भार वर्ग में 260 किलोग्राम का विशाल भार सफलतापूर्वक उठाकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया। वह क्षण बिहार और पूरे देश के लिए गर्व का क्षण था, जब एक रिक्शा चालक का बेटा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर गोल्ड मेडल पहनकर तिरंगे को सलामी दे रहा था।

लेकिन अजय यादव रुकने वाले नहीं थे। उनके भीतर और अधिक करने की ललक थी। वियतनाम की सफलता के महज छह महीने के भीतर, दिसंबर 2025 में उन्हें रूस में आयोजित वर्ल्ड चैंपियनशिप में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला। इस बार चुनौती और भी बड़ी थी, प्रतिस्पर्धा और भी कठिन। अजय ने इस बार 83 किलोग्राम भार वर्ग में हिस्सा लिया। उन्होंने अपनी पिछली उपलब्धि को भी पीछे छोड़ते हुए 265 किलोग्राम का भारी भरकम भार उठाकर न केवल अपनी व्यक्तिगत श्रेष्ठता साबित की, बल्कि फाइनल में ईरान के ताकतवर खिलाड़ी को पराजित कर एक बार फिर देश के लिए स्वर्ण पदक पर कब्ज़ा किया। यह लगातार दूसरा अंतर्राष्ट्रीय गोल्ड मेडल है, जो बताता है कि अजय यादव अब पावरलिफ्टिंग की दुनिया में एक स्थापित नाम बन चुके हैं।

अजय यादव की यह यात्रा वास्तव में अत्यंत संघर्षशील रही है, इतनी संघर्षशील कि कई बार तो लगता है कि अजय ने गरीबी और अभाव पर ही सबसे बड़ी जीत हासिल की है। जिस अजय को कभी पैसों की कमी के कारण रिक्शा चलाना पड़ा, आज उसी अजय की चर्चा अंतर्राष्ट्रीय खेल मंचों पर हो रही है। उन्होंने हर मुश्किल को मात दी, हर अभाव को चुनौती दी और अपने दृढ़ संकल्प के सहारे आगे बढ़ते रहे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत करने की लगन हो, तो साधारण परिस्थितियों से निकलकर भी असाधारण सफलता हासिल की जा सकती है। अजय यादव केवल एक खिलाड़ी नहीं हैं, वह उस हर युवा के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं, जो अपनी गरीबी या कमजोर पृष्ठभूमि को अपनी सफलता के आड़े आने देता है। गया के इस लाल ने साबित कर दिया है कि मिट्टी की महक और दिल का जज्बा मिलकर किसी भी विश्वस्तरीय मंच पर धमाल मचा सकते हैं। उनकी कहानी बिहार के सुदूर गाँवों से निकलकर पूरी दुनिया में गूंज रही है और यह सिर्फ एक शुरुआत है, अजय यादव अभी और कई कीर्तिमान स्थापित करने वाले हैं, जिनसे भारत का मान और गौरव हमेशा बढ़ता रहेगा। उन्होंने रिक्शा की सीट से लेकर सेना की वर्दी तक और फिर अंतर्राष्ट्रीय मंच पर गोल्ड मेडल की चमक तक का सफर तय करके यह साबित कर दिया है कि जीवन में सच्चा पावर लिफ्टिंग तो गरीबी के भार को उठाकर फेंक देने में है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-